सम्मान

15-05-2026

सम्मान

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

शहर के बड़े होटल में सम्मान समारोह था। राघव को वर्ष का सफल उद्योगपति चुना गया था। 

मंच पर पहुँचते ही तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। राघव ने भाषण दिया, “मैंने जीवन में बहुत संघर्ष किया है। अपनी मेहनत से यहाँ तक पहुँचा हूँ।” 

पहली पंक्ति में बैठी उसकी बूढ़ी माँ चुपचाप सुन रही थी। सादा सूती साड़ी, काँपते हाथ और धुँधली आँखें। 

उसे याद आया, जब राघव की पढ़ाई के पैसे नहीं थे, तब उसने अपने विवाह के कंगन बेच दिए थे। जब बेटा बीमार पड़ा, तब कई रातें बिना सोए अस्पताल के फ़र्श पर काटी थीं। और जब राघव ने व्यापार शुरू किया, तब घर ख़र्च चलाने के लिए उसने लोगों के कपड़े तक सिले थे। 

समारोह के बाद पत्रकार राघव के साथ तस्वीरें खिंचवा रहे थे माँ भीड़ में पीछे छूट गई। 

घर लौटते समय माँ ने धीरे से पूछा, “बेटा, खाना खा लिया न?” 

राघव अचानक मौन हो गया। उसे लगा कि जिस स्त्री ने उसे जीवन-भर आगे बढ़ाया, सम्मान के हर मंच पर वही सबसे पीछे रह गई। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सम्पादकीय प्रतिक्रिया
आप-बीती
बाल साहित्य कविता
कविता
कहानी
ऐतिहासिक
सांस्कृतिक आलेख
सांस्कृतिक कथा
किशोर साहित्य कहानी
स्वास्थ्य
स्मृति लेख
खण्डकाव्य
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
नाटक
रेखाचित्र
काम की बात
कविता-मुक्तक
काव्य नाटक
गीत-नवगीत
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
हास्य-व्यंग्य कविता
कविता - हाइकु
अनूदित कविता
चिन्तन
दोहे
एकांकी
कविता - क्षणिका
पुस्तक समीक्षा
गीतिका
लघुकथा
ग़ज़ल
साहित्यिक आलेख
बाल साहित्य लघुकथा
सामाजिक आलेख
व्यक्ति चित्र
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य कविता
किशोर साहित्य नाटक
ललित निबन्ध
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में