कौन करे मन की अगवाई

15-02-2026

कौन करे मन की अगवाई

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

ठिठक गए छंदों के नूपुर
मौन पड़ी मन की अमराई
शब्दों के सूखे होंठों पर
सन्नाटों की ज़द है छाई। 
 
साँसों के संपुट में सिमटी
अनुगूँजों की अनकही व्यथा
आशा के नयनों में अटकी
कल के सपनों की अमर कथा
जीवन की है डगर कँटीली
थककर बैठी नेह जुन्हाई। 
 
नेह-गाँठ अब ढीली पड़ती
स्वार्थ-सिद्धि का घना कोहरा
सदाचार की सँकरी गलियाँ 
झूठ पहनता स्वर्ण-मोहरा
भावों की थाती है रीति 
कपट-नीति की चढ़ी मलाई
 
टूटे सपने हैं जुगुनू से
विस्मृत यादों के गलियारे 
सत्य प्रतिष्ठा के दर्पण पर
मकर-जाल ने पाँव पसारे
अर्थहीन शब्दों की खेती
अनचीन्ही विपदा ले आई
 
जीर्ण शीर्ण संवेदी मन है
मर्यादा का क्षरण निरंतर
तर्क-जाल की उलझी डोरी
दिशाहीन बैठा मन्वंतर
मानवता की टूटी चौखट 
कौन करे मन की अगवाई। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
गीत-नवगीत
लघुकथा
सांस्कृतिक आलेख
बाल साहित्य कविता
स्मृति लेख
दोहे
कहानी
कविता-मुक्तक
साहित्यिक आलेख
काम की बात
सामाजिक आलेख
कविता - हाइकु
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
चिन्तन
व्यक्ति चित्र
किशोर साहित्य कहानी
सांस्कृतिक कथा
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
ललित निबन्ध
स्वास्थ्य
खण्डकाव्य
नाटक
रेखाचित्र
काव्य नाटक
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
पुस्तक समीक्षा
हास्य-व्यंग्य कविता
गीतिका
अनूदित कविता
किशोर साहित्य कविता
एकांकी
ग़ज़ल
बाल साहित्य लघुकथा
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य नाटक
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में