मकर संक्रांति: एक विराट सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विमर्श

15-01-2026

मकर संक्रांति: एक विराट सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विमर्श

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)


 (मकर संक्रांति पर विशेष-सुशील शर्मा) 

 

भारतीय मनीषा ने प्रकृति के हर परिवर्तन को उत्सव का रूप दिया है। जब सूर्य देव धनु राशि का परित्याग कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस संक्रमण काल को ‘मकर संक्रांति’ कहा जाता है। मकर संक्रांति केवल पंचांग की एक तिथि नहीं, अपितु भारतीय संस्कृति का वह देदीप्यमान पर्व है जो खगोल विज्ञान, अध्यात्म, समाज और राष्ट्र को एक अटूट सूत्र में पिरोता है। यह पर्व अंधकार से प्रकाश की ओर, जड़ता से चैतन्य की ओर और वैमनस्य से समरसता की ओर बढ़ने का पावन संदेश देता है। 

यह कालखंड देवताओं के दिन का आरंभ है, जो मानवीय चेतना में नई ऊर्जा का संचार करता है। 
मकर संक्रांति खगोलीय और वैज्ञानिक महत्ता एवं प्रकाश का विजय पर्व है, विज्ञान की दृष्टि से मकर संक्रांति का अर्थ है सूर्य का उत्तरायण होना। यद्यपि आधुनिक खगोल विज्ञान के अनुसार उत्तरायण दिसंबर के अंतिम सप्ताह को ही प्रारंभ हो जाता है, किन्तु भारतीय ज्योतिष शास्त्र में ‘निरयण’ पद्धति के अनुसार जब सूर्य मकर रेखा को पार कर उत्तर की ओर अग्रसर होता है, तब यह महापर्व मनाया जाता है। 

इस दिन से उत्तरी गोलार्ध में रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। यह प्रकाश की बढ़ती शक्ति का प्रतीक है। शिशिर ऋतु की ठिठुरन धीरे-धीरे कम होने लगती है और प्रकृति बसंत के स्वागत की तैयारी करने लगती है। सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी के उत्तरी हिस्से पर प्रभाव डालने लगती हैं, जिससे जैव-विविधता में नवजीवन का संचार होता है। 

अध्यात्म में मकर संक्रांति ‘साधना’ और ‘सिद्धि’ का संगम है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरायण की महिमा का गान करते हुए इसे मोक्ष प्रदायक बताया है। 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उत्तरायण के छह माह देवताओं का एक दिन होता है और दक्षिणायन उनकी रात्रि। प्रकाश के इस काल में शरीर त्यागने वाले जीव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल सकती है, ऐसी श्रद्धा सनातन धर्म में व्याप्त है। 

‘माघे निमग्ना: सलिले सुशीते’ के मंत्र के साथ प्रयागराज, काशी और गंगासागर जैसे तीर्थों में करोड़ों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाते हैं। तिल और गुड़ का दान केवल पुण्य अर्जन नहीं, बल्कि अपने अहंकार को त्याग कर सौम्यता को अपनाने का आध्यात्मिक उपक्रम है। 

मकर संक्रांति के साथ अनेक गौरवशाली कथाएँ जुड़ी हैं जो इसके महत्त्व को अक्षुण्ण बनाती हैं: महाभारत के महानायक भीष्म ने शरशय्या पर रहते हुए भी मृत्यु का वरण करने के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी। उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति से सिद्ध किया कि संयम और संकल्प से काल को भी जीता जा सकता है। 

इसी दिन माता गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था और वे राजा सगर के साठ हज़ार पुत्रों का उद्धार करते हुए कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में विलीन हुई थीं। इसीलिए गंगासागर स्नान का विशेष महत्त्व है। 

मकर संक्रांति में सूर्य-शनि का मिलन होता है, ज्योतिषीय कथाओं के अनुसार, सूर्य देव स्वयं अपने पुत्र शनि (जो मकर राशि के स्वामी हैं) के घर मिलने जाते हैं। यह पिता-पुत्र के सम्बन्धों में कटुता त्याग कर स्नेह और समन्वय स्थापित करने का सामाजिक संदेश है। 

मकर संक्रांति सामाजिक महत्ता, समरसता और सहअस्तित्व का त्योहार है, मकर संक्रांति भारत की ‘विविधता में एकता’ का जीवंत उदाहरण है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक यह पर्व अलग-अलग नामों से किन्तु एक ही भाव से मनाया जाता है। 

क्षेत्रीय स्वरूप में मकर संक्रांति पंजाब में ‘लोहड़ी’, तमिलनाडु में ‘पोंगल’, असम में ‘बिहू’, गुजरात में ‘उत्तरायण’ और उत्तर भारत में ‘खिचड़ी’ के रूप में यह पर्व समाज के हर वर्ग को जोड़ता है। 

“तिल-गुड़ घ्या और गोड-गोड बोला“—यह उक्ति महाराष्ट्र से निकलकर पूरे देश का स्वर बनती है। तिल का तेल शरीर को ऊष्मा देता है और गुड़ वाणी में मिठास। यह पर्व आपसी भेदभाव मिटाकर मधुर सम्बन्ध बनाने का अवसर है। 

मकर संक्रांति कृषि प्रधान भारत का उत्सव है राष्ट्र के निर्माण में किसानों की भूमिका सर्वोपरि है और मकर संक्रांति मूलतः एक कृषि उत्सव है। यह राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा और किसानों के परिश्रम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का समय है। 

इस समय धान, गन्ना और रबी की फ़सलें कटकर घर आने को तैयार होती हैं। देश का अन्नदाता अपनी मेहनत का फल देख प्रफुल्लित होता है। 

गुजरात और राजस्थान के आकाश में उड़ती अनगिनत पतंगें राष्ट्र की प्रगति और ऊँची उड़ान की आकांक्षा को दर्शाती हैं। यह खेल ऊँच-नीच के भेदभाव को भुलाकर सामूहिक आनंद का मार्ग प्रशस्त करता है। 

मकर संक्रांति केवल गुड़-तिल खाने का पर्व नहीं है, यह जड़ता के विरुद्ध चैतन्य का विद्रोह है। जब सूर्य अपनी दिशा बदलता है, तो वह संदेश देता है कि मनुष्य को भी अपने विचारों में गतिशीलता लानी चाहिए। आज के दौर में जब समाज वैचारिक संक्रमण से गुज़र रहा है, तब मकर संक्रांति हमें अपनी जड़ों एवं संस्कृति से जुड़े रहकर गगन की ऊँचाइयों को छूने की प्रेरणा देती है। पतंग की डोर जैसे आधार से जुड़ी होती है, वैसे ही हमारी प्रगति भी संस्कारों के आधार पर टिकी होनी चाहिए।” 

मकर संक्रांति का यह समावेशी पर्व हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य बिना किसी भेदभाव के संपूर्ण चराचर जगत को प्रकाश देता है, हमें भी संकुचित मानसिकता से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज के कल्याण हेतु समर्पित होना चाहिए। यह पर्व खगोल के माध्यम से भूगोल को और पुराण के माध्यम से विज्ञान को जोड़ने का अद्भुत सेतु है। 

आइए, इस संक्रांति पर हम संकल्प लें कि हम अपने भीतर के अंधकार को मिटाएँगे, वाणी में गुड़ जैसी मधुरता लाएँगे और राष्ट्र की उन्नति की पतंग को नैतिकता की डोर से बाँधकर गगन पार ले जाएँगे। 

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