सामाजिक जीवन के मूल्यांकन का विरोधाभास

01-05-2026

सामाजिक जीवन के मूल्यांकन का विरोधाभास

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

जीवन और मृत्यु के बीच मनुष्य का जो सामाजिक मूल्यांकन होता है, वह प्रायः एक गहरे विरोधाभास से भरा होता है। जीवित अवस्था में समाज का विमर्श और श्मशान में होने वाला विमर्श दोनों एक ही व्यक्ति के बारे में होते हुए भी, दो भिन्न सत्य प्रस्तुत करते हैं। यह विरोधाभास केवल शब्दों का नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना, दृष्टि और आचरण का दर्पण है। 

जीवित व्यक्ति के संदर्भ में समाज का विमर्श अक्सर सीमित, पक्षपाती और परिस्थितिजन्य होता है। उसमें ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, असहमति और अहंकार का रंग घुला रहता है। व्यक्ति की उपलब्धियाँ भी आलोचना का कारण बनती हैं, और उसकी कमियाँ चर्चा का विषय। हम उसके व्यवहार के छोटे-छोटे पक्षों को पकड़कर एक स्थायी छवि बना लेते हैं। विशेषतः अंतर्मुखी, मितभाषी या स्वभावतः संयमी व्यक्ति को समाज अक्सर घमंडी, स्वार्थी, अव्यवहारिक, अहंकारी समझ लेता है। यहाँ हमारा दृष्टिकोण व्यक्ति को समझने का नहीं, उसे परिभाषित करने का होता है।

किन्तु जैसे ही वही व्यक्ति इस संसार से विदा लेता है, श्मशान का विमर्श अचानक बदल जाता है। वहाँ उपस्थित लोग उसी व्यक्ति के गुणों को याद करते हैं उसकी सरलता, उसकी सहायता, उसकी सद्भावना, उसका संघर्ष। वहाँ आलोचना का स्वर धीमा पड़ जाता है और करुणा का भाव मुखर हो उठता है। यह परिवर्तन क्यों? 

इसका एक कारण है मृत्यु का अंतिम सत्य। श्मशान मनुष्य को उसकी सीमाओं का बोध कराता है। वहाँ अहंकार का स्थान नहीं रहता। वहाँ यह अनुभव होता है कि जो चला गया, वह अब प्रत्युत्तर नहीं देगा, इसलिए उसके प्रति कठोरता का औचित्य भी समाप्त हो जाता है। दूसरा कारण है स्मृति का चयनात्मक होना। मनुष्य प्रायः मृत्यु के बाद सकारात्मक स्मृतियों को ही सँजोता है, क्योंकि वे उसे कम पीड़ा देती हैं और आत्मग्लानि से भी बचाती हैं।

परन्तु यह विरोधाभास एक प्रश्न भी खड़ा करता है क्या हम जीवित व्यक्ति के साथ वही न्याय नहीं कर सकते, जो हम उसके जाने के बाद करते हैं? यदि श्मशान में हम उसकी अच्छाइयों को देख सकते हैं, तो जीवन में क्यों नहीं? यदि मृत्यु हमें विनम्र बना देती है, तो जीवन हमें कठोर क्यों बनाए रखता है?

मार्गदर्शन का मूल बिंदु यहीं है। हमें अपने दृष्टिकोण को मृत्यु-केन्द्रित संवेदना से जीवन-केन्द्रित संवेदना की ओर मोड़ना होगा। 

कुछ बातें इस दिशा में सहायक हो सकती हैं।

पहली, व्यक्ति को उसकी संपूर्णता में देखने का अभ्यास। हर मनुष्य में गुण और सीमाएँ दोनों होते हैं। केवल एक पक्ष के आधार पर उसकी छवि बना लेना अधूरा न्याय है। 

दूसरी, संवाद की संस्कृति विकसित करना। कई ग़लतफ़हमियाँ केवल इसलिए जन्म लेती हैं क्योंकि हम पूछते नहीं, केवल मान लेते हैं। अंतर्मुखता को अहंकार समझ लेना इसी का उदाहरण है।

तीसरी, समय रहते प्रशंसा और स्वीकार करना। जो सम्मान हम श्मशान में शब्दों से देते हैं, उसे जीवन में व्यवहार से देना अधिक सार्थक है। किसी के प्रति कृतज्ञता, स्नेह या सम्मान व्यक्त करने में विलंब न करें।

चौथी, आत्मचिंतन। जब हम किसी के बारे में नकारात्मक सोचते हैं, तो यह भी देखें कि उसमें हमारा अपना पूर्वाग्रह कितना है। कई बार हम दूसरों को उसी दृष्टि से देखते हैं, जो हमारे भीतर की असुरक्षा या तुलना से उत्पन्न होती है। 

अंततः, श्मशान का विमर्श हमें जीवन का पाठ पढ़ाता है। वह सिखाता है कि मनुष्य का मूल्यांकन तात्कालिक भावनाओं से नहीं, उसकी समग्र यात्रा से होना चाहिए। यदि हम इस सीख को जीवन में उतार सकें, तो शायद हमारे सम्बन्ध अधिक सच्चे, अधिक संवेदनशील और अधिक मानवीय बन सकें।

इस प्रकार, विरोधाभास को केवल देखना ही नहीं, उसे साधना भी आवश्यक है ताकि हम किसी के जाने के बाद नहीं, उसके रहते हुए ही उसके होने का सम्मान कर सकें। 

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