हिंदी की यात्रा

15-09-2026

हिंदी की यात्रा

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 302, अक्टूबर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

संस्कृत की गोद से निकली, 
लोक के कंठ में पली हिंदी, 
अपभ्रंश की पगडंडियों से
जनमन तक चली हिंदी।
 
कबीर की साखी में बोली, 
तुलसी के मानस में बसी, 
भारतेंदु के स्वप्नों में जागी, 
प्रेमचंद के पाँत्रों में हँसी।
 
युग बदलते रहे, 
हिंदी अपनी यात्रा में मनुष्य के साथ चलती रही। 

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