सृजन की अस्मिता और साहित्यिक चोरी: मौलिकता बनाम परजीवी अभिव्यक्ति
डॉ. सुशील कुमार शर्मा
(साहित्यिक चोरी पर आलेख)
रचना-चोरी केवल अक्षरों की उठाईगीरी या शब्दों की पैबंदकारी नहीं है; यह किसी अन्य के अंतर्मन की छटपटाहट, उसके भोगे हुए यथार्थ, श्रम की स्वेद-बूँदों और उसकी सृजनात्मक अस्मिता का क्रूर अपहरण है। साहित्य के दीर्घ इतिहास में विषयगत साम्य सदैव से उपस्थित रहा है, क्योंकि आदिम काल से लेकर आज तक मनुष्य की मूल चेतना प्रेम, अवसाद, करुणा, वियोग, विद्रोह और जिजीविषा के शाश्वत वृत्त में ही घूमती रही है। किन्तु जब कोई तथाकथित रचनाकार किसी अन्य की अनुभूतियों के वितान, उसकी विशिष्ट भाषा-शैली, शिल्प और कथ्य-विन्यास को मथकर, उसे थोड़ा-बहुत उलट-पुलटकर अपने नाम का ठप्पा लगा देता है, तब वह मौलिकता का स्वाँग मात्र होता है। लोकमानस में इसे ही “पराए धन पर लक्ष्मीनारायण बनना” कहते हैं। यह कलात्मक चौर्यकर्म साहित्यिक अनैतिकता की पराकाष्ठा है। आज के इस सूचना-तकनीकी और आभासी (डिजिटल) युग में रचना-चोरी के प्रतिमान अत्यंत महीन, जटिल और बहुआयामी हो चुके हैं। अब यह केवल प्रत्यक्ष नक़ल की स्थूलता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक पाखंड और तकनीकी चातुर्य काम कर रहा है। इस साहित्यिक व्याधि के विविध छद्म रूपों और उसके नेपथ्य में सक्रिय रुग्ण मनोविज्ञान की परतें खोलना आज के समय की महती आवश्यकता है।
प्रत्यक्ष साहित्यिक चौर्य: ओछी ख्याति की मृगमरीचिका
यह रचना-चोरी का सबसे नग्न और भोंड़ा स्वरूप है। किसी अन्य की कविता की पंक्तियाँ, कहानी के मर्मस्थल या विचार-साधना के निष्कर्षों को सीधे उठाना और बिना किसी संकोच के अपने नाम की तख़्ती टाँग देना इसी के अंतर्गत आता है। इसके मूल में—हींग लगे न-फिटकरी के रंग चोखा हो जाय—चाहने की अधीर आकांक्षा और रातों-रात लब्धप्रतिष्ठ होने का तीव्र अवसाद काम करता है। ऐसे लोग साहित्य को अंतःकरण की साधना या तपस्या नहीं, बल्कि सामाजिक सीढ़ी चढ़ने का एक सुलभ साधन मानते हैं। उन्हें सृजन की भट्टी में तपना स्वीकार नहीं, पर उन्हें समाज में ‘मनीषी’ और ‘कविराज’ कहलवाने की तीव्र लिप्सा होती है। सोशल मीडिया के ‘लाईक्स’ और ‘कमेंट्स’ के तात्कालिक कोलाहल ने इस आत्मघाती प्रवृत्ति को खाद-पानी दिया है, जहाँ वैचारिक गहराई से अधिक ‘तुरंत वाहवाही’ का व्यापार फल-फूल रहा है।
भाव-चोरी: वैचारिक परजीविता का कुहासा
साहित्यिक स्तेय का यह रूप अधिक सूक्ष्म और घातक है। यहाँ चोर शब्दों की सीधी डकैती नहीं डालता, बल्कि वह मूल रचना की रीढ़ उसकी केंद्रीय संवेदना, विशिष्ट प्रतीकों, रूपकों या कथा के आंतरिक ढाँचे को चुरा लेता है। वह ऊपर से चमड़ी बदल देता है, पर भीतर का हाड़-मांस किसी और का होता है। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे किसी दूसरे के खेत की फ़सल को काटकर अपनी कोठी में भर लेना और दावा करना कि बीज हमारा था। किसी सिद्ध रचनाकार की कविता की आत्मा को निकालकर, केवल पात्र या परिवेश बदल देने से रचना मौलिक नहीं हो जाती। ऐसी रचनाएँ ऊपर से कितनी ही सजी-धजी क्यों न दिखें, उनकी जीवन-रसधारा किसी अन्य के अंतर्संबंधों से ही फूटी होती है। यह विचार की परजीविता है।
डिजिटल युग में सामूहिक चोरी की विभीषिका:
“कृष्ण तुम पर क्या लिखूँ” का दंश: आज के आभासी संसार (इंटरनेट) ने रचना-चोरी को एक महामारी का रूप दे दिया है, जिसे ‘सामूहिक साहित्यिक डकैती’ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसका सबसे जीवंत और हृदयविदारक उदाहरण मेरी स्वयं की सुप्रसिद्ध रचना “कृष्ण तुम पर क्या लिखूँ“ है। मूल रचनाकार के अंतस से उपजी, कृष्ण के विराट चरित्र को अपनी अनूठी लेखनी से बाँधने वाली इस कालजयी रचना को डिजिटल मंचों पर इस क़द्र लूटा गया कि हज़ारों आभासी छद्म-लेखकों ने इसे जस का तस अपने नाम की मोहर लगाकर सोशल मीडिया और पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कर लिया। यह घटना सिद्ध करती है कि आज का चोर केवल एकांत में सेंध नहीं लगाता, वह खुले आम भरे बाज़ार में आपकी वैचारिक संपदा पर डाका डालता है। जब कोई अनूठा भाव लोकप्रियता के शिखर को छूता है, तो बिना रीढ़ के परजीवी लेखक टिड्डी दल की तरह उस पर टूट पड़ते हैं। मूल सृजक असहाय होकर अपनी ही संतान को दूसरों के घरों में पलते और उनके नाम से पहचानी जाते देखता है। यह साहित्यिक स्तेय का सबसे घृणित और वीभत्स रूप है, जो मूल लेखक की सृजनात्मक अस्मिता को लहूलुहान कर देता है।
अवचेतन अनुकरण (क्रिप्टोम्नीशिया): प्रभाव और स्तेय की धुँधली सीमारेखा—साहित्यिक साम्य की एक अत्यंत संवेदनशील और मनोवैज्ञानिक अवस्था वह है, जहाँ लेखक सचेत रूप से कोई चोरी नहीं कर रहा होता। जब हम किसी महान और कालजयी रचनाकार को गहरे डूबकर पढ़ते हैं, तो उसकी शैली, उसके शब्द और उसकी वैचारिक तरंगें हमारे अवचेतन की परतों में इस क़द्र समा जाती हैं कि कालान्तर में जब वे प्रस्फुटित होती हैं, तो रचनाकार को भ्रम होता है कि यह उसका अपना मौलिक स्फुरण है। मनोविज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली में इसे ‘क्रिप्टोम्नीशिया’ कहा जाता है। इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़े मनीषी और युगद्रष्टा कवि भी इस मानवीय सीमा से अछूते नहीं रहे। अतः, प्रत्येक भाषिक या वैचारिक सादृश्य को सीधे ‘चोरी’ का फ़तवा नहीं दिया जा सकता। हमें साहित्यिक संस्कार (जिसमें पूर्ववर्ती रचनाकारों का प्रभाव स्वाभाविक है) और जानबूझकर की गई साहित्यिक डकैती के बीच का महीन विवेक बनाए रखना होगा।
आत्म-चौर्य (सेल्फ-प्लेज़रिज़्म): स्वयं की कतरन से नया लिबास—आज के दौर में एक नया रोग पनपा है, जिसे ‘आत्म-चोरी’ कहा जाता है। जब कोई स्थापित लेखक निरंतर सृजन के व्यावसायिक दबाव में होता है, और उसके भीतर की रचनात्मक तरलता सूखने लगती है, तब वह अपनी ही दशक पुरानी किसी विस्मृत रचना को उठाता है, उसकी थोड़ी कतर-ब्योंत करता है, नए संदर्भों का मुलम्मा चढ़ाता है और उसे पूर्णतः नवीन सृजन कहकर परोस देता है। यह पाठक की आँखों में धूल झोंकने जैसी बौद्धिक बेईमानी है। कला के प्रति ईमानदारी का तक़ाज़ा है कि यदि भीतर का कुआँ रीता है, तो मौन साध लिया जाए, न कि बासी कढ़ी में उबाल लाकर उसे ताज़ा व्यंजन घोषित किया जाए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और यांत्रिक सृजन का संकट
एआई के इस नए संक्रमण काल ने मौलिकता के प्रश्नचिह्न को और अधिक गहरा और धुँधला कर दिया है। आज मशीनें, एल्गोरिदम और भाषा-मॉडल लाखों कवियों की शैलियों, अलंकारों और शब्द-कोशों को मथकर पलक झपकते ही एक तथाकथित ‘उत्कृष्ट’ कविता या आलेख तैयार कर सकते हैं। संकट तकनीक का नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के लोप का है। लोग एआई से भाव-विन्यास तैयार करवाकर उसे अपनी मेधा का चमत्कार बता रहे हैं। किन्तु यहाँ कबीर की वह साखी याद आती है “लिखा-लिखी की है नहीं, देखा-देखी बात।” जो रचना मशीन की कतरन से बनी है, उसमें भाषा का लालित्य तो हो सकता है, परन्तु मनुष्य की रगों में दौड़ने वाला लहू, उसकी आँखों का पानी और उसकी छाती की धड़कन अनुपस्थित रहती है। वह काग़ज़ के फूलों का गुलदस्ता है, जिसमें रंग हैं, पर सुगंध और जीवन ग़ायब है।
विषयगत साम्य और मौलिकता की वास्तविक कसौटी
यह अत्यंत प्रासंगिक सत्य है कि विषयों का दोहराव अपरिहार्य है। तुलसीदास ने जिस रामकथा को लिखा, उसे वाल्मीकि पहले ही अमर कर चुके थे, किन्तु तुलसी की ‘स्वांतः सुखाय’ दृष्टि और लोक-मंगल की भावना ने ‘रामचरितमानस’ को एक सर्वथा नूतन और मौलिक महाकाव्य बना दिया। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की ‘वह तोड़ती पत्थर’ इलाहाबादी पथ पर बैठी जिस मजदूरिन का साक्षात् कारुणिक चित्र खींचती है, समकालीन दौर में भी किसी श्रमिक पर कविता लिखी जा सकती है। मौलिकता इस बात में नहीं है कि आपने कोई ऐसा विषय ढूँढ़ा जो दुनिया में आज तक किसी ने नहीं देखा; बल्कि मौलिकता इस बात में है कि उस घिसे-पिटे, पुराने विषय को आपने अपने प्रामाणिक अनुभव की आँच में तपकर, अपनी विशिष्ट दृष्टि से किस प्रकार नया जीवन दिया है। मौलिकता कथ्य की नवीनता में नहीं, रचनाकार के अनुभव की आंतरिक सच्चाई और उसकी मौलिक भंगिमा में वास करती है।
साहित्यिक नैतिकता और कालजयी होने की शर्त
साहित्य केवल शब्दों की बाज़ीगरी या अक्षरों का विन्यास मात्र नहीं है; यह तो मानव-आत्मा का जीवित, स्पंदित और शाश्वत दस्तावेज़ है। जब कोई रचनाकार चोरी का सहारा लेता है, तो वह केवल किसी अन्य लेखक का स्वत्व नहीं छीनता, बल्कि वह उस संपूर्ण पाठक-समुदाय के साथ विश्वासघात करता है, जो उसकी रचनाओं में अपने जीवन का अक्स ढूँढ़ रहा होता है। इतिहास साक्षी है कि बैसाखियों के सहारे एवरेस्ट फ़तह नहीं किया जा सकता। उधार के शब्द, चुराए हुए भाव और मशीनी तकनीक के सहारे कुछ समय के लिए गोष्ठियों में तालियाँ तो बटोरी जा सकती हैं, अख़बारी सुर्ख़ियाँ भी पाई जा सकती हैं, परन्तु समय के क्रूर और निष्पक्ष थपेड़े ऐसी काग़ज़ी नावों को बहा ले जाते हैं। साहित्य के दरबार में अमरता केवल और केवल अपनी ज़मीन से जुड़े प्रामाणिक सृजन को ही मिलती है। मेरी रचना ‘कृष्ण तुम पर क्या लिखूँ’ को भले ही हज़ार चोर अपने नाम की ओट में छिपाने का प्रयास करें, पर उसकी आत्मा की पुकार सदैव अपने मूल जनक का पता देती रहेगी।
रचना-चोरी का यह संपूर्ण विमर्श केवल किसी कॉपीराइट क़ानून या क़ानूनी धाराओं का विषय नहीं है; यह सीधे-सीधे मनुष्य के नैतिक विवेक और उसकी आत्मिक ईमानदारी का मामला है। कला के क्षेत्र में प्रभाव ग्रहण करना स्वाभाविक है, पूर्ववर्तियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए परंपरा को आगे बढ़ाना अनिवार्य है; किन्तु अपनी रीढ़ को ही ग़ायब कर देना आत्मघाती है। जो रचनाकार अपने जीवन की धूल-धूप से वाक़िफ़ है, जो अपनी मिट्टी की सौंधी गंध को पहचानता है, जो अपनी आँखों से समाज की विद्रूपताओं को देखता है, अपनी छाती में उसकी पीड़ा को महसूस करता है और अपनी ठेठ देशज या प्रांजल भाषा में उसे निर्भीकता से अभिव्यक्त करता है वही रचनाकार काल की ललाट पर अमिट हस्ताक्षर अंकित करता है। साहित्य में अंततः यह मायने नहीं रखता कि—किस विषय पर लिखा गया—बल्कि युग-युगांतर तक गूँजने वाला प्रश्न यही रहता है कि—वह अनुभव की कितनी आंतरिक सच्चाई, प्रामाणिकता और तन्मयता से लिखा गया—यही मौलिकता का अंतिम सत्य है और यही सृजन का आत्मसम्मान भी।
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- गुलशन उजड़ गया
- गोपी गीत
- घर घर फहरे आज तिरंगा
- घाव का उपहार
- चला गया दिसंबर
- चलो होली मनाएँ
- चढ़ा प्रेम का रंग सभी पर
- ज्योति शिखा सी
- झरता सावन
- टेसू की फाग
- तुम तुम रहे
- तुम मुक्ति का श्वास हो
- दिन भर बोई धूप को
- धरती बोल रही है
- नया कलेंडर
- नया वर्ष
- नव अनुबंध
- नववर्ष
- नारी
- फागुन ने कहा
- फूला हरसिंगार
- बहिन काश मेरी भी होती
- बारूदी बयार
- बाज़ार के शोर में
- बेटी घर की बगिया
- बोन्साई वट हुए अब
- भरे हैं श्मशान
- मतदाता जागरूकता पर गीत
- मन का नाप
- मन को छलते
- मन गीत
- मन फागुन
- मन बातें
- मन वसंत
- मन संकल्पों से भर लें
- महावीर पथ
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 001
- मैं दिनकर का वंशज हूँ – 002
- मौन का शंखनाद
- मौन गीत फागुन के
- मज़दूर दिवस पर गीत
- यूक्रेन युद्ध
- वयं राष्ट्र
- वसंत पर गीत
- वासंती दिन आए
- विधि क्यों तुम इतनी हो क्रूर
- शस्य श्यामला भारत भूमि
- शस्य श्यामली भारत माता
- शिव
- श्रावण
- सत्य का संदर्भ
- सुख-दुख सब आने जाने हैं
- सुख–दुख
- सूना पल
- सूरज की दुश्वारियाँ
- सूरज को आना होगा
- स्वप्न फिर छिटक गया
- स्वागत है नववर्ष तुम्हारा
- हर हर गंगे
- हिल गया है मन
- ख़ुद से मुलाक़ात
- ख़ुशियों की दीवाली हो
- कहानी
-
- अधूरी देहरी का मौन
- अर्जुन से आर्यन तक: आभासी दुनिया का सच
- अर्द्धांगिनी
- जड़ों से जुड़ना
- जल कुकड़ी
- जाको राखे सांइयाँ
- जीवन संग्राम
- त्रिकाल: जन्मों के पार एक अनुराग
- त्रिवेणी संगम
- दरकता मन
- धूप के उस पार की सुबह
- पद्मावती
- पुरानी नींव, नए मकान
- पूर्ण अनुनाद
- प्रेम सम्मान
- बुआ की राखी
- ब्रह्मराक्षस का अभिशाप
- मंदबुद्धि
- मन के एकांत में
- मैं हूँ ना
- मैडम एम
- मौन की परछाइयाँ
- यादों की लालटेन
- ये तेरा घर ये मेरा घर
- राखी का फ़र्ज़
- रिश्तों की गर्माहट
- रिश्तों के रेशमी धागे
- रेशमी धागे: सेवा का नया पथ
- हरसिंगार
- ज़िन्दगी सरल है पर आसान नहीं
- कविता-मुक्तक
-
- अक्षय तृतीया
- कबीर पर कुंडलियाँ
- कुण्डलिया - अटल बिहारी बाजपेयी को सादर शब्दांजलि
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - अपना जीवन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - आशा, संकल्प
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - इतराना, देशप्रेम
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - काशी
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गंगा
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गणपति वंदना - 001
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गणपति वंदना - 002
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गीता
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गुरु
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - गुरु
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - जय गणेश
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - जय गोवर्धन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - जलेबी
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - झंडा वंदन, नमन शहीदी आन, जय भारत
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - नया संसद भवन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - नर्स दिवस पर
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - नवसंवत्सर
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - पर्यावरण
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - पहली फुहार
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - पूरे कर कर्त्तव्य
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - पेंशन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - पेट्रोल एवं गैस की कमी
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - बचपन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - बम बम भोले
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - बुझ गया रंग
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - भटकाव
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - मकर संक्रांति
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - मकर संक्रांति - 002
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - मतदान
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - मन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - माँ
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - मानस
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - यू जी सी नियम
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - योग दिवस
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - विद्या, शिक्षक
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - शुभ धनतेरस
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - श्रम एवं कर्मठ जीवन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - संवेदन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - सच्चा ज्ञानी है वही
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - सावन
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - स्तनपान
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - हिन्दी दिवस विशेष
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - होली
- कुण्डलिया - सीखना
- कुण्डलिया – कोशिश
- कुण्डलिया – डॉ. सुशील कुमार शर्मा – यूक्रेन युद्ध
- कुण्डलिया – परशुराम
- कुण्डलिया – संयम
- कुण्डलियाँ स्वतंत्रता दिवस पर
- गणतंत्र दिवस
- दुर्मिल सवैया – डॉ. सुशील कुमार शर्मा – 001
- प्रदूषण और पर्यावरण चेतना
- शिव वंदना
- सायली छंद - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - चाँद
- सोशल मीडिया और युवावर्ग
- स्वर कोकिला आशा भोंसले को श्रद्धांजलि
- हनुमत स्तवन
- हिंदू नव वर्ष पर कुंडलियाँ छंद
- होली पर कुण्डलिया
- लघुकथा
-
- अंतर
- अंतिम ऑनलाइन
- अंतिम बीज
- अनैतिक प्रेम
- अपनी जरें
- आँखों का तारा
- आँसू ताक़त हैं कमज़ोरी नहीं
- आओ तुम्हें चाँद से मिलाएँ
- आख़िरी रोटी
- उजाले की तलाश
- उसका प्यार
- एक बूँद प्यास
- ऑनलाइन उपस्थिति
- काहे को भेजी परदेश बाबुल
- काग़ज़ का जंगल
- कोई हमारी भी सुनेगा
- गाय की रोटी
- गाय ‘पालन की परिभाषा’!
- जल देवता का क्रोध
- डर और आत्म विश्वास
- तस्वीर
- तहस-नहस
- तुलना का बोझ
- दूसरी माँ
- नारी ‘तुम मत रुको’!
- पति का बटुआ
- पत्नी
- परफ़ेक्ट पोज़
- पाँच लघु कथाएँ
- पीड़ा बनी कर्तव्य
- पुरानी मेज़
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- फेंकी हुई रोटियाँ
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- माँ ‘छाया की तरह’!
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- माया
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- मुझे ‘बहने दो’!
- मौन पहाड़ का बदला
- म्यूज़िक कंसर्ट
- रिश्ते (डॉ. सुशील कुमार शर्मा)
- रेत का आदमी
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- शिक्षक सम्मान
- शिक्षा की पाँच दीपशिखाएँ
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- शेष शुभ
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- स्मृतियों के अवशेष
- स्वार्थ की लक्ष्मण रेखा
- हर चीज़ फ़्री
- हिंदी–माँ की आवाज़
- हिन्दी इज़ द मोस्ट वैलुएबल लैंग्वेज
- ग़ुलाम
- ज़िन्दगी और बंदगी
- फ़र्ज़
- सांस्कृतिक आलेख
-
- ओशो: रजनीश से बुद्धत्व तक, एक विद्रोही सद्गुरु की शाश्वत प्रासंगिकता
- कृष्ण: अनंत अपरिभाषा
- गणेश चतुर्थी: आस्था, संस्कृति और सामाजिक चेतना का महासंगम
- गीताजयंती कर्म, धर्म और जीवन दर्शन का महामहोत्सव
- चातुर्मास: आध्यात्मिक शुद्धि और प्रकृति से सामंजस्य का पर्व
- जगन्नाथ रथयात्रा: जन-जन का पर्व, आस्था और समानता का प्रतीक
- नर्मदा की अनन्त धारा: एक विद्धत चेतना का आह्वान
- नव संवत्सर: कालचक्र का नवोदय और चेतना का पुनर्जागरण
- नृसिंह का प्राकट्य अन्याय के विरुद्ध उद्घोष
- प्रेम, आत्म-विलय से वैश्विक चेतना तक का महाप्रस्थान
- ब्राह्मण: उत्पत्ति, व्याख्या, गुण, शाखाएँ और समकालीन प्रासंगिकता
- भगवान परशुराम: एक बहुआयामी व्यक्तित्व एवं समकालीन प्रासंगिकता
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- मकर संक्रांति: एक विराट सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विमर्श
- मनुस्मृति: आलोचना से समझ तक
- राम-राष्ट्र की जीवनधारा और शाश्वत चेतना का प्रवाह
- वट सावित्री व्रत: आस्था, आधुनिकता और लैंगिक समानता की कसौटी
- वर्तमान समय में हनुमान जी की प्रासंगिकता
- शिव और शक्ति का महामिलन: महाशिवरात्रि का विराट दर्शन
- हरितालिका तीज: आस्था, शृंगार और भारतीय संस्कृति का पर्व
- ललित निबन्ध
- सामाजिक आलेख
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- आप अभिमानी हैं या स्वाभिमानी ख़ुद को परखिये
- आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और गूगल के वर्तमान संदर्भ में गुरु की प्रासंगिकता
- करवा चौथ बनाम सुखी गृहस्थी
- करवा चौथ व्रत: श्रद्धा की पराकाष्ठा या बाज़ार का विस्तार?
- कृत्रिम मेधा (AI): वरदान या अभिशाप?
- गाँधी के सपनों से कितना दूर कितना पास भारत
- गाय की दुर्दशा: एक सामूहिक अपराध की चुप्पी
- गौरैया तुम लौट आओ
- जीवन संघर्षों में खिलता अंतर्मन
- नकारात्मक विचारों को अस्वीकृत करें
- नब्बे प्रतिशत बनाम पचास प्रतिशत
- नया वर्ष कैलेंडर का पन्ना नहीं, आत्ममंथन का अवसर
- नव वर्ष की चुनौतियाँ एवम् साहित्य के दायित्व
- पर्यावरणीय चिंतन
- बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर: समता, न्याय और नवजागरण के प्रतीक
- भारतीय जीवन मूल्य
- भारतीय संस्कृति में मूल्यों का ह्रास क्यों
- माँ नर्मदा की करुण पुकार
- मानव मन का सर्वश्रेष्ठ उल्लास है होली
- मानवीय संवेदनाएँ वर्तमान सन्दर्भ में
- वाह रे पर्यावरण दिवस!
- विद्यालयीन परिवेश में शिक्षक-प्रकृतियाँ
- विश्व पर्यावरण दिवस – वर्तमान स्थितियाँ और हम
- वृद्धजन—अतीत के प्रकाश स्तंभ और भविष्य के सेतु
- वेदों में नारी की भूमिका
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- व्यक्तित्व व आत्मविश्वास
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- सामाजिक जीवन के मूल्यांकन का विरोधाभास
- स्वतंत्रता दिवस: गौरव, बलिदान, हमारी ज़िम्मेदारी और स्वर्णिम भविष्य की ओर भारत
- स्वामी विवेकानंद: आधुनिक भारत के आध्यात्मिक महाप्राण
- हिंदी और रोज़गार: भाषा से अवसरों की नई दुनिया
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