ज़ख्म दिल के अब किसी को भी दिखाना है नहीं

15-06-2026

ज़ख्म दिल के अब किसी को भी दिखाना है नहीं

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
2122    2122    2122    212
 
ज़ख्म दिल के अब किसी को भी दिखाना है नहीं,
दर्द अपना हर किसी को भी बताना है नहीं।
 
काँच के ऊँचे महल वाले भुलाकर चल दिए,
उन अमीरों की गली में अब तो जाना है नहीं।
 
जिसको समझे थे इबादत, दर्द निकला उम्र भर,
इस फ़रेबी प्यार का अब बोझ ढोना है नहीं।
 
झूठ और मतलब की दुनिया रास आई है तुम्हें,
पाक रिश्तों की क़दर दिल से निभाना है नहीं।
 
हाथ झटका और उठ आए तेरी महफ़िल से हम,
स्वाभिमान अपना किसी दर पर गँवाना है नहीं।
 
दर्द की हर रात काटी मुस्कुराकर हमने अब,
आँसुओं को सामने सबके बहाना है नहीं।
 
जो हमें ठुकरा गए थे वक़्त के बहकाव में,
उनको अपना हाल फिर से अब सुनाना है नहीं।
 

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