प्लास्टिक का जंगल

15-02-2026

प्लास्टिक का जंगल

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

एक तटीय क़स्बा था, जहाँ के लोग मछली पकड़कर और पर्यटन से अपना जीवन यापन करते थे। समुद्र उनके लिए सब कुछ था। लेकिन समय के साथ, प्लास्टिक का उपयोग बेतहाशा बढ़ गया, और लोग प्लास्टिक कचरा सीधे समुद्र में फेंकने लगे। मछुआरे भी अपने पुराने जाल और प्लास्टिक की बोतलें समुद्र में छोड़ देते थे। उन्हें लगता था कि समुद्र इतना विशाल है कि सब कुछ समा जाएगा। पर्यावरणीय चेतना की कमी ने उन्हें लापरवाह बना दिया था। 

कुछ सालों में, समुद्र में प्लास्टिक के बड़े-बड़े द्वीप बनने लगे। मछलियाँ और समुद्री जीव प्लास्टिक खाने लगे, जिससे उनकी मौत होने लगी। एक दिन, एक भयंकर तूफ़ान आया। लेकिन इस बार, तूफ़ान ने केवल पानी ही नहीं, बल्कि प्लास्टिक के ढेर भी शहर में फेंक दिए। समुद्र तट एक प्लास्टिक के जंगल में बदल गया। शहर की सुंदरता नष्ट हो गई, और पर्यटक आने बंद हो गए। मछुआरों को अब कोई मछली नहीं मिलती थी। 

शहर के मेयर ने एक आपात बैठक बुलाई। उन्होंने कहा, “यह आपदा तूफ़ान से नहीं आई है, बल्कि हमारी अपनी लापरवाही से आई है। हमने समुद्र को कचरे का डिब्बा समझा, और अब समुद्र ने हमें वही वापस कर दिया है।”

शहर के लोगों ने मिलकर एक विशाल सफ़ाई अभियान शुरू किया। उन्होंने समुद्र से प्लास्टिक निकालने का संकल्प लिया और प्लास्टिक के उपयोग को कम करने के लिए सख़्त नियम बनाए। उन्होंने बच्चों को पर्यावरण शिक्षा देना शुरू किया, ताकि भविष्य में ऐसी ग़लती न हो। धीरे-धीरे, वह क़स्बा फिर से साफ़ होने लगा, और लोगों ने सीखा कि समुद्र का सम्मान करना ही उनकी समृद्धि का आधार है। उन्होंने समझा कि प्रकृति को जो दिया जाता है, वही लौटकर आता है। 
 

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