शिव वंदना

01-03-2026

शिव वंदना

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 293, मार्च प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

त्रिपुरारि के सम्मुख झुक कर
अंतर के सब दंभ झरे हैं। 
 
नीलकंठ की मौन तपस्या
विष पीकर भी करुणा जागे। 
डमरू मध्य निनाद लहर में
अन्तस की सब पीड़ा भागे। 
भस्म विभूषित अंग सदा शिव
राग विराग समत्व भरे हैं। 
 
चंद्र कलाधर शंभु शशि से
मन की ज्वाला शीतल करते। 
नयन तृतीय जगे जो भीतर
मोह अँधेरे कहाँ ठहरते। 
कर्म बँध के जाल समूचे
शिव दृष्टि ने नित्य हरे हैं। 
 
नाद ब्रह्म के स्रोत स्वयं तुम
श्वास श्वास में मंत्र भरे हैं। 
पंचाक्षर की पावन ध्वनि से
जीवन के संदेह झरे हैं। 
कैलासों के शिखर सुमंगल
अडिग तुम्हारे ध्यान धरे हैं। 
 
भावन भूत विश्व प्रभु तुम हो
दीन हृदय के एक सहारे। 
कालचक्र के बीच विराजे
शाश्वत जीवन ज्योति सितारे
शिव शिव जपते प्राण हमारे
चेतन से मन द्वार भरे हैं। 
 
करुणाकर की कृपा दृष्टि से
कंटक पथ पर पुष्प भरे हैं। 
त्रिपुरारि के सम्मुख झुक कर
अंतर के सब दंभ झरे हैं। 
 
आप सभी को सपरिवार महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर सुमंगल कामनाएँ!

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