सम्मान, शब्दों की चकाचौंध या आचरण की सच्चाई

01-05-2026

सम्मान, शब्दों की चकाचौंध या आचरण की सच्चाई

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मानव सभ्यता के विकास के साथ जिन मूल्यों ने हमारे सामाजिक जीवन को दिशा दी है, उनमें ‘सम्मान’ का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। सम्मान केवल एक औपचारिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि यह मनुष्य के भीतर की विनम्रता, संवेदनशीलता और संस्कार का सजीव रूप है। परन्तु वर्तमान समय में यह अनुभव बार-बार होता है कि सम्मान अपने मूल स्वरूप से भटक गया है। वह अब आचरण में कम और शब्दों में अधिक दिखाई देता है। वह भाव से अधिक प्रदर्शन बन गया है और जीवन की सहज प्रवृत्ति के बजाय अवसर विशेष का उपकरण बनता जा रहा है। 

आज का युग संचार का युग है। मोबाइल, सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों ने अभिव्यक्ति को अत्यंत सरल और त्वरित बना दिया है। ऐसे में सम्मान की भाषा भी अत्यधिक सुलभ हो गई है। सुबह होते ही “सादर नमन”, “कोटि-कोटि प्रणाम”, “आप महान हैं”, “आप हमारे प्रेरणास्रोत हैं” जैसे संदेशों की भरमार दिखाई देती है। इन शब्दों की सजावट इतनी आकर्षक होती है कि प्रथम दृष्टि में लगता है कि समाज अत्यंत सम्मानशील हो गया है। किन्तु यदि इन शब्दों के पीछे झाँककर देखा जाए, तो एक विचित्र विसंगति सामने आती है इन शब्दों का हमारे व्यवहार से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं रह गया है। 

सम्मान का वास्तविक परीक्षण शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से होता है। यह इस बात से नहीं आँका जाता कि हम किसी के लिए कितने विशेषणों का प्रयोग करते हैं, बल्कि इस बात से निर्धारित होता है कि हम उसके साथ अपने दैनिक जीवन में कैसा व्यवहार करते हैं। यदि घर में बुज़ुर्गों की बातों को अनसुना किया जाता है, यदि माता-पिता की आवश्यकताओं को टाल दिया जाता है, यदि शिक्षक की गरिमा को केवल मंचीय भाषणों तक सीमित रखा जाता है तो यह स्पष्ट संकेत है कि सम्मान केवल शब्दों में जीवित है, आचरण में नहीं। 

इस संदर्भ में एक विद्यालय की घटना अत्यंत शिक्षाप्रद है, जो इस प्रवृत्ति को स्पष्ट रूप से उजागर करती है। यह घटना केवल एक संस्थान की नहीं, बल्कि पूरे समाज की मानसिकता का दर्पण है।

एक प्रतिष्ठित विद्यालय था, जहाँ प्राचार्य महोदय अपनी सादगी, अनुशासन और कार्यनिष्ठा के लिए जाने जाते थे। विद्यालय में उनका स्थान अत्यंत सम्माननीय था। प्रत्येक प्रार्थना सभा में उनका नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता “आदरणीय प्राचार्य जी”, “हमारे मार्गदर्शक”, “संस्था के स्तंभ” जैसे संबोधनों से वातावरण गूँज उठता। शिक्षकगण उनके प्रति सम्मान प्रकट करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे, और छात्र उन्हें आदर्श के रूप में देखते थे। ऐसा प्रतीत होता था कि इस विद्यालय में सम्मान की परंपरा अत्यंत सुदृढ़ है। 

परन्तु एक दिन एक ऐसी घटना घटी, जिसने इस सम्मान की वास्तविकता को उजागर कर दिया। विद्यालय में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बैठक और भोज का आयोजन किया गया। यह आयोजन आवश्यक भी था और औपचारिक भी। सभी शिक्षक, प्रबंधक और कर्मचारी समय पर उपस्थित हो गए। व्यवस्था अत्यंत भव्य थी, चर्चा गंभीर थी, और भोजन की सुगंध वातावरण में घुली हुई थी। 

किन्तु इस पूरे आयोजन में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति अनुपस्थित था प्राचार्य महोदय। 

यह अनुपस्थिति संयोग नहीं, बल्कि एक भूल थी ऐसी भूल, जो केवल विस्मृति नहीं, बल्कि हमारी प्राथमिकताओं को उजागर करती है। जिस व्यक्ति को हम प्रतिदिन “आदरणीय” कहते थे, उसी को इस महत्त्वपूर्ण अवसर पर आमंत्रित करना भूल गए। यह भूल केवल एक व्यक्ति को आमंत्रित न करने की नहीं थी, बल्कि यह उस सम्मान की अनुपस्थिति का प्रमाण थी, जिसे हम शब्दों में बार-बार दोहराते थे। 

अगले दिन विद्यालय का वातावरण कुछ अलग था। प्रार्थना सभा में वही शब्द थे, वही संबोधन थे, परन्तु उनमें एक प्रकार की संकोचपूर्ण असहजता घुली हुई थी। आदरणीय प्राचार्य जी कहते समय स्वर में श्रद्धा के साथ-साथ एक अपराधबोध भी स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता था। 

इसके बाद एक और रोचक दृश्य सामने आया। शिक्षकगण एक-एक कर प्राचार्य कक्ष में पहुँचे और अपनी भूल के लिए क्षमा याचना करने लगे। “सर, कल की भूल अनजाने में हो गई . . . ”, “व्यस्तता इतनी थी कि ध्यान नहीं रहा . . . ”, “आप तो हमारे हृदय में हैं . . . ” ऐसे वाक्यों की शृंखला शुरू हो गई। शब्दों की मिठास और विनम्रता का स्तर अचानक बढ़ गया। मानो सम्मान ने अपने खोए हुए स्थान को पुनः प्राप्त करने के लिए शब्दों की शक्ति का सहारा लिया हो।

प्राचार्य महोदय ने इन सभी बातों को शांत भाव से सुना। उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी ऐसी मुस्कान, जिसमें अनुभव की गहराई और व्यंग्य की महीन रेखा दोनों उपस्थित थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा, परन्तु उनका मौन ही बहुत कुछ कह गया। यह मौन उस सच्चाई को स्वीकार कर रहा था, जिसे शब्दों से ढकने का प्रयास किया जा रहा था। 

कुछ समय बाद स्थिति सामान्य हो गई। सम्मान फिर से अपने स्थान पर स्थापित हो गया कम से कम शब्दों में। प्रार्थना सभा में पुनः वही आदर, वही संबोधन, वही औपचारिकता लौट आई। मानो कुछ हुआ ही न हो। परन्तु इस पूरी घटना ने एक गहरा प्रश्न अवश्य छोड़ दिया क्या हमारा सम्मान वास्तव में सच्चा है, या यह केवल परिस्थितियों के अनुसार बदलने वाला एक औपचारिक व्यवहार है? 

यह घटना हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि सम्मान का वास्तविक स्वरूप क्या है। क्या वह केवल शब्दों में व्यक्त होने वाली भावना है, या वह हमारे व्यवहार में प्रकट होने वाली सच्चाई है? यदि हम किसी व्यक्ति को वास्तव में सम्मान देते हैं, तो वह हमारे कार्यों में भी दिखाई देना चाहिए। वह हमारी प्राथमिकताओं में झलकना चाहिए। वह हमारे निर्णयों में परिलक्षित होना चाहिए। 

वर्तमान समय में सम्मान एक प्रकार का प्रबंधन कौशल बन गया है। हम जानते हैं कि किस समय किस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करना है, किस प्रकार से सामने वाले को प्रसन्न करना है, और किस प्रकार से अपनी भूल को शब्दों की आड़ में छिपाना है। यह एक प्रकार का सामाजिक अभिनय है, जिसमें हम सभी कहीं न कहीं सहभागी बन चुके हैं। 

यह स्थिति केवल विद्यालयों तक सीमित नहीं है। परिवार, समाज, कार्यालय और राजनीति सभी क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। हम सम्मान की भाषा तो सीख गए हैं, परन्तु सम्मान का आचरण भूलते जा रहे हैं। हम यह जानते हैं कि किसे आदरणीय कहना है, परन्तु यह नहीं जानते कि उसे वास्तव में आदर कैसे देना है। 

यदि हम इस स्थिति को बदलना चाहते हैं, तो हमें अपने भीतर झाँकना होगा। हमें यह समझना होगा कि सम्मान शब्दों का नहीं, बल्कि व्यवहार का विषय है। यह हमारे संस्कारों से उत्पन्न होता है और हमारे कर्मों में प्रकट होता है। यदि हमारे आचरण में सम्मान नहीं है, तो हमारे शब्द केवल खोखले प्रतीक बनकर रह जाते हैं। 

अंततः यह कहना उचित होगा कि सम्मान को पुनः उसके वास्तविक स्थान पर स्थापित करने की आवश्यकता है। उसे शब्दों की सीमाओं से निकालकर जीवन की दिनचर्या में उतारना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारा सम्मान केवल मंचों और संदेशों तक सीमित न रहे, बल्कि हमारे व्यवहार में भी उतनी ही स्पष्टता और सच्चाई के साथ प्रकट हो।

क्योंकि वास्तविक सम्मान वही है, जो बिना कहे दिखाई दे

और जो कहने की आवश्यकता ही समाप्त कर दे। 

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