और प्रेम मरता गया
डॉ. सुशील कुमार शर्मा
जिस प्रेम के लिए उन्होंने पूरा संसार छोड़ दिया था, उसी प्रेम को बचाने के लिए बाद में उनके पास समय नहीं बचा। कॉलेज के दिनों में अमित और रागिनी की प्रेम कहानी पूरे परिसर में चर्चा का विषय थी। दोनों एक-दूसरे के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते थे। बारिश की दोपहरें, पुस्तकालय की सीढ़ियाँ, कैंटीन की अधूरी चाय और भविष्य के अनगिनत सपने सब कुछ इस विश्वास पर टिका था कि प्रेम साथ हो तो जीवन की हर कठिनाई छोटी पड़ जाती है। विरोध के बीच विवाह हुआ। दोनों ने सोचा था कि अब संघर्ष बाहर से होगा, भीतर से नहीं।
विवाह के कुछ वर्षों तक सब ठीक रहा। छोटा-सा किराए का मकान भी उन्हें महल लगता था। एक प्लेट में खाना, महीने के अंत में जेब ख़ाली हो जाना और फिर भी देर रात तक बाते करते रहना यही उनका वैभव था। अमित अक़्सर कहा करता था, “रागिनी, मेरे पास धन भले न हो, पर तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।” रागिनी उस पर विश्वास करती थी, क्योंकि प्रेम में दिए गए वचन उस समय ईश्वर की तरह पवित्र लगते हैं।
लेकिन जीवन प्रेम से अधिक ज़िम्मेदारियों की भाषा जानता है। अमित के पिता का देहांत हो गया। घर की पूरी ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर आ गई। वृद्ध माँ थी, छोटा भाई था और सबसे बड़ी चिंता थी अविवाहित बहन सविता की। एक-एक करके रिश्ते आते, दहेज़ की सूची छोड़कर चले जाते। हर असफल रिश्ते के बाद माँ की आँखों में चिंता और गहरी हो जाती। अमित ने अपने मन में एक निर्णय लिया—पहले बहन का विवाह, फिर बाक़ी सब।
यहीं से प्रेम ने पीछे हटना शुरू किया।
रागिनी ने कभी इस निर्णय का विरोध नहीं किया। उसे लगा, परिवार पहले है। उसने अपने छोटे-छोटे सपनों को स्वयं ही समेट लिया। नई साड़ी अगले वर्ष ले लेंगे। घूमना फिर कभी हो जाएगा। मायके कुछ दिन बाद चली जाऊँगी। लेकिन यह ‘कुछ दिन’ धीरे-धीरे वर्षों में बदल गया।
अमित की नौकरी निजी कंपनी में थी। हर महीने नौकरी बची रहे, यही सबसे बड़ी उपलब्धि थी। घर लौटते ही उसके सामने ख़र्चों की फ़ेहरिस्त खुल जाती माँ की दवा, भाई की फ़ीस, बहन की शादी, बच्चों की स्कूल फ़ीस, मकान का किराया, बिजली का बिल। उसके पास अब प्रेम करने का समय नहीं था। वह बुरा आदमी नहीं बना था, बस ज़िम्मेदारियों का क़ैदी बन गया था।
रागिनी कई बार कुछ कहना चाहती। एक शाम उसने धीमे से कहा, “अमित, इस बार माँ के घर चलें? पिताजी बार-बार याद कर रहे हैं।”
अमित ने फ़ाइल से नज़र उठाए बिना कहा, “अभी कैसे जाएँ? अगले सप्ताह लड़के वाले सविता को देखने आ रहे हैं। तुम्हारे बिना घर कैसे चलेगा?”
रागिनी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसे पहली बार लगा कि वह इस घर में पत्नी कम, व्यवस्था का एक आवश्यक हिस्सा अधिक है।
धीरे-धीरे उसने अपनी इच्छाओं की सूची बनानी ही बंद कर दी। इच्छाएँ जब बार-बार टलती हैं तो एक दिन मर जाती हैं। उसने देखा कि उसकी अलमारी में वर्षों से कोई नई साड़ी नहीं आई। उसके जन्मदिन पर अब केक नहीं आता था। विवाह की वर्षगाँठ कभी बच्चों की परीक्षा में खो जाती, कभी किसी किश्त की तारीख़ में। उसे शिकायत नहीं थी; शिकायत करने की आदत भी समाप्त हो चुकी थी।
एक दिन माँ का फोन आया। “बेटी, कब आएगी? तेरे पिताजी की तबीयत ठीक नहीं रहती।”
रागिनी ने वही उत्तर दिया जो वह कई वर्षों से देती आ रही थी, “बस माँ, जल्दी आऊँगी।”
फोन रखते ही उसकी आँखें भर आईं। उसने अमित से कुछ नहीं कहा। उसे मालूम था कि उत्तर वही मिलेगा—“अभी समय ठीक नहीं है।”
समय कभी ठीक नहीं हुआ।
बच्चे बड़े होते गए। बेटा इंजीनियरिंग की तैयारी में लग गया। बेटी को कॉलेज भेजना था। घर में बातचीत का विषय केवल ख़र्च रह गया। कभी माँ की दवा, कभी भाई की नौकरी, कभी बहन की शादी, कभी बच्चों का भविष्य। इस पूरे घर में यदि कोई विषय सबसे कम था तो वह स्वयं रागिनी थी।
एक दिन उसने हिम्मत जुटाकर पूछा, “अमित, तुम्हें कभी यह जानने की इच्छा नहीं होती कि मैं कैसी हूँ?”
अमित ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा—“तुम ठीक ही तो हो।”
रागिनी हल्का-सा मुस्कुराई, “यही तो बात है। तुमने वर्षों से यह मान लिया कि मैं ठीक हूँ।”
यह सुनकर अमित चुप रह गया। उसे लगा, यह कोई शिकायत नहीं, एक लंबी चुप्पी का निष्कर्ष है।
कुछ महीनों बाद रागिनी के पिता का निधन हो गया। जब तक वह पहुँच सकी, अंतिम संस्कार हो चुका था। उसकी माँ ने उसे गले लगाकर केवल इतना कहा, “तेरे बाबूजी आख़िरी साँस तक दरवाज़े की ओर देखते रहे। कहते थे, मेरी बेटी आएगी।”
उस दिन लौटते समय रागिनी रास्ते भर खिड़की से बाहर देखती रही। उसके भीतर कुछ स्थायी रूप से मर चुका था।
समय ने अपना काम जारी रखा। बहन का विवाह हो गया। भाई अलग रहने लगा। बच्चे नौकरी पर चले गए। माँ वृद्ध हो गईं। घर की अधिकांश ज़िम्मेदारियाँ समाप्त हो चुकी थीं। अब पहली बार अमित के पास समय था। उसने एक दिन कहा, “रागिनी, चलो कहीं घूम आते हैं। बहुत वर्षों से कहीं नहीं गए।”
रागिनी ने सिलाई करते-करते सिर उठाया। उसके चेहरे पर न शिकायत थी, न उत्साह।
“अब जाने का मन नहीं करता।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिन इच्छाओं को समय पर पानी नहीं मिलता, वे बाद में हरी नहीं होतीं।”
अमित पहली बार भीतर तक काँप गया।
उसने उसी रात पुरानी अलमारी खोली। एक डिब्बे में कॉलेज के दिनों के पत्र रखे थे। एक पत्र में रागिनी ने लिखा था, “जब हम बूढ़े होंगे, तब हर शाम साथ बैठकर चाय पिएँगे और अपने बच्चों की शरारतों पर हँसेंगे।”
पत्र पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भर आईं। उसे लगा, उसने कभी रागिनी को अपमानित नहीं किया, कभी उस पर हाथ नहीं उठाया, कभी कठोर शब्द भी नहीं कहे। फिर भी वह उससे इतना दूर कैसे हो गया?
उत्तर उसे स्वयं मिल गया।
रिश्ते केवल क्रोध से नहीं टूटते, उपेक्षा भी उन्हें धीरे-धीरे मार देती है। प्रेम की मृत्यु किसी एक घटना से नहीं होती; वह प्रतिदिन कुछ मिनटों की कमी, कुछ अधूरी बातों, कुछ टलती मुलाक़ातों और कुछ अनसुने प्रश्नों में बिखरता रहता है।
अगली सुबह अमित ने दो कप चाय बनाई। बरामदे में बैठी रागिनी के पास जाकर बोला, “क्या हम फिर से शुरू कर सकते हैं?”
रागिनी ने चाय का कप हाथ में लिया। कुछ क्षण तक उसकी भाँप को देखती रही, फिर बहुत शांत स्वर में बोली, “जीवन में सब कुछ लौट आता हैं अमित पैसा, नौकरी, सुविधा, यहाँ तक कि ख़ाली समय भी। लेकिन जो प्रेम समय पर साथ माँगता है और उसे इंतज़ार मिलता है, वह लौटकर कभी वैसा नहीं आता।”
बरामदे में दोनों साथ बैठे थे। सूरज उग रहा था। चाय भी वही थी, दोनों भी वही थे, घर भी वही था। केवल एक चीज़ बदल चुकी थी: प्रेम अब जीवन नहीं था, स्मृति बन चुका था। और स्मृतियाँ कभी घर नहीं बसातीं, वे केवल मन के किसी कोने में चुपचाप निवास करती हैं।
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- गोविन्द गीत— 007 सप्तम अध्याय–भाग 1
- गोविन्द गीत— 007 सप्तम अध्याय–भाग 2
- चंद्रशेखर आज़ाद
- जल है तो कल है
- जीवन
- टेसू
- ठंड पर दोहे
- दीपावली पर दोहे
- ध्यान पर दोहे
- नम्रता पर दोहे
- नरसिंह अवतरण दिवस पर दोहे
- नव वर्ष पर दोहे – 2026
- नवदुर्गा पर दोहे
- नववर्ष
- नूतन वर्ष
- पर्यावरण पर दोहे
- प्रभु परशुराम पर दोहे
- प्रेम
- प्रेम पर दोहे
- प्रेमचंद पर दोहे
- फगुनिया दोहे
- बचपन पर दोहे
- बस्ता
- बाबा साहब अम्बेडकर जयंती पर कुछ दोहे
- बाल हनुमान पर दोहे
- बुद्ध
- बेटी पर दोहे
- मकर संक्रांति
- मधुमास वसंत पर दोहे
- मित्रता पर दोहे–01
- मित्रता पर दोहे–02
- मैं और स्व में अंतर
- रक्षाबंधन पर दोहे
- रक्षाबंधन पर दोहे
- रवींद्र नाथ टैगोर पर दोहे
- राम और रावण
- राम नवमी पर दोहे
- वट सावित्री व्रत पर दोहे
- वसंत पंचमी पर माँ शारदे की आराधना के दोहे
- विवेक
- विवेकानंद जी पर दोहे
- शयन-नियम
- शिक्षक पर दोहे
- शिक्षक पर दोहे - 2022
- श्रम की रोटी पर दोहे
- श्री राधा पर दोहे
- संग्राम
- सीता परित्याग पर दोहे
- सूरज को आना होगा
- स्वतंत्रता दिवस पर दोहे
- हमारे कृष्ण
- हरितालिका व्रत पर दोहे
- हिंदी पर दोहे
- होली
- बाल साहित्य कविता
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- अकड़म बकड़म
- अरे गिलहरी
- आओ बच्चों तुम्हें सुनाएँ
- कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - ठंड
- गर्मी की छुट्टी
- गुल्लू गिलहरी और लल्लू बंदर
- चिड़िया का दुःख
- चिड़िया की हिम्मत
- टेडी बियर टेडी बियर
- डूबी डूबी डिंग डिंग
- पतंग
- पानी बचाओ
- बादल भैया
- बाल कविताएँ – 001 : डॉ. सुशील कुमार शर्मा
- बेचारा गोलू
- मुनमुन गिलहरी
- मैं कुछ ख़ास बनूँगा
- मैं ही तो हूँ— तुम्हारे भीतर
- लोरी
- लौकी और कद्दू की लड़ाई
- हम हैं छोटे बच्चे
- होली चलो मनायें
- नाटक
- हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
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- अमृत काल का आम
- एक कप चाय और सौ जज़्बात
- कविता बेचो, कविता सीखो!
- काश मैं नींबू होता
- कॉकरोच जनता पार्टी और सहमा कॉकरोच
- गुरु दक्षिणा का नया संस्करण—व्हाट्सएप वाला प्रणाम!
- घरेलू मॉडल स्त्री
- डॉ. सिंघई का ‘संतुलित’ संसार
- दो जून की रोटी
- नवदुर्गा महोत्सव और मोबाइल
- न्याय की गली में कुत्तों का दरबार
- प्रोफ़ाइल पिक की देशभक्ति
- मातृ दिवस और पितृ दिवस: कैलेंडर पर टँगे शब्द
- मिठाइयों में बसा मनुष्य का मनोविज्ञान
- वाघा का विघटन–जब शेर भी कन्फ्यूज़ हो गया
- विश्वशान्ति का महायुद्ध
- शर्मा जी और सब्ज़ी–एक हरी-भरी कथा
- स्मृति लेख
- व्यक्ति चित्र
- लघुकथा
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- अंतर
- अंतिम ऑनलाइन
- अंतिम बीज
- अनैतिक प्रेम
- अपनी जरें
- आओ तुम्हें चाँद से मिलाएँ
- आख़िरी रोटी
- आँखों का तारा
- आँसू ताक़त हैं कमज़ोरी नहीं
- उजाले की तलाश
- उसका प्यार
- एक बूँद प्यास
- ऑनलाइन उपस्थिति
- काग़ज़ का जंगल
- काहे को भेजी परदेश बाबुल
- कोई हमारी भी सुनेगा
- गाय ‘पालन की परिभाषा’!
- गाय की रोटी
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- जल देवता का क्रोध
- ज़िन्दगी और बंदगी
- डर और आत्म विश्वास
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- तुलना का बोझ
- दूसरी माँ
- नारी ‘तुम मत रुको’!
- पति का बटुआ
- पत्नी
- परफ़ेक्ट पोज़
- पाँच लघु कथाएँ
- पीड़ा बनी कर्तव्य
- पुरानी मेज़
- पौधरोपण
- प्लास्टिक का जंगल
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- फेंकी हुई रोटियाँ
- बेटी की गुल्लक
- मर्यादा का प्रेम
- माँ ‘छाया की तरह’!
- माँ का ब्लैकबोर्ड
- मातृभाषा
- माया
- मुझे ‘बहने दो’!
- मुझे छोड़ कर मत जाओ
- मौन पहाड़ का बदला
- म्यूज़िक कंसर्ट
- रिश्ते (डॉ. सुशील कुमार शर्मा)
- रेत का आदमी
- रौब
- वो पाँच मिनट
- शर्बत
- शिक्षक सम्मान
- शिक्षा की पाँच दीपशिखाएँ
- शुद्धि की प्रतीक्षा
- शेष शुभ
- सपनों की उड़ान
- सम्मान
- स्मृति के रंग
- स्मृतियों के अवशेष
- स्वार्थ की लक्ष्मण रेखा
- हर चीज़ फ़्री
- हिंदी–माँ की आवाज़
- हिन्दी इज़ द मोस्ट वैलुएबल लैंग्वेज
- सांस्कृतिक आलेख
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- ओशो: रजनीश से बुद्धत्व तक, एक विद्रोही सद्गुरु की शाश्वत प्रासंगिकता
- कृष्ण: अनंत अपरिभाषा
- गणेश चतुर्थी: आस्था, संस्कृति और सामाजिक चेतना का महासंगम
- गीताजयंती कर्म, धर्म और जीवन दर्शन का महामहोत्सव
- चातुर्मास: आध्यात्मिक शुद्धि और प्रकृति से सामंजस्य का पर्व
- जगन्नाथ रथयात्रा: जन-जन का पर्व, आस्था और समानता का प्रतीक
- नर्मदा की अनन्त धारा: एक विद्धत चेतना का आह्वान
- नव संवत्सर: कालचक्र का नवोदय और चेतना का पुनर्जागरण
- नृसिंह का प्राकट्य अन्याय के विरुद्ध उद्घोष
- प्रेम, आत्म-विलय से वैश्विक चेतना तक का महाप्रस्थान
- ब्राह्मण: उत्पत्ति, व्याख्या, गुण, शाखाएँ और समकालीन प्रासंगिकता
- भगवान परशुराम: एक बहुआयामी व्यक्तित्व एवं समकालीन प्रासंगिकता
- भगवान परशुराम: धर्म संतुलन की ज्वाला और युग चेतना का शाश्वत स्वर
- मकर संक्रांति: एक विराट सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विमर्श
- मनुस्मृति: आलोचना से समझ तक
- राम-राष्ट्र की जीवनधारा और शाश्वत चेतना का प्रवाह
- वट सावित्री व्रत: आस्था, आधुनिकता और लैंगिक समानता की कसौटी
- वर्तमान समय में हनुमान जी की प्रासंगिकता
- शिव और शक्ति का महामिलन: महाशिवरात्रि का विराट दर्शन
- हरितालिका तीज: आस्था, शृंगार और भारतीय संस्कृति का पर्व
- ललित निबन्ध
- सामाजिक आलेख
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- अध्यात्म और विज्ञान के अंतरंग सम्बन्ध
- अबला निर्मला सबला
- आप अभिमानी हैं या स्वाभिमानी ख़ुद को परखिये
- आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और गूगल के वर्तमान संदर्भ में गुरु की प्रासंगिकता
- करवा चौथ बनाम सुखी गृहस्थी
- करवा चौथ व्रत: श्रद्धा की पराकाष्ठा या बाज़ार का विस्तार?
- कृत्रिम मेधा (AI): वरदान या अभिशाप?
- गाँधी के सपनों से कितना दूर कितना पास भारत
- गाय की दुर्दशा: एक सामूहिक अपराध की चुप्पी
- गौरैया तुम लौट आओ
- जीवन संघर्षों में खिलता अंतर्मन
- नकारात्मक विचारों को अस्वीकृत करें
- नब्बे प्रतिशत बनाम पचास प्रतिशत
- नया वर्ष कैलेंडर का पन्ना नहीं, आत्ममंथन का अवसर
- नव वर्ष की चुनौतियाँ एवम् साहित्य के दायित्व
- पर्यावरणीय चिंतन
- बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर: समता, न्याय और नवजागरण के प्रतीक
- भारतीय जीवन मूल्य
- भारतीय संस्कृति में मूल्यों का ह्रास क्यों
- माँ नर्मदा की करुण पुकार
- मानव मन का सर्वश्रेष्ठ उल्लास है होली
- मानवीय संवेदनाएँ वर्तमान सन्दर्भ में
- वाह रे पर्यावरण दिवस!
- विद्यालयीन परिवेश में शिक्षक-प्रकृतियाँ
- विश्व पर्यावरण दिवस – वर्तमान स्थितियाँ और हम
- वृद्धजन—अतीत के प्रकाश स्तंभ और भविष्य के सेतु
- वेदों में नारी की भूमिका
- वेलेंटाइन-डे और भारतीय संदर्भ
- व्यक्तित्व व आत्मविश्वास
- शिक्षक पेशा नहीं मिशन है
- शिक्षण का वर्तमान परिदृश्य: चुनौतियाँ, अपेक्षाएँ और भावी दिशा
- संकट की घड़ी में हमारे कर्तव्य
- सम्बन्ध और स्वार्थ का द्वंद्व
- सम्बन्धों का क्षरण: एक सामाजिक विमर्श
- सामाजिक जीवन के मूल्यांकन का विरोधाभास
- स्वतंत्रता दिवस: गौरव, बलिदान, हमारी ज़िम्मेदारी और स्वर्णिम भविष्य की ओर भारत
- स्वामी विवेकानंद: आधुनिक भारत के आध्यात्मिक महाप्राण
- हिंदी और रोज़गार: भाषा से अवसरों की नई दुनिया
- हैलो मैं कोरोना बोल रहा हूँ
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