वो पाँच मिनट

01-02-2026

वो पाँच मिनट

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

​गाँव की पक्की सड़क पर सर्राटे भरती मोटरसाइकिलें और हाथ में चमकते महँगे स्मार्टफोन अब कोई अचरज की बात नहीं थे। समर सिंह का घर भी इस प्रगति का जीवंत उदाहरण था। घर के बाहर चमचमाती एसयूवी खड़ी थी और भीतर हर कमरे में हाई-स्पीड इंटरनेट का साम्राज्य था। 

आज समर सिंह के छोटे भाई का तिलक था। पूरा घर मेहमानों से खचाखच भरा था। आँगन में हलवाई कड़ाही चढ़ाए बैठा था और भीतर के कमरों में युवा पीढ़ी की डिजिटल महफ़िल सजी थी। हर कोई एक ही सोफ़े पर बैठा था, पर सबकी निगाहें अपनी-अपनी स्क्रीन पर गड़ी थीं। कोई तिलक के आयोजन की लाइव स्ट्रीमिंग कर रहा था, तो कोई व्यंजनों की फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर अपडेट डालने में मशग़ूल था। 

तभी बरामदे में बैठे दादाजी को दिल का दौरा पड़ा। वे कुर्सी से लुढ़के और फ़र्श पर आ गिरे। उनके हाथ की लाठी फ़र्श पर टकराई, पर उसका शोर भीतर चल रहे म्यूज़िक सिस्टम और कानों में लगे ‘इयरबड्स’ के कारण किसी को सुनाई नहीं दिया। 

समर सिंह का बेटा बग़ल वाले कमरे में ही बैठा अपने दोस्तों को व्हाट्सएप पर मैसेज कर रहा था “यार! दादाजी की तबीयत कल से कुछ नासाज़ लग रही है।” उसने यह मैसेज तो टाइप कर दिया, पर दो क़दम चलकर बग़ल के कमरे में झाँकने की फ़ुर्सत उसे नहीं मिली। 

काफ़ी देर बाद जब समर सिंह फोटो खिंचवाने के लिए दादाजी को बुलाने बाहर आए, तो मंज़र देखकर उनके हाथ-पाँव फूल गए। उन्होंने चीखकर सबको आवाज़ लगाई। पलक झपकते ही घर के बाहर खड़ी गाड़ियाँ स्टार्ट हो गईं, पक्की सड़क के कारण चंद मिनटों में दादाजी अस्पताल भी पहुँच गए। तकनीक और सुविधाओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। 

​डॉक्टर ने जाँच के बाद एक गहरी साँस ली और कहा, “इलाज में कोई कमी नहीं रही समर सिंह जी, और न ही अस्पताल लाने में देरी हुई। बस मलाल इस बात का है कि अगर गिरने के तुरंत बाद, यानी उन पहले पाँच मिनटों में किसी ने उन्हें सँभाल लिया होता, तो यह नौबत न आती। शरीर ठंडा पड़ने के बाद अस्पताल लाने का कोई अर्थ नहीं रहता।”

​हॉस्पिटल के गलियारे में सन्नाटा पसर गया। समर सिंह के बेटे के मोबाइल की स्क्रीन अभी भी जल रही थी, जिस पर किसी दोस्त का रिप्लाई आया था, “दादाजी का ध्यान रखना भाई!”

​वह संदेश पढ़कर उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े। उसके पास दुनिया की सबसे तेज़ मोटरसाइकिल थी, घर के दरवाज़े तक पक्की सड़क थी और हाथ में पूरी दुनिया से जोड़ने वाला मोबाइल भी था, पर वह पाँच मिनट का वह फ़ासला तय नहीं कर पाया जो उसके कमरे और दादाजी के बरामदे के बीच था। 
​उस दिन सबको समझ आया कि सड़कें कितनी भी चौड़ी हो जाएँ और गाड़ियाँ कितनी भी तेज, अगर मन की खिड़कियाँ अपनों के लिए बंद हैं, तो हम सबसे पिछड़े हुए लोग हैं। 
​ एक यक्ष प्रश्न क्या हम सुविधाओं के हाईवे पर दौड़ते हुए संवेदनाओं की पगडंडी खो चुके हैं? 

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