हमारा वो ज़माना

15-01-2026

हमारा वो ज़माना

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

हम
सन् उन्नीस सौ साठ से
नब्बे तक जन्मे लोग
कोई एक तारीख़ नहीं
एक पूरा अनुभव हैं
जो आज
कैलेंडर में उम्र बढ़ाता हुआ
स्मृतियों में और गहराता जा रहा है। 
 
हम वह पीढ़ी हैं जिसने
सिक्कों को
हथेली पर रखकर
ख़ुशी का वज़न तौला
और आज
डिजिटल अंकों में
ज़िंदगी का हिसाब समझती है। 
 
हमने स्याही की गंध में
पहला अक्षर लिखा
पेंसिल के छिलके में
अपना धैर्य पहचाना
और आज
उँगलियों की नोक से
पूरी दुनिया खोल लेते हैं
फिर भी
कभी-कभी
क़लम की खड़खड़ाहट
ज़्यादा सच्ची लगती है। 
 
हमारे बचपन में
साइकिल
सिर्फ़ साधन नहीं
सपना थी
और आज
कार की चाबी जेब में रखकर भी
हम
पैदल चलती यादों में
ख़ुद को हल्का महसूस करते हैं। 
 
हमने
टेप रिकॉर्डर के बटन पर
गीत नहीं भाव दबाए
ट्रांजिस्टर की आवाज़ में
पूरा महल्ला समेटा
और आज
हाई डेफ़िनिशन साउंड में भी
कभी-कभी
मन की आवाज़ खो जाती है। 
 
हम वह आख़िरी बच्चे थे
जिनका बचपन
मार्कशीट और टीआरपी से
अलग रहा
जो खेलते थे रिंग्स से
टायर से, सलाई से
और जिन्हें
खेल का सर्टिफ़िकेट
कभी नहीं चाहिए था। 
 
कच्चा आम तोड़ना
चोरी नहीं
मौसम से दोस्ती थी
किसी भी घर की कुंडी खटखटाना
अपराध नहीं
रिश्तों की सहजता थी। 
 
दोस्त की माँ का खाना
उपकार नहीं
घर जैसा स्वाद था
और
दोस्त के पिताजी की डाँट
ईर्ष्या नहीं
अपनापन थी। 
 
हम
अपनी बहनों से
खुलेआम उलझते थे
और जानते थे
शाम तक
सब ठीक हो जाएगा। 
 
दो दिन कोई दोस्त न दिखे
तो
बस्ता उठाकर
उसके घर पहुँचना
यही हमारी
सोशल मीडिया थी। 
 
स्कूल में
किसी के पापा आ गए
तो
दौड़ती हुई ख़बर
ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती थी
बिना कैमरे
बिना एंकर। 
 
हम महल्ले के
हर काम में
अपने आप शामिल थे
क्योंकि
समाज हमारे लिए
अलग शब्द नहीं
अपना आँगन था। 
 
हमने
गावस्कर की बल्लेबाज़ी
और
कपिल का हौसला देखा
पीट सम्प्रस की सर्विस
और
स्टेफ़ी ग्राफ की दृढ़ता जानी। 
 
हम
राज से, अमिताभ तक
और
राजेश खन्ना से, शाहरुख तक
दिल बदलते रहे
बिना अपराधबोध के। 
 
हमने
पैसे जोड़कर
वीसीआर किराए पर लिया
और
एक साथ
कई फ़िल्में देखीं
जिनमें
हम ख़ुद को खोजते थे। 
 
शिक्षक की मार
हमें तोड़ती नहीं थी
बस यह डर रहता था
कि
घर तक बात न पहुँचे
क्योंकि
वहाँ
संस्कारों की
अगली कक्षा थी और
फिर से पिटाई का डर था। 
 
हम
शिक्षक को
कभी जवाब नहीं देते थे
और
दशहरे पर
आज भी
उन्हीं के चरणों में
सम्मान रख आते हैं। 
 
हमारे पास
मोबाइल नहीं था
पर
इंतज़ार था
जो आज
सबसे महँगा हो गया है। 
 
हम
पंकज उधास की
ग़ज़ल सुनकर
चुपचाप
आँखें पोंछ लेते थे
क्योंकि
भावनाओं का
प्रदर्शन
ज़रूरी नहीं था। 
 
हमारे लिए
प्यार
घोषणा नहीं
संकोच था
और
शादी
साहस का दूसरा नाम। 
 
बालवाड़ी नहीं
सीधे स्कूल
और
अगर न भी जाएँ
तो
जीवन
रुकता नहीं था। 
 
हम
अकेले स्कूल जाते थे
और
माता-पिता
डर से नहीं
भरोसे से जीते थे। 
 
प्रतिशत नहीं
पास या फ़ेल
और
ट्यूशन
कमज़ोरी मानी जाती थी। 
 
किताबों में
मोरपंख
और
पत्तियाँ रखकर
हम
ज्ञान को
मंत्र की तरह मानते थे। 
 
कपड़े की थैली
और
टिन का बक्सा
हमारी रचनात्मकता थी
जिसमें
सपने भी
सहेजे जाते थे। 
 
पुरानी किताबें बेचना
शर्म नहीं
संस्कार था। 
 
साइकिल के डंडे
और
कैरियर पर बैठकर
हमने
संतुलन सीखा
जो आज
जीवन में
काम आता है। 
 
नंगे पाँव
गली क्रिकेट
और
किसी भी गेंद से
खेलने का सुख
आज भी
किसी स्टेडियम से बड़ा है। 
 
हमने
पॉकेट मनी नहीं माँगी
और
ज़रूरतें छोटी थीं
पर
दिल भरे हुए थे। 
 
दिवाली की
फुलझड़ी
एक-एक करके
फोड़ना
हमारी
समझदारी थी। 
 
हमने
कभी
आई लव यू नहीं कहा
पर
हर काम में
प्यार रखा। 
 
आज
हम संघर्ष में हैं
कहीं पहुँचे
कहीं रुके
पर
अब भी
सपनों से जुड़े हैं। 
 
हम
दुनिया में कहीं भी हों
लेकिन
हम जानते हैं
हमने
ज़िंदगी को
छुआ है
ओढ़ा है
जिया है। 
 
हम अच्छे हों
या बुरे
पर
इतना सच है
कि
हमारा भी
एक ज़माना था
और
वही ज़माना
आज भी
हमें
ज़िंदा रखे हुए है। 

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