कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - जीवन

15-06-2026

कुण्डलिया - डॉ. सुशील कुमार शर्मा - जीवन

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

1.
निकली जाती उम्र अब, ढोती मन संताप। 
दिन भर खटता आदमी, दुःख सहे चुपचाप॥
दुःख सहे चुपचाप, नहीं मिल पाती राहत। 
चिंताओं के बीच, हृदय में सुख की चाहत। 
कह सुशील कविराय, दौड़ महँगाई आती। 
अच्छे दिन की चाह, उम्र अब निकली जाती॥
 
2.
सूनी है संवेदना, मरते हुए विचार। 
घर के भीतर क़ैद हैं, अपने ही परिवार॥
अपने ही परिवार, आदमी कब मुस्काता। 
स्क्रीनों के ही संग, बचा बस रिश्ता नाता। 
कह सुशील कविराय, ज़िन्दगी लगती ऊनी। 
बदल गया संसार, ख़ुशी भी सूनी-सूनी॥
 
3.
जीवन है अब यंत्र सा, भाग रहा इंसान। 
सुख की ख़ातिर खो रहा, मन का सुंदर गान॥
मन का सुंदर गान, मशीनों जैसा जीना। 
रिश्ते सब बदहाल, घूँट कड़वे ही पीना। 
कह सुशील कविराय, व्यथित मानव का है मन। 
ऊपर है मुस्कान, कठिन अंतस का जीवन॥

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