अंतिम ऑनलाइन
सुनील कुमार शर्मा
वह वृद्ध शिक्षक अपने छोटे से कमरे में अकेले बैठे थे। सामने दीवार पर टँगी घड़ी की टिक-टिक कमरे की निस्तब्धता को और गहरा कर रही थी।
उन्होंने जीवन भर बच्चों को पढ़ाया था। शब्दों को अर्थ दिया था और अक्षरों को जीवन। अब वही अक्षर उनके मोबाइल की स्क्रीन पर छोटे-छोटे बिंदुओं में सिमट गए थे।
उन्होंने अपने बेटे को संदेश भेजा: “बेटा, कैसे हो?”
स्क्रीन पर देखा कि बेटा “ऑनलाइन” है।
उनकी आँखों में आशा चमकी। वे प्रतीक्षा करने लगे। पाँच मिनट बीते। दस मिनट बीते। फिर स्क्रीन पर देखा तो बेटा ऑफ़लाइन हो गया था।
उत्तर नहीं आया।
उन्होंने मोबाइल को धीरे से मेज़ पर रख दिया। उन्हें याद आया, जब उनका बेटा छोटा था, तो एक पल के लिए भी उनकी उँगली नहीं छोड़ता था।
उन्होंने फिर संदेश लिखा: “समय मिले तो बात करना।”
इस बार संदेश के आगे केवल एक टिक बना रहा।
रात गहराती गई। कमरे की दीवारें और पास आ गईं। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। सामने की इमारत में हर खिड़की में रोशनी थी, पर उनके हिस्से का अँधेरा कहीं अधिक सघन था।
अचानक मोबाइल में ध्वनि हुई। उन्होंने काँपते हाथों से स्क्रीन देखी।
बैंक का संदेश था: “आपकी पेंशन जमा हो गई है।”
उन्होंने एक फीकी मुस्कान दी। अब उन्हें समझ में आ गया था कि इस संसार में वे केवल बैंक के लिए जीवित थे, अपने लोगों के लिए नहीं।
उन्होंने अंतिम बार मोबाइल खोला। बेटे का नाम देखा। कुछ लिखना चाहा, पर शब्द नहीं मिले।
स्क्रीन पर अभी भी दिख रहा था कि बेटा ऑनलाइन है।
पर इस बार वे स्वयं ऑफ़लाइन हो चुके थे धीरे-धीरे, भीतर से।
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