मन फागुन

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

छाई मस्ती
रंग गगन में
फागुन आया
किसे बुलाएँ? 
 
कानों में फिर
मीठी सरगम
छेड़े कान्हा
बंसी धुन में, 
चंचल मन को
कौन मनाए? 
गोरी हँसती 
भर पिचकारी
रंग गुलाबी
भीगे चुनरी
कौन बचाए? 
 
टेसू चमके, धूप मचलती
रंग उछाले
प्रेम सजाएँ। 
 
ढोलक पर ही
थिरक रही है
ताल सजीली, 
क़दम मिलाकर
रास रचाएँ। 
मन के आँगन
भरी उमंगें
साँस-साँस में
धड़कन बोले
किसे सुनाएँ? 

रूठे मन भी गले मिलें अब
प्रेम तराना
सब मिल गाएँ। 
 
भीगी अँखियाँ
चमके बिंदी
नयनन काजल 
सुरमे वाला, 
साँसों में भी
गंध समाए। 
फागुन बोए
गीत सुनहरे
प्रीति पुकारे
रंग समर्पित
मन को भाए। 
 
आज न कोई लगे पराया 
रंग बहाना
दिल मिल जाएँ। 

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