नारी

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 294, अप्रैल प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

धूप सहेजे
निज आँचल में
चलती जीवन पथ पर नारी। 
 
भोर जगे
तो रोटी खींचे। 
साँझ ढले 
सपनों को सींचे। 
थककर भी मुस्काती रहती
ज्यों नदिया की धारा बहती। 
 
घर आँगन में
संस्कारों की
रोपे हर दिन नयी क्यारी। 
 
कभी धरातल
कभी हिमालय
कभी अग्नि सी दृढ़ संकल्पित
कभी लगे यह मौलिक रचना
कभी लगे ये सपना कल्पित। 
 
ममता में
सागर सी गहरी 
हृदय भरे उजली फुलवारी। 
 
अब सीमाएँ
टूट रहीं हैं
पंख नए विश्वास गढ़े हैं। 
धरती से आकाश छू रही
नारी के अब स्वप्न बड़े हैं। 
 
घर भी उसका
जग भी उसका
नई सदी की दृढ़ अधिकारी। 
 
नारी केवल
नाम नहीं है
नारी सृष्टि को रचती है। 
नारी ही अस्तित्व बनाती
नारी से आभा जँचती है। 
 
धूप सहेजे
वो आँचल में
चलती जीवन पथ पर नारी। 

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