अधूरी देहरी का मौन

01-01-2026

अधूरी देहरी का मौन

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

साँझ के झुटपुटे में माधव दालान की उस पुरानी आरामकुर्सी पर पसरा था जिसकी एक टाँग अरसे से हिल रही थी। घर के भीतर से खड़बड़ाहट की आवाज़ें आ रही थीं। उसकी बड़ी बेटी विभा अपना बोरिया-बिस्तर समेट रही थी। वह शहर के एक बड़े दफ़्तर में लग गई थी और आज घर छोड़कर जा रही थी। माधव की इच्छा हुई कि उठकर पास जाए, दो मीठे बोल बोले, पर उसके भीतर का वह पुराना ‘डर’ और ‘संकोच’ जोंक की तरह चिपक गया। 

पल्लवी रसोई से निकली, पसीने से तर-बतर। उसने माधव को यूँ निढाल देखा तो ठिठक गई। 

“विभा जा रही है, कुछ कहोगे नहीं उससे? बस पत्थर हुए बैठे रहोगे?” पल्लवी की आवाज़ में बरसों की कड़वाहट और थकन घुली थी। 

माधव ने नज़रें चुरा लीं, “क्या कहूँ? उसे जो करना था, उसने किया। मुझसे कब पूछा उसने?” 

“पूछती तो क्या आप रास्ता दिखा देते?” पल्लवी ने तंज़ कसा, “जब उसे दाख़िले के लिए पैसों की ज़रूरत थी, आप भाग्य को कोस रहे थे। जब वह इंटरव्यू के लिए डर रही थी, आप कमरे में कुंडी मारकर सो रहे थे ताकि उसकी घबराहट का सामना न करना पड़े। अब वह अपने दम पर खड़ी है, तो आपको अपनी मर्यादा की चिंता सता रही है?” 

माधव कुछ न बोला। उसे याद आया बचपन का वह दिन जब माँ ने उसे मामा के साथ ननिहाल भेजते समय झिड़का था, “जा, यहाँ रहकर मेरा सिर मत खा, दर-दर की ठोकरें खाएगा तभी अक़्ल ठिकाने आएगी।” माँ की वह कर्कश वाणी आज भी उसके कानों में पिघले सीसे जैसी उतरती थी। उसी दिन से उसने चुनौतियों से आँख मिलाना छोड़ दिया था। 

विभा कमरे से बाहर आई। उसने अपनी माँ के पैर छुए। फिर वह माधव के पास आकर रुक गई। माधव के मन में ज्वार उमड़ा ‘बेटी, मत जा, मुझे अकेलेपन से डर लगता है।’ पर ज़ुबान पर वही खोखलापन था। 

“बाबूजी, मैं निकल रही हूँ,” विभा ने सधे हुए स्वर में कहा। उसमें वही आत्मविश्वास था जो माधव में कभी नहीं पनप पाया। 

माधव ने बिना नज़रें मिलाए कहा, “ठीक है। ध्यान रखना। जमाना ख़राब है।” 

विभा की आँखों में एक क्षण को नमी आई, फिर वह सख़्त हो गई। “ज़माना ख़राब है या हम कमज़ोर हैं, यह तो देखने का नज़रिया है बाबूजी। आपने तो हमेशा भाग्य के पीछे छिपना सिखाया, पर माँ ने मुझे लड़ना सिखाया। काश, एक बार आपने पीठ थपथपा कर कहा होता कि ‘मैं हूँ ना’, तो शायद यह दूरी इतनी न बढ़ती।” 

माधव का गला रुँध गया, पर वह कुछ न बोल सका। विभा चली गई। रिक्शे की आवाज़ धीरे-धीरे धुँधली हो गई और घर में फिर वही सन्नाटा पसर गया जो माधव की आत्मा का स्थायी निवासी था। 

♦ ♦

रात के भोजन पर पल्लवी ने थाली माधव के सामने रखी। सादा भोजन, पर उसमें पल्लवी की ममता का स्वाद था जिसे माधव ने कभी स्वीकार ही नहीं किया। 

“तुम मुझे हमेशा दोषी क्यों मानती हो पल्लवी?” माधव ने निवाला तोड़ते हुए पूछा। 

पल्लवी सामने बैठ गई, उसकी आँखों में आज आक्रोश नहीं, एक गहरी पीड़ा थी। “दोषी आप नहीं हैं माधव जी, दोषी वह झूठ है जो आप ख़ुद से बोलते आए हैं। जब आपकी नौकरी छूटी थी, मैंने कहा था कि छोटा-मोटा काम शुरू कर लेते हैं, पर आपने क्या कहा था? ‘मेरी क़िस्मत में ही दरिद्रता लिखी है, विधाता ने यही बदा है।’ आपने अपनी बुज़दिली को ‘क़िस्मत’ का चोला पहना दिया।” 

“मेरी माँ ने बचपन से मुझे यही सिखाया कि मैं कुछ नहीं कर सकता,” माधव ने बचाव करना चाहा। 

“तो क्या आप ताउम्र उस बचपन की बेड़ी में बँधे रहेंगे?” पल्लवी ने टोका, “मैं आपकी पत्नी थी, आपकी दासी नहीं। मुझे प्यार चाहिए था, सुरक्षा चाहिए था। पर आप तो अपनी ही छाया से डरते रहे। आपने मुझे कभी अपना माना ही नहीं, आप तो बस अपनी असफलताओं को सहलाते रहे।” 

माधव ने थाली ढकेल दी। उसे अपना अस्तित्व एक ऐसे ख़ाली कुएँ जैसा लगा जिसमें कितनी भी संवेदनाएँ डालो, कोई प्रतिध्वनि नहीं आती। 

माधव के अंतर्मन में स्मृतियों का एक झरोखा खुला और वह सीधे उस दुपहरी में जा गिरा, जब वह मात्र दस वर्ष का था। वह घटना उसके जीवन का वह मोड़ थी, जहाँ से उसने चुनौतियों को देख पीठ फेरने का हुनर सीखा था। 

ननिहाल के उस गाँव में एक ऊँचा बरगद का पेड़ था, जिस पर गाँव के सारे लड़के चढ़कर ऊपर लगी पीली टहनियों को छूने की होड़ लगाते थे। उस दिन माधव भी लड़कों के बीच खड़ा था। 

“का रे माधव, तू त डरे क मारे थर-थर कांपत बागड़ू! तोसे ना होई,” उसके हमउम्र साथी सुक्खू ने चिढ़ाया। 

माधव का कलेजा धक-धक कर रहा था। उसके भीतर एक ललक थी कि वह भी ऊपर चढ़े और सबको दिखा दे कि वह कमज़ोर नहीं है। उसने हिम्मत जुटाकर तने को पकड़ा और दो-चार हाथ ऊपर चढ़ा। तभी नीचे खड़े नाना जी की कड़क आवाज़ गूँजी—

“अरे ओ माधव! नीचे उतर! तोर बस के ना बा। गिरब त हड्डी-पसली एक हो जाई। तोर माई पहिले ही कहले रहे कि ई लड़का डरपोक बा, एकरा से कुछ ना होई।”

नाना की वह बात माधव के कानों में बिजली की तरह कौंधी। उसे अपनी माँ का वह चेहरा याद आया जो हमेशा उसे ‘नकारा’ और ‘अभागा’ कहकर पुकारती थी। माधव के हाथ काँपने लगे। वह वहीं बीच में लटक गया। न ऊपर जाने का साहस बचा, न नीचे उतरने का धैर्य। 

“देखा! मैं कहता था न ये कायर है!” सुक्खू नीचे से हँसा। 

माधव उस दिन रोते हुए नीचे उतरा। उसने उस पेड़ को फिर कभी नहीं छुआ। उसी दिन उसने अपने मन में एक गाँठ बाँध ली—‘मैं कुछ नहीं कर सकता, मेरी नियति में हारना ही लिखा है।’

अतीत के उस गलियारे से लौटकर माधव ने एक लंबी ठंडी साँस भरी। सामने पल्लवी अलमारी साफ़ कर रही थी। अचानक उसके हाथ से एक पुराना फोटो फ़्रेम नीचे गिरा और उसका शीशा किरच-किरच हो गया। 

माधव हड़बड़ाकर उठा, “देखा! तुमसे कुछ सहेज कर नहीं रखा जाता। अब यह टूट गया, अपशकुन हो गया।”

पल्लवी ने शांत भाव से काँच के टुकड़े समेटते हुए माधव की ओर देखा। उसकी आँखों में दया का भाव था। “अपशकुन काँच टूटने से नहीं होता माधव जी, अपशकुन तब होता है जब इंसान भीतर से टूट जाए और उसे जोड़ने की कोशिश भी न करे। यह फोटो फ़्रेम तो नया लग जाएगा, पर जो विश्वास आपने बरसों पहले तोड़ा था, उसका क्या?” 

“मैंने क्या तोड़ा?” माधव की आवाज़ में एक झूठी तड़प थी। 

“आपने उम्मीद तोड़ी,” पल्लवी ने खड़े होते हुए कहा। “जब हमारी बड़ी बेटी बीमार थी और आपको रात में डॉक्टर के पास जाना था, आप दरवाज़े पर खड़े होकर बारिश देखते रहे। आपने कहा कि ‘शायद भगवान की यही मर्ज़ी है कि हम कष्ट सहें’। तब मैं अकेले उसे कंधे पर लादकर ले गई थी। वह बारिश का पानी तो सूख गया, पर मेरी आत्मा पर जो बर्फ़ जमी, वह आज तक नहीं पिघली।”

माधव निरुत्तर था। उसे याद आया कि उस रात भी उसे उसी ‘बरगद के पेड़’ वाला डर लगा था। उसे लगा था कि वह बाहर जाएगा तो गिर जाएगा, असफल हो जाएगा। उसने भागने का रास्ता चुना—‘ईश्वर की मर्ज़ी’ का बहाना बनाकर। 

पल्लवी कमरे से बाहर चली गई। माधव ने खिड़की के बाहर देखा। एक छोटा सा बच्चा अपने पिता की उँगली पकड़कर चल रहा था। पिता उसे बार-बार छोड़ रहा था ताकि बच्चा ख़ुद संतुलन बनाना सीखे। बच्चा गिरता, फिर उठता और खिलखिलाकर पिता की गोद में कूद जाता। 

माधव की आँखों में आँसू आ गए। उसने अपनी बेटियों को कभी गिरने ही नहीं दिया, क्योंकि उसे डर था कि वह उन्हें उठा नहीं पाएगा। और जब वे बड़ी हुईं, तो उन्होंने माधव का हाथ पकड़ना ही छोड़ दिया। 

उसने मेज़ पर रखे पानी के गिलास को उठाना चाहा, पर उसके हाथ काँप रहे थे। यह कम्पन बुढ़ापे का नहीं था, यह उस अस्थिर इच्छाशक्ति का था जिसने उसे ताउम्र ‘अपूर्ण’ रखा। 

उसने बुदबुदाते हुए कहा, “मैं जिया तो सही, पर कभी जीवित नहीं रहा। मैंने सिर्फ़ साँसें लीं, पर कभी संघर्ष की सुवास नहीं ली।”

घर के कोने में रखी पुरानी दीवार घड़ी टिक-टिक कर रही थी, मानो कह रही हो समय बीत गया माधव, अब केवल सन्नाटा शेष है। वह सचमुच एक ऐसा वृक्ष था जिसके पास जड़ें तो थीं, पर फल और छाया देने का सामर्थ्य उसने ख़ुद ही मार डाला था। 

♦ ♦

महीने बीत गए। छोटी बेटी ने भी अपनी राह चुन ली। वह माधव से बिना मिले ही चली गई, सिर्फ़ एक पत्र छोड़ गई “बाबूजी, आपसे बात करने की कोशिश की, पर आपकी चुप्पी मुझे डराती है। मुझे लगता है जैसे आप वहाँ हैं ही नहीं। आप एक हाड़-मांस के पुतले मात्र बनकर रह गए हैं।” 

आज माधव उसी कुर्सी पर बैठा है। पल्लवी दूसरे कमरे में माला जप रही है। वह अब उससे कुछ नहीं कहती। उसे अहसास हो गया है कि माधव वह ज़मीन है जहाँ कोई बीज नहीं पनप सकता। 

माधव ने अपने काँपते हाथों को देखा। ये हाथ किसी का सहारा नहीं बन सके। यह व्यक्तित्व जो चुनौतियों को देखकर पीठ फेर लेता था, आज ख़ुद अपनों से पीठ फेर कर खड़ा है। वह पूर्ण होने की देहरी तक तो पहुँचा, पर भीतर क़दम रखने का साहस न जुटा सका। 

खिड़की से आती ठंडी हवा उसे बता रही थी कि रात गहरा गई है। पर माधव के लिए तो वह रात बरसों पहले ही शुरू हो गई थी, जिसकी कोई सुबह नहीं थी। वह सचमुच पूर्ण न हो सका न बेटा, न पति, न पिता। बस एक अवशेष, एक रिक्तता।

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