स्वप्न फिर छिटक गया

15-03-2026

स्वप्न फिर छिटक गया

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 294, मार्च द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मुट्ठियों में भरा हुआ आकाश खिसक गया।
स्वप्न फिर छिटक गया।
 
भोर हुई
तो धूप ने पंख पसारे।
दोपहर
थकी छाँहों में दिन उतारे।
 
साँझ ढली तो मन का पंछी भटक गया।
स्वप्न फिर छिटक गया।
 
रस्ते
चलते चलते थम से जाते।
लोग मिले
पर अपने कहाँ कहाते।
 
भीड़ भरे इस मेले में मन सटक गया।
स्वप्न फिर छिटक गया।
 
आशा के
दिये टिमटिमाते रहे।
शब्द अर्थ
काग़ज़ पर गुनगुनाते रहे।
 
किस मोड़ पर गीतों का सुर अटक गया।
स्वप्न फिर छिटक गया।
 
कल फिर
कोई नई राह बुलाएगी।
धूप नई
अंतर में दीप जलाएगी।
 
रात कहे सोया सूरज फिर जग गया
स्वप्न फिर छिटक गया।
 

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