जीने की प्रतीक्षा में जीवन

01-05-2026

जीने की प्रतीक्षा में जीवन

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मनुष्य
कभी सचमुच जीता नहीं
वह केवल
जीने की एक दीर्घ प्रतीक्षा में
अपने दिनों को टाँकता रहता है
वह सुबह उठता है
मानो आज नहीं
कल के लिए साँस ले रहा हो
हर धड़कन
एक अधूरी कामना का विस्तार होती है
वह कहता है
जब यह मिल जाएगा
तब जीऊँगा
जब यह समय बीत जाएगा
तब मुस्कराऊँगा
जब ये दायित्व हल्के हो जाएँगे
तब स्वयं को सुन पाऊँगा
पर वह तब
कभी आता नहीं
समय
उसकी हथेलियों से
रेत की तरह फिसलता रहता है। 
 
वह वर्तमान को
एक अस्थायी पड़ाव मानकर
भविष्य की किसी कल्पित मंज़िल पर
अपना समूचा विश्वास रख देता है, 
और इसी विश्वास में
वह आज को खो देता है
उसके पास
स्मृतियों का एक संग्रह होता है
और आशाओं का एक अनंत विस्तार
पर जीने का क्षण
कहीं बीच में
अनदेखा रह जाता है
वह प्रेम करता है
पर कह नहीं पाता
वह रोता है
पर स्वीकार नहीं करता
वह हँसता है
पर भीतर कहीं
एक रिक्तता काँपती रहती है
वह जीवन को
एक उपलब्धि बना देता है
जबकि जीवन
एक अनुभव था
जिसे वह टालता रहा
उसकी आँखों में
हमेशा एक प्रतीक्षा रहती है
जैसे वह स्वयं से कह रहा हो
अभी नहीं
थोड़ा और रुक जाऊँ
फिर जी लूँगा। 
 
पर मृत्यु
कभी प्रतीक्षा नहीं करती
वह अचानक आकर
उसकी सारी संभावनाओं को
एक शांत विराम में बदल देती है
तब उसके अधूरे स्पर्श
उसकी अनकही बातें
उसके टाले गए निर्णय सब
समय के शून्य में बिखर जाते हैं
और पीछे रह जाती है
एक गहरी विडंबना
कि मनुष्य
जिस जीवन को जीने के लिए जन्मा था
वह उसे
जीने की तैयारी में ही
व्यतीत कर गया। 
 
यह कविता नहीं
एक प्रश्न है
जो हर हृदय से पूछता है
क्या तुम सचमुच जी रहे हो
या केवल
जीने की आशा में
अपना वर्तमान खो रहे हो
क्योंकि जीवन
किसी भविष्य का पुरस्कार नहीं
वह यह क्षण है
जो अभी
तुम्हारी साँसों में धड़क रहा है
और जिसे तुम
फिर भी
कल के नाम लिखते जा रहे हो। 
 

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