प्रमाणित इतिहास पर आधारित साहित्य की क्या शक्ति है?

 

प्रिय मित्रो,

अंक प्रकाशन में एक-दो दिन का विलम्ब हुआ, इसका खेद है। जैसा कि आपको याद होगा कि पिछले महीने में मैंने इतिहास से सम्बन्धित साहित्य के विषय पर सम्पादकीय लिखा था और इसके बाद एक उत्साहपूर्ण जीवंत चर्चा आरम्भ हुई थी, जो दो-तीन दिन चलती रही। इस सम्पादकीय में भी उसी विषय को लेकर अपनी बात को आगे बढ़ा रहा हूँ।

साहित्य कुञ्ज के व्हाट्स ऐप समूह में आप सभी ने दिनेश माली जी की पोस्ट देखी होगी। दिनेश जी की पोस्ट में प्रकाशित समाचार का शीर्षक है “शहीद बिका नाएक का ऐतिहासिक सम्मान: दिनेश कुमार माली के उपन्यास ने दिलाई नई पहचान”। यह उपन्यास साहित्य कुञ्ज में “साहित्य कुञ्ज की पुस्तकें” में अप्रैल २०२५ से अगस्त २०२५ के अंकों में प्रकाशित हो चुका है। इस उपन्यास के प्रकाशन के उद्देश्य जो जानने के लिए आपको उपन्यास में दिनेश कुमार माली जी के ’पुरोवाक्‌’ को पढ़ने के लिए आप सभी को आमन्त्रित करता हूँ। उपन्यास का लिंक है: शहीद बिका नाएक की खोज

उपन्यास के पुरोवाक्‌ में दिनेश जी कहते हैं “यह उपन्यास न केवल ओड़िशा के गड़जात राज्यों में हुए प्रजा-मंडल आंदोलन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालता है, बल्कि महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ़्रीका से भारत लौटने के बाद पूरे देश में हो रहे स्वतंत्रता आंदोलन हेतु संकल्पबद्ध जन-चेतना की भी सम्पूर्ण व्याख्या करता है। इस उपन्यास में बिका नाएक ओड़िशा के तालचेर प्रजा-मंडल का प्रथम शहीद है, जिसका नाम भारत सरकार की शहीदों की विवरणिका में भी अंकित है, मगर आज तक जातिगत भेदभाव के कारण उसकी दिवंगत आत्मा को—जिस सम्मान का वह सच में हक़दार था—उसे आज तक नहीं मिला। यहाँ तक कि उसके गाँव चंद्रबिल में उसके नाम के स्कूल का नाम (शहीद बिका नाएक मिडिल स्कूल) को बदलकर ‘बड़त्रिबिडा मिडिल’ स्कूल रख दिया गया। जिस सिंगड़ा नदी के किनारे वह अँग्रेज़ों की गोली का शिकार हुआ था, उसकी स्मृतियों को अक्षुण्ण रखने के लिए उस नदी पर बने पुल का नाम ’शहीद बिका नाएक पुल’ रखा जा सकता था—मगर यहाँ भी जातिगत हीनता सामने आई और पुल का नाम रख दिया गया था—‘बीजू पटनाएक ब्रिज’। उसके गाँव से तालचेर जाने वाली सड़क का नाम ‘शहीद बिका नाएक मार्ग’ रखा जा सकता था, मगर आज शहादत के 86 साल बीत जाने के बाद भी किसी को उस शहीद की याद नहीं आई।”

शहीद बिका नाएक का इतिहास बहुत पुराना नहीं है।

जैसा मैंने अपने पूर्व प्रकाशित सम्पादकीयों में ढंग-ढंग से कई बार कहा है कि अगर इतिहास की चर्चा नहीं की जाए या उसे साहित्य लेखन द्वारा जन-जन के मानस में स्थापित न किया जाए तो वह इतिहास के पन्नों में समय की धूल में दब जाता है। दिनेश माली इस तथ्य को भली-भाँति समझते हैं। मेरी दिनेश जी से कई बार फोन पर बात होती है और समय-समय पर हम दोनों इस तथ्य के महत्त्व की चर्चा करते हैं। इसी वर्ष फरवरी से मार्च के अन्त तक मैं भारत में था और दिनेश कुमार माली जी की एक अन्य पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर उन्होंने मुझे अंगुल (ओड़िसा) आमन्त्रित किया। एक रात भुवनेश्वर रुकने के पश्चात अगले दिन जब हम लोग जब अंगुल पहुँचे तो होटल की लॉबी में एक युवक हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। उसने मेरे चरण-स्पर्श किए। जब कोई मेरे चरण-स्पर्श करता है तो मैं असहज हो जाता हूँ। उसने अपना परिचय देते हुए बताया कि उसका नाम प्रद्युम्न नाएक है और वह बिका नाएक का परपौत्र है। मैं एकदम सकते ही हालात में अवाक्‌ रह गया। मुझे लगा कि मैं इतिहास को छू रहा हूँ। मुझे अनुभव हुआ कि शहीद बिका नाएक मेरे सामने साक्षात्‌ खड़े हैं। उपन्यास की प्रूफ़रीडिंग करते हुए मैं दिनेश जी के लिखे एक-एक शब्द से परिचित था और बिका नाएक के बलिदान से भी। मेरे चरण छू कर वह अपनी कृतज्ञता प्रकट करने लगा क्योंकि साहित्य कुञ्ज ने ’शहीद बिका नायक की खोज’ ।

उपन्यास लेखन के दौरान भी दिनेश जी से कई बार बातचीत हुई। ऐतिहासिक लेखन का अंकुर सदा जिज्ञासा से प्रस्फुटित होता है। इस उपन्यास का आधार भी एक जिज्ञासा ही है। जिज्ञासा से शोध का जन्म हुआ। शोध के प्राप्त तथ्यों से आक्रोश उत्पन्न हुआ कि एक शहीद के नाम को समाज के स्मृति चिह्नों से जातिवाद के चलते एक-एक करके मिटाया जा रहा है। इन परिस्थितियों में एक लेखक क्या कर सकता है—वह लेखनी को उठा सकता है। वह शोध के प्राप्त हुए सत्य को पन्नों पर उतार सकता है। दिनेश जी ने परिश्रम किया . . . नहीं, बहुत परिश्रम किया। हर संदर्भ का सत्यापन किया और फिर ऐतिहासिक तथ्यों को एक रोचक उपन्यास का प्रारूप दिया। वास्तविक इतिहास के साथ कोई छेड़खानी नहीं की। बस कथ्य मनोरंजक बनाया, शैली लोक-साहित्य की रखी। पाठक उपन्यास को पढ़ते ही पुस्तक के कथानक को विक्रमादित्य और बेताल की कहानी के साथ जोड़ लेता है और शहीद बिका नाएक के इतिहास को एक कहानी के रूप में पढ़ता है। इस तरह से इतिहास—साहित्य में अमर हो जाता है। इस पुस्तक की जगह-जगह पर चर्चा होने लगी। एक दलित समाज जो हीनता का जीवन जी रहा था। जिसके नायक को न केवल अनदेखा किया जा रहा था बल्कि अगर कहीं उसका नाम आता भी था उसे मिटाया जा रहा था—उस समाज में आत्मविश्वास का संचार होने लगा। एक सौम्य आन्दोलन की परिस्थितियों के पैदा होते ही राजनैतिक तन्त्र भी जाग गया और उसका प्रमाण प्रकाशित समाचार में आप देख सकते हैं।

प्रमाणित इतिहास पर आधारित साहित्य की क्या शक्ति है—‘शहीद बिका नाएक की खोज’ ने स्थापित कर दिया है। अब बिका नाएक की स्मृति केवल ओड़िशा के उस अंचल के दलित समाज में ही नहीं बल्कि संपूर्ण जगत में लिखित शब्दों में जीवित रहेगी। सम्पूर्ण जगत इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उपन्यास इंग्लिश भाषा में भी अनूदित हो चुका है यानी अहिन्दी जगत में भी पदार्पण कर चुका है। 

— सुमन कुमार घई

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