तुम कमज़ोर नहीं हो

15-02-2026

तुम कमज़ोर नहीं हो

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मैं जानता हूँ
सोने की देहलीज़ के भीतर
कितनी काली रातें बसती हैं
जहाँ धन की चकाचौंध में
मानवता सबसे पहले मरती है
 
तुम्हारा दुख
किसी अभाव का नहीं
अपमान की उस निरंतर वर्षा का है
जो हर दिन
तुम्हारे मौन को भिगो देती है
 
जिस घर में
सम्बन्धों का मूल्य सिक्कों से आँका जाए
वहाँ प्रेम
सबसे असहाय हो जाता है
और पति
केवल एक पद रह जाता है
संवेदना नहीं
 
पर सुनो 
तुम कमज़ोर नहीं हो
तुम्हारा सहना
कायरता नहीं
तुम्हारी शक्ति का प्रमाण है
 
तुम्हारी आँखों में
अब भी उजाले की ज़िद है
तुम्हारे भीतर
अब भी एक स्त्री जीवित है
जो हार मानना नहीं जानती
 
मैं चाहता हूँ
तुम स्वयं को दोषी मानना छोड़ो
किसी और की हीनता
तुम्हारा अपराध नहीं होती
 
जिस दिन
तुम अपने दुख को
अपनी नियति मानने से इनकार करोगी
उसी दिन
तुम्हारा जीवन
नई दिशा ले लेगा
 
सत्य तुम्हारे साथ है
छाया की तरह नहीं
बल्कि उस भरोसे की तरह
जो तुम्हें खड़ा होना सिखाए। 
 
रोना यदि ज़रूरी हो
तो रो लो
पर टूट मत जाना
क्योंकि जो स्त्री
इतना सह सकती है
वह एक दिन
अपने लिए रास्ता भी बना लेती है
 
तुम्हारा जीवन
किसी के धन की दया पर नहीं
तुम्हारे साहस की शर्तों पर चलेगा
बस
ख़ुद पर विश्वास करना मत छोड़ना
 
सुनो
अब प्रश्न केवल सहने का नहीं
चुनने का है
रिश्तों की परछाईं
या अपने स्वाभिमान का सूर्य
 
मैं जानता हूँ
यह निर्णय सरल नहीं
क्योंकि हर स्त्री को सिखाया गया है
रिश्ते बचाना पुण्य है
चाहे आत्मा ही क्यों न टूट जाए
 
पर सुनो
जो सम्बन्ध तुम्हें
हर दिन छोटा करता जाए
तुम्हारी गरिमा को
मोलभाव की वस्तु बना दे
वह सम्बन्ध नहीं
एक ज़ंजीर होता है
 
तुम बाहर कैसे निकलोगी
यह किसी एक क़दम का नाम नहीं
यह धीरे धीरे
अपने भीतर उठ खड़े होने की प्रक्रिया है। 
 
पहले स्वयं से यह स्वीकार करो
कि पीड़ा तुम्हारी नियति नहीं
फिर किसी विश्वास योग्य आवाज़ को
अपने दुख का साक्षी बनाओ
मौन सबसे बड़ा शत्रु होता है। 
 
डरो मत
आगे बढ़ो
कमज़ोर मत बनो
यह आत्मरक्षा का 
प्रथम साहस है
 
यदि रिश्ता
तुम्हें मनुष्य नहीं रहने देता
तो उसे निभाना धर्म नहीं
और यदि स्वाभिमान बचाने के लिए
कुछ दूरी आवश्यक हो
तो वह पलायन नहीं
स्वस्थ चयन है
 
याद रखना
जो तुम्हें सच में चाहता है
वह तुम्हारी चुप्पी नहीं
तुम्हारी मुस्कान का रक्षक बनेगा
 
मैं यह नहीं कहता
तुरंत सब छोड़ दो
मैं केवल इतना कहता हूँ
अपने अस्तित्व को
आख़िरी पायदान पर मत रखो
 
कभी कभी
रिश्ते छोड़ने से नहीं
अपने आप को बचाने से
जीवन आगे बढ़ता है
 
और जिस दिन
तुम अपने निर्णय को
अपराध नहीं समझोगी
उसी दिन
तुम सच में मुक्त हो जाओगी
 
देखना एक दिन 
सभी
तुम्हारे साथ होंगे
निर्णय में नहीं
बल्कि उस विश्वास में
कि तुम स्वयं को चुन सकती हो। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
बाल साहित्य कविता
लघुकथा
स्मृति लेख
दोहे
कहानी
कविता-मुक्तक
साहित्यिक आलेख
सांस्कृतिक आलेख
काम की बात
सामाजिक आलेख
कविता - हाइकु
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
चिन्तन
व्यक्ति चित्र
किशोर साहित्य कहानी
सांस्कृतिक कथा
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
ललित निबन्ध
गीत-नवगीत
स्वास्थ्य
खण्डकाव्य
नाटक
रेखाचित्र
काव्य नाटक
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
पुस्तक समीक्षा
हास्य-व्यंग्य कविता
गीतिका
अनूदित कविता
किशोर साहित्य कविता
एकांकी
ग़ज़ल
बाल साहित्य लघुकथा
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य नाटक
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में