छोटा सा आकाश

15-06-2026

छोटा सा आकाश

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

किसी को
पूरा संसार नहीं चाहिए होता, 
कई बार
बस इतना भर चाहिए होता है
कि कोई उसके मौन को पढ़ ले। 
एक लड़की
जब खिड़की पर खड़ी होकर
साँझ के धुँधलके में
दूर जाते पक्षियों को देखती है, 
तो वह केवल पक्षियों को नहीं देखती, 
वह देखती है
अपने भीतर उड़ते हुए
कुछ अधूरे सपनों को। 
एक युवक
जब देर रात तक
अपने भविष्य की उलझी रेखाओं में
रास्ते खोजता है, 
तो वह केवल सफलता नहीं चाहता, 
वह चाहता है
कि उसके संघर्षों पर भी
किसी का विश्वास बना रहे। 
 
हम सबके भीतर
एक छोटा सा आकाश होता है, 
जहाँ
कुछ इच्छाएँ चुपचाप रहती हैं, 
कुछ स्मृतियाँ
दीपक की लौ की तरह जलती हैं, 
और कुछ चेहरे
ऋतुओं की तरह आते-जाते रहते हैं। 
जीवन का अर्थ
सिर्फ़ ऊँचाइयाँ छूना नहीं है, 
किसी गिरते हुए को थाम लेना भी है। 
सिर्फ़ अपने लिए जीना नहीं है, 
किसी के आँसुओं में
अपना अंश पहचान लेना भी है। 
 
एक स्त्री
जब पूरे परिवार के लिए
अपना सुख टाल देती है, 
तब वह त्याग का प्रदर्शन नहीं करती, 
वह प्रेम को
अपने स्वभाव की तरह जीती है। 
एक युवा
जब असफलताओं के बाद भी
फिर खड़ा हो जाता है, 
तब वह केवल साहस नहीं दिखाता, 
वह भविष्य के प्रति
अपनी आस्था बचाए रखता है। 
 
इसलिए
यदि तुम्हारे पास
थोड़ा सा प्रेम है, 
उसे बाँट दो। 
यदि तुम्हारे पास
थोड़ी सी आशा है, 
उसे बचाए रखो। 
यदि तुम्हारे पास
थोड़ा सा समय है, 
किसी अपने के साथ बैठो। 
क्योंकि अंततः
मनुष्य को
न धन याद रहता है, 
न पद, 
याद रहते हैं
कुछ आत्मीय हाथ, 
कुछ सच्चे शब्द, 
कुछ निःस्वार्थ सम्बन्ध, 
और वह छोटा सा आकाश
जिसमें उसने
अपने होने का अर्थ खोजा था। 

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