काग़ज़ का जंगल

01-03-2026

काग़ज़ का जंगल

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 293, मार्च प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

नगर के मध्य एक प्राचीन पीपल का वृक्ष खड़ा था। उसकी जड़ों में समय का इतिहास सोया था और उसकी शाखाओं पर अनगिनत ऋतुएँ विश्राम कर चुकी थीं। लोग उसे “बूढ़ा साक्षी” कहते थे, क्योंकि उसने नगर को गाँव से महानगर बनते देखा था। 

एक सुबह नगर निगम के कर्मचारी आए। उनके हाथों में कुल्हाड़ियाँ नहीं, बल्कि काग़ज़ थे। काग़ज़ पर लाल मोहरें थीं और उन मोहरों में वृक्ष का भविष्य लिखा था। 

पास ही चाय बेचने वाला रामू यह सब देख रहा था। उसने पूछा, “साहब, यह क्या हो रहा है?” 

अधिकारी ने निर्विकार स्वर में कहा, “यह वृक्ष अब विकास में बाधा है। यहाँ मॉल बनेगा। आदेश आ गया है।” 

रामू ने वृक्ष को देखा। उसे लगा जैसे वृक्ष की पत्तियाँ काँप नहीं रहीं, बल्कि कुछ कहना चाह रही हैं। उसी वृक्ष के नीचे उसकी माँ ने अंतिम साँस ली थी। उसी के तले बैठकर उसका बेटा पढ़ाई करता था। 

भीड़ इकट्ठा हो गई। कुछ लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बनाने लगे। किसी ने कहा, यह ग़लत है। किसी ने कहा, विकास के लिए यह ज़रूरी है। पर किसी ने वृक्ष को बचाने के लिए हाथ नहीं बढ़ाया। 

पहला वार हुआ। वृक्ष के भीतर से एक सूखी सी आवाज़ निकली, जैसे कोई पुराना गीत टूट गया हो। 

रामू की आँखों में आँसू थे। उसने सोचा, कुल्हाड़ी से वृक्ष नहीं कट रहा, वह तो पहले ही काग़ज़ों में कट चुका था। 

शाम तक वहाँ वृक्ष नहीं था। केवल धूल थी और एक ख़ाली आकाश। 

कुछ महीनों बाद वहाँ एक चमकता हुआ मॉल खड़ा था। लोग ख़ुश थे। बच्चे हँस रहे थे। 

पर उस स्थान से गुज़रते हुए रामू को हमेशा लगता, वहाँ अभी भी एक वृक्ष खड़ा है अदृश्य, मौन, और मनुष्य की स्मृति से बड़ा। 

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