तुलना का बोझ

01-12-2025

तुलना का बोझ

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 289, दिसंबर प्रथम, 2025 में प्रकाशित)

 

​अमित ने जब अपनी नई चमचमाती कार ख़रीदी, तो उसने सबसे पहले अपने बचपन के मित्र, संजय को दिखाने का निर्णय लिया। 

संजय एक साधारण, संतुष्ट जीवन जीता था। कार देखते ही अमित ने गर्व से कहा, “संजय, कैसी लगी? मैंने पाँच साल दिन-रात मेहनत की है।”

​संजय ने मुस्कुराते हुए कहा, “बहुत सुंदर है, अमित! यह तुम्हारी मेहनत का प्रतिबिंब है।”

​परन्तु, कार दिखाने के बाद जब अमित वापस जाने लगा, तो उसके हृदय में एक अजीब सी बेचैनी थी। उसने महसूस किया कि संजय की आँखों में प्रशंसा कम, और तुलना का बोझ ज़्यादा था। 

​अगले दिन, संजय ने अपनी पत्नी से कहा, “सोचता हूँ, अब घर के लिए एक सेकंड हैंड कार ले ही लेनी चाहिए।”

​अमित की कार संजय की सफलता नहीं थी, पर वह अनजाने में संजय के मनोवैज्ञानिक द्वंद्व का कारण बन गई थी। संदेश स्पष्ट है हम दूसरों की सफलता को उनकी उपलब्धि नहीं, अपनी कमी के रूप में देखते हैं।

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