जीवित होने का प्रमाण

01-07-2026

जीवित होने का प्रमाण

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)


 (व्यंग्यात्मक संस्मरण) 

पिछले दिनों मुझे जीवन का सबसे बड़ा दार्शनिक सत्य पता चला मनुष्य के जीवित होने और सरकारी काग़ज़ों में जीवित होने में उतना ही अंतर है जितना धरती और आसमान के बीच होता है।

घटना मामूली थी, लेकिन उसके परिणाम अत्यंत गंभीर थे। एक दिन चुनावी चर्चा चल रही थी। मैंने सोचा कि इस बार माँ को भी मतदान केंद्र तक लेकर जाऊँगा। आख़िर लोकतंत्र का पर्व है। मैंने मतदाता सूची निकाली और बड़े गर्व से अपना नाम ढूँढ़ा। नाम मिल गया। पत्नी का नाम भी मिल गया। बच्चों का भी मिल गया। लेकिन माँ का नाम ग़ायब था। पहले तो मुझे लगा कि शायद मेरी आँखें कमज़ोर हो गई हैं। फिर चश्मा साफ़ किया। फिर सूची को ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर पढ़ा। माँ फिर भी नहीं मिलीं। ऐसा लगा जैसे लोकतंत्र ने उन्हें गुप्त रूप से निर्वासित कर दिया हो।

मैं सीधे बी.एल.ओ. महोदय के पास पहुँचा।

मैंने पूछा, “भाई साहब, मेरी माताजी का नाम सूची से क्यों हटा दिया गया?”

उन्होंने बड़ी सहजता से उत्तर दिया, “सर, सूचना मिली थी कि उनका स्वर्गवास हो गया है।”

मैं कुछ क्षण तक उन्हें देखता रहा।

फिर बोला, “लेकिन वे तो घर पर बैठी हैं। अभी सुबह ही उन्होंने मुझे बाज़ार से सब्ज़ी लाने का आदेश दिया है।” 
बी.एल.ओ. महोदय मुस्कुराए।

“सर, भूल हो गई होगी।”

मुझे लगा जैसे किसीने कहा हो कि ग़लती से सूरज पश्चिम से निकाल दिया गया था, अब अगली बार ध्यान रखेंगे। 

मैं घर लौटा। माँ को बताया कि सरकारी अभिलेखों में उनका देहांत हो चुका है। माँ ने आश्चर्य से पूछा, “अच्छा! और मुझे किसीने बताया भी नहीं?”

फिर बोलीं, “तो क्या अब मुझे खाना नहीं खाना चाहिए?”

मैंने कहा, “नहीं माँ, अभी खाना खाते रहिए। जब तक शासन की दूसरी सूचना न आ जाए।”

उस दिन पहली बार मुझे समझ आया कि भारतीय लोकतंत्र में मृत्यु एक जैविक घटना नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया है।

अगले दिन मैं माँ को लेकर बी.एल.ओ. के पास पहुँचा। मुझे लगा कि जीवित व्यक्ति को सामने देखकर समस्या समाप्त हो जाएगी लेकिन मैं सरकारी तंत्र को कम समझ रहा था। बी.एल.ओ. साहब ने माँ को देखा, नमस्ते की, हालचाल पूछा और फिर बोले, “जीवित होने के कुछ दस्तावेज़ लाना पड़ेंगे।”

मैंने कहा, “ये जो आपके सामने बैठी हैं, क्या ये पर्याप्त नहीं हैं?”

उन्होंने कहा, “नियम तो नियम है।” 

फिर एक सूची निकली। आधार कार्ड, समग्र आईडी, राशन कार्ड, बैंक पासबुक, बिजली बिल, पासपोर्ट साईज़ फोटो, निवास प्रमाण पत्र। और सम्भव हो तो दो गवाह।

मैंने पूछा, “क्या यमराज का अनापत्ति प्रमाण पत्र भी लगेगा?”

वे मेरी ओर देखकर मुस्कुरा दिए। मैं नहीं मुस्कुराया। मुझे पहली बार लगा कि हमारे यहाँ आदमी पैदा बाद में होता है, दस्तावेज़ पहले। 

आने वाले दिनों में मैं माँ के जीवित होने के प्रमाण जुटाता रहा। आधार कार्ड बताता था कि वे जीवित हैं। बैंक पासबुक बताती थी कि वे जीवित हैं। पेंशन का रिकॉर्ड बताता था कि वे जीवित हैं। पड़ोसी बताते थे कि वे जीवित हैं। दूध वाला बताता था कि वे जीवित हैं। यहाँ तक कि महल्ले के आवारा कुत्ते भी उन्हें पहचानते थे। 

लेकिन सरकारी फ़ाइल अभी संशय में थी। कई चक्कर लगाने, अनेक हस्ताक्षर कराने और कुछ पेड़ों की बलि चढ़ाने के बाद अंततः यह सिद्ध हो पाया कि मेरी माँ वास्तव में जीवित हैं। 

जिस दिन उनका नाम पुनः मतदाता सूची में जुड़ा, घर में लगभग वैसा ही वातावरण था जैसा किसी गुमशुदा व्यक्ति के घर लौटने पर होता है।

माँ ने हँसते हुए कहा, “बेटा, अब मैं आधिकारिक रूप से जीवित हूँ क्या?”

मैंने कहा, “हाँ माँ, फ़िलहाल तो हैं। अगली सूची आने तक।” 

लेकिन इस घटना ने मुझे एक बड़ा प्रश्न दे दिया। आख़िर इस देश में आम नागरिक को हर बात सिद्ध क्यों करनी पड़ती है? उसे सिद्ध करना पड़ता है कि वह पैदा हुआ है। सिद्ध करना पड़ता है कि वह यहीं रहता है। सिद्ध करना पड़ता है कि वह ग़रीब है। सिद्ध करना पड़ता है कि वह किसान है। सिद्ध करना पड़ता है कि वह छात्र है। सिद्ध करना पड़ता है कि वह पात्र है। 

और कभी-कभी तो उसे यह भी सिद्ध करना पड़ता है कि वह अभी मरा नहीं है। सरकारी तंत्र की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि वह नागरिक पर भरोसा नहीं करता, लेकिन किसी अज्ञात सूचना पर तुरंत विश्वास कर लेता है। कोई अनाम व्यक्ति बता दे कि फ़लाँ आदमी मर गया है, तो फ़ाइल तुरंत सक्रिय हो जाती है। लेकिन वही आदमी जीवित होकर सामने खड़ा हो जाए, तब उसे अपने अस्तित्व के समर्थन में दस्तावेज़ों की पूरी बारात निकालनी पड़ती है। लगता है हमारे यहाँ इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका चेहरा नहीं, उसकी फ़ाइल है। जिस दिन फ़ाइल कह दे कि आप जीवित हैं, आप जीवित हैं। और जिस दिन फ़ाइल कह दे कि आप नहीं हैं, तब आपको अपने अस्तित्व के समर्थन में प्रमाण जुटाने पड़ेंगे। 

कभी-कभी मुझे डर लगता है कि कहीं भविष्य में ऐसा दिन न आ जाए जब आदमी सुबह उठकर सबसे पहले अपनी नब्ज़ नहीं, सरकारी पोर्टल चेक करे और देखे “स्थिति जीवित।” क्योंकि इस देश में साँस लेना पर्याप्त नहीं है। 

जीवित रहने के लिए दस्तावेज़ भी चाहिए, क्या नागरिक सरकार के लिए एक मनुष्य है, या केवल काग़ज़ों का एक बंडल? जब किसी माँ को अपने जीवित होने का प्रमाण देना पड़े, तब समस्या केवल एक नाम कटने की नहीं, पूरे तंत्र की मानसिकता की होती है। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

आप-बीती
कविता
कहानी
कविता-मुक्तक
साहित्यिक आलेख
ग़ज़ल
दोहे
बाल साहित्य कविता
नाटक
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
स्मृति लेख
व्यक्ति चित्र
गीत-नवगीत
लघुकथा
सांस्कृतिक आलेख
ललित निबन्ध
सामाजिक आलेख
चिन्तन
काम की बात
कविता - हाइकु
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
किशोर साहित्य कहानी
सांस्कृतिक कथा
स्वास्थ्य
खण्डकाव्य
रेखाचित्र
काव्य नाटक
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
पुस्तक समीक्षा
हास्य-व्यंग्य कविता
गीतिका
अनूदित कविता
किशोर साहित्य कविता
एकांकी
बाल साहित्य लघुकथा
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य नाटक
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में