मैं अरावली

01-01-2026

मैं अरावली

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मैं पत्थर नहीं हूँ
मैं समय की स्मृति हूँ
जब धरती ने पहली बार
अपनी रीढ़ सीधी की थी। 
 
मेरी नसों में
झरनों का रक्त बहता है
मेरी साँसों से
मरुस्थल की तपिश थमती है
और मेरे कंधों पर टिके
शहर चैन से सोते हैं। 
 
आज मुझसे कहा गया
सिर्फ़ सौ मीटर का खेल है
सिर्फ़ काग़ज़ की एक रेखा
सिर्फ़ खनन का एक आदेश। 
पर क्या सौ मीटर
सिर्फ़ सौ मीटर होते हैं
जब वे मेरी देह से काटे जाते हैं
 
हर धमाका
मेरे हृदय की धड़कन कम करता है
हर मशीन
मेरे मौन को चीरती है
और हर चुप्पी
एक आने वाली पीढ़ी का
प्यासा भविष्य लिखती है। 
 
मैंने न कभी सत्ता माँगी
न विकास से बैर रखा
मैंने तो केवल
नदियों को जन्म दिया
हवाओं को दिशा दी
और जीवन को सहारा। 
 
जब मैं ढहता हूँ
तो केवल पहाड़ नहीं गिरते
गिरते हैं
जल स्रोत
गिरती है हरियाली
गिरता है मनुष्य का विवेक। 
 
आज तुम मेरी रक्षा नहीं करोगे
तो कल
तुम्हारी संतानें पूछेंगी
पानी कहाँ गया
हवा इतनी भारी क्यों है
धरती इतनी कठोर क्यों हो गई। 
 
मुझे बचाना
कोई आंदोलन नहीं
यह आत्मरक्षा है
यह आने वाले कल से
आज का संवाद है। 
 
अरावली को बचाना
धरती की धड़कन बचाना है
मनुष्य के भीतर
मनुष्य को बचाना है। 

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