रवींद्र नाथ टैगोर पर दोहे

15-05-2026

रवींद्र नाथ टैगोर पर दोहे

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

गीतांजलि के दीप से, जग में फैला ज्ञान। 
कवि रवींद्र ने रच दिया, मानवता का गान॥
 
शब्दों में संगीत था, भावों में आकाश। 
कवि रवींद्र की लेखनी, देती मन विश्वास॥
 
शान्ति निकेतन बाग़ था, जिसमें खिले विचार। 
खुले गगन जैसा हुआ, शिक्षा का विस्तार॥
 
प्रकृति साथ कविवर रहे, नदी, पवन, वन, धूप। 
हर मानव में देखते, जीवन का नवरूप॥
 
राष्ट्रगान के स्वर बने, जनमन का अभिमान। 
भारत की आत्मा जगी, सुन “जन गण मन” गान॥
 
बाँध न पाईं रूढ़ियाँ, उनके मुक्त विचार। 
मानवता के पक्ष में, उनका हर व्यवहार॥
 
कला, और साहित्य का, था अनुपम विस्तार। 
चित्रों में भी बोलता, उनका मौन विचार॥
 
पूर्व और पश्चिम मिले, कविवर चिंतन बीच। 
विश्वबंधु का भाव था, ऊँच न कोई नीच॥
 
आम आदमी से जुड़ा, कविवर का साहित्य। 
अश्रु बने जब गीत सब, यह रवींद्र लालित्य॥
 
रवि सा उज्ज्वल नाम है, नोबल का सम्मान। 
युगों युगों तक गूँजते, कवि रवींद्र के गान॥

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