काल डमरू

15-04-2021

काल डमरू

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 179, अप्रैल द्वितीय, 2021 में प्रकाशित)

काल का डमरू
बालू की घड़ी
सरकती रेत
हमारी काल चेतना
अभिमुख या प्रतिमुख
वर्तमान का बोध
भविष्य की ओर
अतीत प्रवाहित
क्या कोई ऐसा पल
हम पा सकते हैं।
जिसमें न अतीत की स्मृति है
न वर्तमान की कामना
और ना ही भविष्य की प्रतीक्षा  
जो समय से संक्रमित न हो
जो कालमुक्त हो
जिस बिंदु पर
काल डमरू लय हो जाये।
काल पर विजय
आत्मचेतना से ही संभव है।
स्मृति और कामनाओं से रहित
पल ही जीवित क्षण हैं।
बाकी तो गुथे हुए हैं
काल मृत्यु की माला में।

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