देह का वस्त्र

15-01-2026

देह का वस्त्र

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मृत्यु के पास
जब देह थककर
अपने अंतिम सहारे छोड़ देती है
तब कोई कहता है
मैं नहीं जा रहा
केवल
जीर्ण वस्त्र उतार रहा हूँ। 
 
यह कथन
शास्त्र से नहीं उपजता
यह अनुभव की
निर्भय भाषा है
जो आँखों से
सीधे हृदय में उतरती है। 
 
रामकृष्ण
जब यह कह रहे थे
तो शब्द नहीं बोल रहे थे
उनकी आँखों में
प्रकाश ठहरा था
वह प्रकाश
जिसे केवल
प्रेम ही देख सकता है। 
 
शारदा ने देखा
क्योंकि उसने
संदेह नहीं पाला
उसने
समर्पण ओढ़ा था
और भरोसा
उसकी दृष्टि बन गया था। 
 
देह गिरती दीवार की तरह थी
जिसमें रहना
अब जोखिम था
पर जो उसमें रहता था
वह
कभी गिरता नहीं। 
 
लोगों ने कहा
अब सब समाप्त
चूड़ियाँ तोड़ दो
वस्त्र बदल लो
पर शारदा मुस्कुराई
और बोली
जो गया ही नहीं
उसका शोक कैसा। 
 
रामकृष्ण
देह नहीं रहे
पर
अभाव नहीं बने
वे
आकाश हो गए
जहाँ सीमाएँ
ख़ुद विलीन हो जाती हैं। 
 
अब
यह प्रश्न व्यर्थ था
कि वे
यहाँ हैं या वहाँ
क्योंकि देह के बिना
यहाँ और वहाँ
दोनों मिट जाते हैं। 
 
शारदा
हर दिन
उन्हें सुलाती थी
भोजन पर बुलाती थी
पंखा झलती थी
क्योंकि प्रेम
मृत्यु का अनुसरण नहीं करता
वह
उपस्थिति को
पहचानता है। 
 
दुनिया ने कहा
यह पागलपन है
पर पागलपन नहीं
यह उस बोध की
निश्छलता थी
जहाँ प्रेम
ज्ञान बन जाता है। 
 
जो अहंकार के हटते ही
दिखाई देता है
वह
मरण नहीं
विस्तार है। 
 
रामकृष्ण
मरकर भी
मरे नहीं
और शारदा
पति खोकर भी
विधवा नहीं हुई। 
 
क्योंकि
जहाँ प्रेम
पूर्ण हो जाता है
वहाँ मृत्यु
केवल
वस्त्र बदलने की
एक शांत प्रक्रिया
भर रह जाती है। 

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