रावण एक अधूरी महागाथा

15-05-2026

रावण एक अधूरी महागाथा

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

स्वर्णमयी लंका की जली हुई देह पर
जब धुआँ अभी भी
आकाश से प्रश्न कर रहा था, 
तब राख के पीछे
एक और लंका मिली
ताड़पत्रों की, 
स्वरों की, 
सूत्रों की, 
मौन की। 
 
वहाँ बैठा था रावण
अपने शव से बहुत बड़ा, 
अपने अपराधों से भी अधिक जटिल, 
अपने यश से कहीं अधिक गहरा। 
वह केवल युद्ध का उन्मत्त नायक नहीं था, 
वह श्रुति का साधक था
जिसने कैलास की निस्तब्धता में
वायु का व्याकरण सीखा, 
जल की जिह्वा पहचानी, 
मृत्यु की साँस तक सुन ली। 
उसकी शक्ति
ब्रह्मा के वरदान में नहीं, 
उस श्रवण में थी
जिससे वह
अनकहे को भी समझ लेता था। 
वह केवल रणभेरी नहीं था, 
वह रुद्रवीणा का वह कंपित तार था
जिसने अपने ही रक्त से
स्वर रचे थे। 
जिसने पीड़ा को संगीत किया, 
और मृत्यु को लय। 
 
वह केवल राजा नहीं था, 
वह गणना का ऋषि था
जिसने नक्षत्रों की गति में
राज्य की नींव रखी, 
ग्रहों से ज्ञान लिया, 
विज्ञान को 
बंद कक्षों में क़ैद कर लिया। 
और यहीं
उसकी पराजय का बीज पड़ा
 
ज्ञान
जब साझा न हो
तो तेज नहीं, 
अहंकार बन जाता है। 
वह दुष्ट इसलिए नहीं गिरा
कि उसमें बल अधिक था, 
वह इसलिए गिरा
क्योंकि उसमें समन्वय कम था। 
उसके दस मस्तक
दस दिशाओं के दीप थे, 
पर वे
एक ही लौ में नहीं जल सके। 
 
जब सीता आई
तो पहली बार
उसके भीतर
दसों विचार भिड़े
धर्म, प्रतिशोध, कामना, अहं, तर्क, भाग्य
और वह
अपने ही कोलाहल में
सत्य की ध्वनि खो बैठा। 
जिसने संसार की हर भाषा सुनी थी
वह 
अपने अंतर का मौन न सुन सका। 
 
राम का बाण
उसके शरीर पर नहीं, 
उसकी विसंगति पर लगा था। 
नाभि में अमृत नहीं था
वहाँ
उसका प्रथम श्रुत स्वर सोया था, 
जिसे राम ने
हत्या नहीं, 
मुक्ति दी। 
अंतिम क्षण में
जब दसों मस्तक शांत हुए, 
तब पहली बार
रावण ने स्वयं को सुना। 
और शायद
वह उसी क्षण
दशानन से मनुष्य हुआ। 
 
उसकी त्रुटि यह नहीं थी
कि वह शक्तिशाली था, 
त्रुटि यह थी
कि उसने स्वयं को
अजेय मान लिया। 
उसने देवों से सुरक्षा माँगी, 
दानवों से सुरक्षा माँगी, 
पर मनुष्य और वानर को तुच्छ समझा
और इतिहास
उसी तुच्छता से लिखा गया। 
यही शक्ति का शाप है
जो किसी को छोटा समझे, 
वह स्वयं
छोटा सिद्ध हो जाता है। 
 
रावण बुरा नहीं था, 
वह अधूरा था। 
अधूरा ज्ञान, 
अधूरा संयम, 
अधूरा विवेक, 
अधूरी विजय। 
दस सिर होना
महानता नहीं, 
दसों को एक साथ सुन पाना
महानता है। 
 
और रावण
युगों का यह पाठ छोड़ गया
कि तप, विद्या, बल, वैभव
सब व्यर्थ हैं
यदि मनुष्य
अपने भीतर के शोर पर
विजय न पा सके। 
स्वर्ण की लंका जलती है, 
पर उसका पुस्तकालय बचा रहता है
क्योंकि इतिहास
राक्षसों को नहीं, 
उनकी भूलों को अमर करता है। 
 
और दूर कहीं
आज भी
जब अहंकार ज्ञान से बड़ा होने लगता है, 
जब शक्ति विवेक से आगे निकलती है, 
जब मनुष्य स्वयं को सुनना छोड़ देता है
रावण
फिर जन्म लेता है। 

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