सोशल मीडिया के साहित्यिक पटल: एक समालोचना

01-02-2026

सोशल मीडिया के साहित्यिक पटल: एक समालोचना

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

डिजिटल युग ने साहित्य को जिस तीव्रता से आम जन तक पहुँचाया है, वैसा अवसर इतिहास में पहले कभी नहीं मिला। कभी जो कविता पत्रिकाओं के संपादकीय द्वार पर वर्षों प्रतीक्षा करती थी, आज वह एक क्लिक में हज़ारों पाठकों तक पहुँच जाती है। सोशल मीडिया ने साहित्य को लोकतांत्रिक बनाया है, पर यही लोकतंत्र जब अनुशासन और आत्मचिंतन से विहीन होता है, तब वह साहित्य के लिए वरदान से अधिक संकट बन जाता है। वर्तमान समय में सोशल मीडिया का साहित्यिक पटल इसी द्वंद्व से गुज़र रहा है। 

मात्रा और गुणवत्ता का असंतुलन

आज सोशल मीडिया पर साहित्य की मात्रा अभूतपूर्व है। प्रतिदिन हज़ारों कविताएँ, शेर, ग़ज़लें, कहानियाँ और उद्धरण पोस्ट होते हैं। हर हाथ में मोबाइल है और हर मोबाइल में एक कवि या लेखक छिपा बैठा है। यह दृश्य ऊपर से अत्यंत उत्साहजनक लगता है, पर जब हम गुणवत्ता की ओर दृष्टि डालते हैं, तो तस्वीर उतनी उजली नहीं रहती। 

अनेक रचनाएँ भावुकता की तात्कालिक उछाल में लिखी जाती हैं। शिल्प, भाषा-संस्कार, विषय की गहराई और साहित्यिक उत्तरदायित्व ये सब अक्सर हाशिये पर चले जाते हैं। कविता को टूटे दिल की डायरी और कहानी को स्टेटस अपडेट समझ लिया गया है। परिणामस्वरूप साहित्य साधना नहीं, त्वरित प्रतिक्रिया बनता जा रहा है। 

कॉपी-पेस्ट संस्कृति और रचनात्मक नैतिकता का क्षरण

सोशल मीडिया साहित्य का सबसे चिंताजनक पक्ष है कॉपी-पेस्ट संस्कृति। इंटरनेट पर उपलब्ध रचनाओं को बिना संदर्भ, बिना अनुमति और बिना संकोच अपने नाम से साझा कर देना अब सामान्य व्यवहार बन गया है। इससे भी अधिक पीड़ादायक स्थिति तब होती है, जब किसी जीवित रचनाकार की मौलिक रचना को ही चोरी कर लिया जाए। 

मेरी रचना “कृष्ण तुम पर क्या लिखूँ” को अनेक लोगों ने अपने नाम से सोशल मीडिया पर प्रसारित किया, यह केवल एक व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि इस युग की साहित्यिक नैतिकता पर गहरा प्रश्नचिह्न है। यह चोरी केवल शब्दों की नहीं, साधना की है, उस भाव-यात्रा की है जो किसी रचनाकार को उस रचना तक ले जाती है। दुर्भाग्य यह है कि ऐसे मामलों में चोर को न लज्जा होती है, न भय और पाठक भी अक्सर मौन रहते हैं। 

मैं तेरी पीठ थपथपा, तू मेरी खुजला की समीक्षाएँ

सोशल मीडिया पर समीक्षाओं का स्वरूप भी विचारणीय है। यहाँ अधिकांश समीक्षाएँ वस्तुनिष्ठ नहीं, बल्कि पारस्परिक प्रशंसा के अनुबंध पर आधारित होती हैं। “आप अद्भुत लिखते हैं”; “वाह! क्या भाव हैं”; “आपकी क़लम को प्रणाम” ये वाक्य अक्सर बिना रचना पढ़े, बिना समझे, केवल औपचारिकता निभाने के लिए लिखे जाते हैं। यह प्रवृत्ति साहित्यिक आलोचना को खोखला बना रही है। आलोचना का अर्थ दोषारोपण नहीं, बल्कि रचना को बेहतर बनाने का संवाद होता है। जब समीक्षाएँ केवल लाईक और कमेंट की सौदेबाज़ी बन जाएँ, तो नवाचार मरने लगता है और आत्ममुग्धता जन्म लेती है। 

नवांकुरों का भविष्य: अवसर और ख़तरे

सोशल मीडिया ने नवांकुरों को मंच दिया है। यह उसका सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष है। आज किसी गाँव का छात्र भी अपनी कविता देश-विदेश तक पहुँचा सकता है। पहचान के लिए किसी संपादक की मुहर अनिवार्य नहीं रही। यह स्थिति आशाजनक है। पर ख़तरा यह है कि बिना मार्गदर्शन, बिना आलोचना और बिना साहित्यिक अनुशासन के नवांकुर भ्रमित हो सकते हैं। तात्कालिक प्रशंसा उन्हें यह विश्वास दिला देती है कि वे परिपक्व रचनाकार हो चुके हैं। जब हर रचना पर तालियाँ मिलें, तो आत्मसुधार की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है। यदि नवांकुरों को सही आलोचना, अध्ययन और परंपरा से नहीं जोड़ा गया, तो उनकी रचनात्मक ऊर्जा अल्पकालिक होकर रह जाएगी। 

सोशल मीडिया के सकारात्मक पक्ष

इन सबके बावजूद सोशल मीडिया को केवल दोषों के तराज़ू पर तौलना भी अन्याय होगा। इसके कुछ निर्विवाद फ़ायदे हैं। 

  1. साहित्य का व्यापक लोकतंत्रीकरण। 

  2. नए लेखकों को त्वरित मंच। 

  3. पाठक और लेखक के बीच सीधा संवाद। 

  4. साहित्यिक आयोजनों, पुस्तकों और विमर्श का प्रचार। 

  5. क्षेत्रीय और हाशिये के स्वर को स्थान। 

सोशल मीडिया ने साहित्य को अभिजन वर्ग की सीमाओं से निकालकर जन-जन तक पहुँचाया है। यह उसका ऐतिहासिक योगदान है। 

भविष्य में साहित्य और सोशल मीडिया का सम्बन्ध

भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम सोशल मीडिया को मंच मानते हैं या मूल्य। मंच बदल सकता है, मूल्य नहीं। यदि रचनाकार अपनी मौलिकता, ईमानदारी और अध्ययन को केंद्र में रखे; यदि पाठक प्रशंसा के साथ प्रश्न भी करे; यदि चोरी को सामाजिक अपराध की तरह देखा जाए तो सोशल मीडिया साहित्य का सशक्त सहयोगी बन सकता है। 

आवश्यक है कि प्रथम रचनाओं का श्रेय स्पष्ट रूप से लेखक को दिया जाए। दूसरा आलोचना को स्वस्थ संवाद बनाया जाए। तीसरा नवांकुरों को अध्ययन और धैर्य के लिए प्रेरित किया जाए। एवं अंतिम लाईक और फॉलोअर्स को साहित्यिक मूल्य का पैमाना न माना जाए। 

सोशल मीडिया का साहित्यिक पटल एक खुला आकाश है यह उड़ान का अवसर भी देता है और गिरने का ख़तरा भी। यहाँ ज़िम्मेदारी केवल मंच की नहीं, रचनाकार और पाठक दोनों की है। यदि हमने सजगता नहीं दिखाई, तो शब्दों की बाढ़ में अर्थ डूब जाएगा। लेकिन यदि विवेक, नैतिकता और साहित्यिक चेतना को साथ लेकर चले, तो यही सोशल मीडिया भविष्य के साहित्य का सबसे सशक्त माध्यम बन सकता है। 

साहित्य अंततः शब्दों का खेल नहीं, आत्मा का अनुशासन है और आत्मा का कोई शॉर्टकट नहीं होता। 

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