बड़ा कठिन है आशुतोष सा हो जाना

15-09-2026

बड़ा कठिन है आशुतोष सा हो जाना

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

(गाडरवारा की मिट्टी से उठकर विश्वमंच तक पहुँचे उस कलाकार के भीतर झाँकने का एक प्रयास) 

 

किसी व्यक्ति की यात्रा को केवल उसकी उपलब्धियों की सूची बनाकर नहीं समझा जा सकता। उपलब्धियाँ उसके जीवन का दृश्य पक्ष होती हैं, लेकिन उसके भीतर जो कुछ घटता है, वही उसकी वास्तविक यात्रा होती है। “आशुतोष राना को समझना हो तो मुझे लगता है कि मुंबई, दिल्ली, फ़िल्म, पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय मंचों से पहले गाडरवारा को समझना होगा।” क्योंकि आशुतोष राना के व्यक्तित्व की जड़ें किसी महानगरीय चमक में नहीं, बल्कि इसी मिट्टी में हैं। वही मिट्टी जिसमें धूल उड़ाती गलियाँ हैं, मंदिरों की घंटियाँ हैं, रामलीला का मंच है, बुंदेली बोलियों की सहज आत्मीयता है और छोटे नगर के बड़े सपने देखने वाला एक बालक है। 

मुझे आशुतोष राना के जीवन को देखते हुए बार-बार वह छोटा-सा बालक दिखाई देता है, जो चार वर्ष की उम्र में मंच पर आया और रामलीला में भूमिका निभाने लगा था। स्वयं आशुतोष ने अपने शुरूआती अभिनय के बारे में बताया है कि बचपन में वे स्थानीय रामलीला में विभिन्न पात्रों की भूमिका करते थे और उनके माता-पिता उनके प्रत्येक अभिनय को देखने आते थे। उनके पिता का यह विश्वास कि अपनी रुचि का अनुसरण करो, क्योंकि वही तुम्हें प्रसन्नता तक ले जाएगी, उनके जीवन में एक स्थायी सूत्र बन गया। 

मेरी दृष्टि में यहीं से आशुतोष के व्यक्तित्व की पहली मनोवैज्ञानिक रेखा खिंचती है। मंच उनके लिए कभी केवल मंच नहीं रहा। वह उनके भीतर स्वयं को खोजने का स्थान रहा। गाडरवारा का वह बालक जब मंच पर अभिनय करता होगा, तब शायद उसे यह ज्ञात नहीं रहा होगा कि एक दिन उसके भीतर का वही अभिनय भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली खल-पात्रों में से अनेक को जन्म देगा। किन्तु मनुष्य के भीतर कुछ बीज बहुत पहले पड़ जाते हैं और जीवन के बहुत बाद के वर्षों में जाकर उनके वृक्ष दिखाई देते हैं। 

आशुतोष के व्यक्तित्व में मुझे सबसे रोचक बात यही लगती है कि उन्होंने अपने अतीत को कभी अपने वर्तमान के रास्ते में खड़ा नहीं होने दिया, बल्कि उसे अपने वर्तमान की ऊर्जा बना लिया। गाडरवारा से निकलकर सागर विश्वविद्यालय तक पहुँचना, रंगमंच से जुड़ना, आध्यात्मिक गुरु पंडित देवप्रभाकर शास्त्री ‘दद्दाजी’ का सान्निध्य प्राप्त करना और फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तक पहुँचना—यह यात्रा केवल शिक्षा प्राप्त करने की यात्रा नहीं थी। यह उस भीतर के आग्रह की यात्रा थी, जो कह रहा था कि “मुझे वही करना है जिसके लिए मैं बना हूँ।” 1994 में NSD से निकलने के बाद मुंबई पहुँचे तो उनके पास फ़िल्मी दुनिया का कोई पारिवारिक सहारा नहीं था। उन्होंने स्वयं बताया है कि मुंबई पहुँचकर प्रारंभिक दिनों में काम की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान तक भटकना पड़ा।

यहीं आशुतोष के मन का दूसरा पक्ष सामने आता है—संघर्ष से घबराने के बजाय संघर्ष को साधना में बदल देने की प्रवृत्ति।

आज जब कोई कलाकार स्थापित हो जाता है तो उसकी सफलता के पीछे छिपी असुरक्षा दिखाई नहीं देती। किन्तु मुंबई का वह समय आशुतोष के लिए केवल काम खोजने का समय नहीं रहा होगा; वह स्वयं को प्रमाणित करने का समय भी रहा होगा। एक छोटे शहर से निकला युवक, जिसके पास प्रतिभा तो है लेकिन उद्योग में कोई बड़ा सहारा नहीं ऐसी स्थिति मनुष्य के भीतर या तो हीनता पैदा करती है या असाधारण आत्मविश्वास। आशुतोष के व्यक्तित्व में दूसरा रास्ता विकसित हुआ। शायद यही कारण है कि उन्होंने अपने आपको किसी एक साँचे में क़ैद नहीं होने दिया। 

‘स्वाभिमान’ से आरंभ हुई टेलीविज़न यात्रा और फिर 1998 की ‘दुश्मन’ ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। ‘दुश्मन’ और ‘संघर्ष’ के पात्रों ने उन्हें नकारात्मक भूमिकाओं के लिए दो फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिलाए। लेकिन यहाँ भी आशुतोष की मनोवैज्ञानिक यात्रा रोचक है। वे केवल ‘खलनायक’ बनकर संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने खल-पात्रों के भीतर की मनोवृत्ति को समझने का प्रयास किया। वे स्वयं कहते रहे हैं कि वे चरित्र को इस तरह निभाना चाहते हैं कि उसमें अभिनेता आशुतोष राना दिखाई ही न दे।

शायद इसी कारण उनके नकारात्मक पात्र केवल डराते नहीं थे, वे असहज भी करते थे। वे दर्शक को यह सोचने पर विवश करते थे कि बुराई केवल चेहरे पर नहीं होती, उसके पीछे भी एक मनुष्य, उसकी इच्छाएँ, उसकी विकृतियाँ और उसकी मनःस्थितियाँ होती हैं। लेकिन मुझे आशुतोष की यात्रा का सबसे सुंदर मोड़ तब दिखाई देता है, जब फ़िल्मी अभिनेता के भीतर का साहित्यिक मन सामने आता है। ‘मौन मुस्कान की मार’ केवल किसी अभिनेता द्वारा लिखी गई पुस्तक नहीं है। उसमें वह व्यक्ति दिखाई देता है जो समाज को दूर से देखता है, उसकी विसंगतियों को पकड़ता है और उन्हें व्यंग्य के माध्यम से सामने रखता है। आशुतोष ने स्वयं कहा है कि वे बचपन से पढ़ने-लिखने में रुचि रखते थे और व्यंग्य उन्हें अपनी बात कहने का प्रभावी माध्यम लगता है। 

और फिर ‘रामराज्य’ आता है। यहाँ अभिनेता और लेखक के बीच की दूरी और कम हो जाती है। राम उनके लिए केवल धार्मिक आख्यान के पात्र नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन और चरित्र की एक जीवित अवधारणा हैं। यह वही आशुतोष हैं, जिन्होंने कभी गाडरवारा की रामलीला में रावण का अभिनय किया था और अब रामकथा को लेखक की दृष्टि से पुनः देखने का प्रयास कर रहे हैं। मुझे इसमें एक गहरी मनोवैज्ञानिक निरंतरता दिखाई देती है। बचपन में उन्होंने रामलीला को बाहर से जिया था; परिपक्वता में वे उसी रामकथा को भीतर से समझने लगे। यही कारण है कि आशुतोष मेरे लिए केवल अभिनेता नहीं हैं। वे अभिनय, साहित्य, अध्यात्म और जीवन-दर्शन के बीच निरंतर संवाद करते हुए व्यक्ति हैं।

फ़िल्मों की बात करें तो ‘दुश्मन’ और ‘संघर्ष’ के बाद उन्होंने स्वयं को केवल हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मराठी, बंगाली और हरियाणवी फ़िल्मों में भी काम किया। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि उनका उद्देश्य केवल किसी एक फ़िल्म उद्योग का अभिनेता बनना नहीं, बल्कि “भारतीय अभिनेता” के रूप में पहचाना जाना था। यही वह बिंदु है जहाँ गाडरवारा का एक युवक भारतीयता के व्यापक आकाश में दिखाई देने लगता है।

और आज जब हम उन्हें देखते हैं तो उनकी पहचान केवल फ़िल्मों तक सीमित नहीं है। ‘पठान’, ‘फाइटर’, ’छावा’ जैसी फ़िल्मों से लेकर वेब माध्यम और रंगमंच तक उनका विस्तार दिखाई देता है। 2025 में वे रंगमंच के महत्त्व पर बात करते हुए थिएटर को अभिनेता का प्रशिक्षण-स्थल बताते रहे और यह स्पष्ट किया कि फ़िल्म तथा वेब माध्यम उस प्रशिक्षण को बड़े दर्शक-वर्ग तक पहुँचाने का मंच है। 

लेकिन आशुतोष की वर्तमान यात्रा का सबसे अर्थपूर्ण अध्याय मेरे लिए फिर रंगमंच ही है। ‘हमारे राम’ में रावण की भूमिका निभाते हुए वे फिर मंच पर लौटे। यह केवल एक अभिनेता की वापसी नहीं थी। यह उस कलाकार की अपने मूल की ओर वापसी थी जिसने कभी चार वर्ष की उम्र में मंच पर क़दम रखा था। यह प्रस्तुति भारत के अनेक नगरों में पहुँची और 2026 में दुबई के बाद लंदन तक पहुँची। लंदन में इसके प्रदर्शन की ख़बर ने यह भी दिखाया कि भारतीय मिथक और भारतीय रंगमंच की भाषा अब समुद्र पार बसे भारतीयों के लिए भी सांस्कृतिक स्मृति का माध्यम बन रही है।

यहीं से उस ‘ओरा’ को समझा जा सकता है, जिसकी चर्चा आज आशुतोष राना के संदर्भ में होती है।

यह आभामंडल केवल प्रसिद्धि का नहीं है। प्रसिद्धि बहुत लोगों को मिलती है। आशुतोष का आभामंडल इसलिए अलग है कि उनके व्यक्तित्व में ‘गाडरवारा का सहज आदमी, रंगमंच का साधक, फ़िल्मों का समर्थ अभिनेता, साहित्य का पाठक-लेखक और भारतीय संस्कृति का संवेदनशील व्याख्याकार—सब एक साथ दिखाई देते हैं।’ दुबई से लंदन तक ‘हमारे राम’ की यात्रा इस बात का एक सुंदर उदाहरण है। एक छोटे-से नगर में रामलीला करने वाला बालक आज विदेशों के मंच पर रावण बनकर खड़ा है और हज़ारों मील दूर बैठे दर्शकों को भारतीय कथा-संस्कृति से जोड़ रहा है। यह यात्रा जितनी बाहरी है, उससे कहीं अधिक आंतरिक है। 

और फिर जब मैं आशुतोष राना को गाडरवारा में देखता हूँ, तो मुझे उस आभामंडल के पीछे छिपा हुआ दूसरा आशुतोष दिखाई देता है।

वह जो अपने नगर की गलियों को भूलना नहीं चाहता। वह जो अपने लोगों के बीच आते ही सितारा नहीं, ‘राना भैया’ हो जाता है। वह जो अपने नगर के युवाओं में अभिनय की सम्भावना देखता है। इसीलिए राष्ट्रीय नाट्य संस्थान की कार्यशाला के दौरान उनका गाडरवारा के प्रतिभागियों के साथ समय बिताना मेरे लिए किसी सेलिब्रिटी की औपचारिक उपस्थिति नहीं था। मेरे लिए वह उस व्यक्ति का अपनी जड़ों की ओर लौटना था, जिसने जीवन में बहुत दूर तक जाकर यह जाना है कि ऊँचाई कितनी भी मिल जाए, मनुष्य की जड़ें अंततः उसी मिट्टी में शक्ति खोजती हैं जहाँ उसका बचपन बीता था। 

शायद यही आशुतोष के मन का सबसे बड़ा द्वंद्व भी है एक ओर देश-दुनिया का विराट मंच और दूसरी ओर अपनी माटी की वह आत्मीय दुनिया, जहाँ कोई उन्हें उनके अभिनय या पुरस्कार से नहीं, उनके अपनेपन से पहचानता है। मुझे लगता है कि उनकी सबसे बड़ी सफलता यह नहीं कि उन्होंने मुंबई जीत ली, न यह कि उन्हें फ़िल्मफ़ेयर मिला, न यह कि उनके अभिनय को देश के अनेक हिस्सों में सराहा गया, और न ही यह कि उनका रंगमंच अब दुबई और लंदन तक पहुँच रहा है। उनकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि इतनी दूर जाकर भी वे अपने भीतर के गाडरवारा को, अपनी मिट्टी को, अपने गुरु के आदर्शों को, अपने रिश्तों को अपनी मातभूमि से जुड़ी परम्पराओं को मरने नहीं देते। शायद इसी कारण जब वे यहाँ आते हैं तो उनके चेहरे पर एक अलग चमक दिखाई देती है। यह किसी अभिनेता की कैमरे वाली चमक नहीं होती। यह उस व्यक्ति की चमक होती है जो अपने अतीत से मिलने आया है। 

मेरी दृष्टि में आशुतोष राना की पूरी यात्रा को एक वाक्य में कहना हो तो मैं कहूँगा—गाडरवारा ने उन्हें मिट्टी दी, रंगमंच ने उन्हें देह दी, साहित्य ने उन्हें दृष्टि दी, सिनेमा ने उन्हें विस्तार दिया और जीवन ने उन्हें अपनी जड़ों की ओर लौटना सिखाया। आज वे देश की सीमाओं से बाहर भारतीय कला और कथा-संस्कृति के प्रतिनिधि के रूप में दिखाई देते हैं। लेकिन मेरे लिए उनके भीतर आज भी वही गाडरवारा है रामलीला का वह मंच, पिता की आँखों में विश्वास, दद्दाजी का आशीर्वाद, बुंदेली माटी की गंध और सपनों से भरा वह बालक, जिसने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन उसकी आवाज़ इतनी दूर तक जाएगी। और इसलिए जब मैं आशुतोष राना को देखता हूँ, तो मुझे एक सफल अभिनेता नहीं, अपनी मिट्टी से निकला हुआ वह वृक्ष दिखाई देता है जिसकी शाखाएँ देश-विदेश तक फैल गई हैं, लेकिन जिसकी जड़ें आज भी गाडरवारा की धरती में हैं।

शायद इसी को सफलता की सबसे सुंदर परिभाषा कहा जा सकता है आकाश आपका हो जाए, लेकिन मिट्टी आपको अपना ही समझती रहे। 

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