मौन का शंखनाद

01-06-2026

मौन का शंखनाद

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)


आँसुओं की आँच में, तपता हुआ अभिमान लेकर, 
हम बिखरते श्वास को, अंतिम अटल वरदान देकर, 
वेदना के स्वर हृदय को, हम सुनाने जा रहे हैं। 
टूटती उम्मीद को, संघर्ष का शृंगार देकर। 
हम अकेले ही डगर पर, पग़ बढ़ाने जा रहे हैं। 
 
काँच के महलों में रहकर, पत्थरों से नेह जोड़ा। 
रेत की दीवार पर ही, उम्र का रथ हमने छोड़ा। 
आँधियों के हाथ सौंपा, दीप जो अब तक जला था। 
हृदय उसको दे दिया है, दोस्त बन जिसने छला था। 
चोट खाए इस हृदय का, अश्रु से अभिषेक करके। 
सुमन उनको हो मुबारक, शूल झोली में भरके। 
रेत पर सपनों का घर अब, हम बनाने जा रहे हैं। 
टूटती उम्मीद को, संघर्ष का शृंगार देकर। 
हम अकेले ही डगर पर, पग़ बढ़ाने जा रहे हैं। 
 
बात जो होंठों पे आकर, रुक गई वह बात क्या थी? 
एक जलते दीप की उस, रात में औक़ात क्या थी? 
छूटते ही हाथ जैसे, स्वप्न सब बिखरे धरातल। 
रो रही सूनी हवेली, रो रहा आँखों का काजल। 
आज अपनी ही प्रतिज्ञा, को स्वयं ही भंग करके, 
हम अधूरे प्रेम में अब, निज विरह का रंग भरके। 
वक़्त के रूठे शहर को, हम रिझाने जा रहे हैं। 
टूटती उम्मीद को, संघर्ष का शृंगार देकर। 
हम अकेले ही डगर पर, पग बढ़ाने जा रहे हैं। 
 
डूबते सूरज की लाली, रात का पैग़ाम देती। 
ज़िन्दगी अब नाव जैसी, लहर में हिचकोल लेती। 
देह की इस कोठरी में, साँस अब मेहमान जैसी। 
लग रही यह ज़िन्दगी अब, मृत्यमय बैराग जैसी। 
जीत कर दुनिया से देखो, आज अपनों से हैं हारे। 
इस उमर की डायरी के, फटे टूटे पृष्ठ सारे। 
पीर को गहरी गुफा में, हम सुलाने जा रहे हैं। 
टूटती उम्मीद को, संघर्ष का शृंगार देकर। 
हम अकेले ही डगर पर, पग बढ़ाने जा रहे हैं। 

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