परफ़ेक्ट पोज़

15-03-2026

परफ़ेक्ट पोज़

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 294, अप्रैल प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

शहर के सबसे बड़े मॉल के प्रवेश द्वार पर सेल्फ़ी पॉइंट बना था। चकाचौंध रोशनी के बीच लोग मुस्कुराते हुए अपनी तस्वीरें खींच रहे थे। वहाँ खड़े दरबान, किशन सिंह की वर्दी इस्तरी की हुई कड़क थी, पर उसकी आँखों में गहरी थकान जमी थी। 

एक युवक आया, जिसने हाथ में महँगा कॉफ़ी मग थाम रखा था। उसने किशन सिंह को लगभग धक्का देते हुए कहा, “ओ भाई! ज़रा हटना, फ़्रेम में आ रहे हो। बैकग्राउंड ख़राब हो रहा है।”

किशन सिंह एक तरफ़ हट गया। उसने देखा कि वह युवक अपनी तस्वीर में ग़रीबों की मदद वाला एक डिजिटल स्टिकर लगा रहा था और कैप्शन लिख रहा था ‘मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है’। 

तभी एक लंगड़ाती ग़रीब महिला, जिसका चेहरा भूख से बिलख रहा था उसके कैमरे की रेंज में आ गई। तस्वीर खींच रहे युवक ने झुँझलाकर कहा, “धत् तेरे की! पूरा शॉट बिगाड़ दिया।”

किशन सिंह चुपचाप आगे बढ़ा। उसने अपने टिफ़िन से दो रोटियाँ निकालीं और महिला के हाथ पर रख दीं। वह औरत दुआओं के साथ किशन सिंह को देख रही थी। 

ऊपर लगे सीसीटीवी कैमरे में वह युवक अब भी एक परफ़ेक्ट पोज़ की तलाश में था, जबकि कैमरे की डिजिटल आँख ने किशन सिंह के उस अनचाहे क्षण को क़ैद कर लिया था, जिसमें मानवता का कोई स्टिकर नहीं, बल्कि असली चेहरा था। 

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