सावित्री की ज्योति

15-01-2026

सावित्री की ज्योति

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

जब अँधेरे
सदियों की आदत बन जाएँ
तब एक स्त्री
दीपक बनकर जन्म लेती है। 
 
सावित्रीबाई
तुम केवल एक नाम नहीं
तुम
अक्षरों का पहला उजाला हो
उन आँखों के लिए
जिनसे पढ़ने का अधिकार
छीन लिया गया था। 
 
कंधे पर किताब
और मन में साहस
तुम चलीं
पत्थरों से भरी गलियों में
जहाँ शिक्षा
अपराध मानी जाती थी
और स्त्री
मौन रहने की सीख। 
 
लोगों ने
कीचड़ उछाला
शब्दों से नहीं
हाथों से
पर तुम
हर अपमान के बाद
कपड़े बदलकर नहीं
इतिहास बदलकर लौटीं। 
 
तुमने सिखाया
कि शिक्षा
दान नहीं
अधिकार है
और बराबरी
भीख में नहीं
संघर्ष में मिलती है। 
 
बालिकाओं के लिए
स्कूल खोलना
सिर्फ़ इमारत खड़ी करना नहीं था
यह
भविष्य की
रीढ़ सीधी करना था। 
 
तुमने
विधवाओं की पीड़ा देखी
अछूत समझे गए लोगों का
दर्द जिया
और समाज से कहा
मनुष्य को
मनुष्य की तरह देखो। 
 
महामारी के समय
जब लोग
साए से डरते थे
तब तुम
रोगियों के पास खड़ी रहीं
माँ की तरह
साहस की तरह। 
 
तुम्हारी शक्ति
शोर नहीं करती
वह
सेवा में घुल जाती है
वह
शब्द नहीं माँगती
वह
परिवर्तन बन जाती है। 
 
आज भी
जब कोई लड़की
पहली बार
क़लम उठाती है
तो
उस स्याही में
तुम्हारी ज्योति
चमक उठती है। 
 
सावित्रीबाई
तुम
नारी शक्ति का नारा नहीं
तुम
नारी शक्ति का
जीता जागता
इतिहास हो। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
गीत-नवगीत
लघुकथा
सांस्कृतिक आलेख
बाल साहित्य कविता
स्मृति लेख
दोहे
कहानी
कविता-मुक्तक
साहित्यिक आलेख
काम की बात
सामाजिक आलेख
कविता - हाइकु
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
चिन्तन
व्यक्ति चित्र
किशोर साहित्य कहानी
सांस्कृतिक कथा
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
ललित निबन्ध
स्वास्थ्य
खण्डकाव्य
नाटक
रेखाचित्र
काव्य नाटक
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
पुस्तक समीक्षा
हास्य-व्यंग्य कविता
गीतिका
अनूदित कविता
किशोर साहित्य कविता
एकांकी
ग़ज़ल
बाल साहित्य लघुकथा
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य नाटक
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में