ध्यान पर दोहे

15-05-2026

ध्यान पर दोहे

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 297, मई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 
 
मन चंचल घोड़े सदिश, खींचे ध्यान लगाम। 
भटके पथ से लौटकर, मन पाए विश्राम॥
 
शब्द भाव जब सब थमें, भीतर बहे प्रकाश। 
ध्यान वही क्षण मौन का, आत्म बने आकाश॥
 
श्वासों की सरिता बहे, लय हो जाती मंद। 
ध्यान जगा दे अंतरा, जैसे जागे छंद॥
 
जग के कोलाहल तले, दबता हृदय विधान। 
ध्यान सुनाता मौन में, जीवन अंतर्गान॥
 
लोभ मोह की धूल को, धोता निर्मल ध्यान। 
अंतर का दर्पण बने, उज्ज्वल हो पहचान॥
 
द्वेष घृणा मन जब रहे, क्रोधित हृदय अशांत। 
ध्यान प्रकाशित मंत्र है, दूर करे सब भ्रांत॥
 
ध्यान योग आयाम है, मन होता निष्काम। 
ध्यान स्वयं से है मिलन, आत्मतत्त्व का धाम॥
 
क्षण भर की एकाग्रता, दे अनंत विस्तार। 
ध्यान बूँद में खोज ले, सागर भर संसार॥
 
जिसके अंतर ध्यान है, मिटे सकल अभिमान। 
ध्यान झुकाता है अहम, देता दिव्य विधान॥
 
नित अभ्यासित ध्यान से, निर्मल हो व्यवहार। 
भीतर अंतर्मन जगे, बाहर नव संसार॥

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