जीवन प्रेम से खुलता है

01-01-2026

जीवन प्रेम से खुलता है

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

तुम किसी स्त्री को
निर्वस्त्र कर सकते हो
पर नग्न नहीं। 
 
नग्नता
कपड़ों का हट जाना नहीं
नग्नता
आत्मा का भरोसा है। 
 
जब बलपूर्वक
कपड़े उतारे जाते हैं
तो स्त्री
और भी गहरे वस्त्र पहन लेती है
ऐसे वस्त्र
जो आँखों से नहीं
केवल प्रतीक्षा से उतरते हैं। 
 
तुम शरीर को छू सकते हो
तोड़ सकते हो
रौंद सकते हो
पर आत्मा
वहाँ से चुपचाप चली जाती है
जैसे कोई दीप
हवा आने से पहले ही
बुझ जाना चुन ले। 
 
शरीर पर किया गया अत्याचार
लाश से किया गया संवाद है
उसमें जीवन उपस्थित नहीं होता
केवल आकृति बची रहती है
आत्मा नहीं। 
 
कुँआरापन
कोई झिल्ली नहीं
जो फट जाए
कुँआरापन
तो विश्वास की जड़ है
जो केवल प्रेम से
फूल बनती है। 
 
वैज्ञानिक
जीवन को मेज़ पर लिटाता है
औज़ारों से खोलता है
काटता है
मापता है
और समझ लेता है
कि उसने जान लिया। 
 
पर जो तोड़ा गया
वह जाना नहीं गया
जो खंडित हुआ
वह रहस्य नहीं रहा
केवल वस्तु बन गया। 
 
प्रेम के पास
हाथ में हथियार नहीं होता
वह
घुटनों के बल बैठा
प्रकृति के द्वार पर
प्रार्थना की तरह होता है। 
 
प्रेम अर्जुन की तरह है
दुर्योधन नहीं
वह आक्रामक नहीं
धैर्य में डूबा हुआ होता है। 
 
प्रेम हमेशा कहता है
मैं प्रतीक्षा कर सकता हूँ
जब तुम चाहो
तभी खुलना
जब तुम्हारे भीतर
भी वही चाह जागे। 
 
और तब
प्रकृति ने
अपने चीर स्वयं बढ़ा दिए
रहस्य
फूल की तरह
खुल गया। 
 
जो ज्ञान
प्रयोगशालाओं में नहीं मिला
वह
प्रतीक्षा की एक साँस में
उतर आया। 
 
धर्म
कोई सिद्धांत नहीं
धर्म
प्रेम की भाषा है
अनाक्रमण का साहस है
और भरोसे की धीमी चाल है। 
 
जीवन
तो स्त्री है
वह
बल से नहीं
समर्पण से खुलता है। 

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