भगवान परशुराम: धर्म संतुलन की ज्वाला और युग चेतना का शाश्वत स्वर

01-05-2026

भगवान परशुराम: धर्म संतुलन की ज्वाला और युग चेतना का शाश्वत स्वर

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 296, मई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)


(अक्षय तृतीया पर विशेष आलेख-सुशील शर्मा) 

 

भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में भगवान परशुराम का व्यक्तित्व जितना तेजस्वी है, उतना ही जटिल भी। वे एक साथ ऋषि हैं और योद्धा भी, तपस्वी हैं और क्रांतिकारी भी, करुणा के स्रोत हैं तो दंड के उद्घोषक भी। इस द्वंद्वात्मकता में ही उनका वैशिष्ट्य निहित है। प्रायः उन्हें केवल क्षत्रिय-विनाशक के रूप में सीमित कर दिया जाता है, जबकि उनका व्यापक स्वरूप धर्म-संतुलन के प्रहरी, अन्याय के प्रतिरोधक और मर्यादा के स्थापक के रूप में अधिक प्रासंगिक है। 

परशुराम का जन्म उस कालखंड में हुआ, जब सत्ता अहंकार में डूबी हुई थी और शक्ति का संतुलन टूट चुका था। उनके पिता ऋषि जमदग्नि तप और ज्ञान के प्रतीक थे, जबकि माता रेणुका शील और त्याग की प्रतिमूर्ति। इस वंश परंपरा ने परशुराम को द्विगुणित संस्कार दिए एक ओर ज्ञान की गहराई, दूसरी ओर कर्म की तीव्रता। उनके हाथ में परशु केवल शस्त्र नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना का प्रतीक था। 

समाज में व्याप्त अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध उनका उग्र रूप वस्तुतः किसी व्यक्तिगत क्रोध का परिणाम नहीं था, बल्कि वह व्यवस्था के असंतुलन के प्रति एक प्रतिकार था। उस समय के अत्याचारी राजा सहस्रार्जुन का वध इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह घटना केवल एक व्यक्ति के पतन की कथा नहीं, बल्कि उस अहंकार के अंत का प्रतीक है, जो जब-जब सत्ता में प्रवेश करता है, तब-तब समाज का संतुलन बिगाड़ देता है। 

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है क्या परशुराम का इक्कीस बार क्षत्रिय-विनाश नैतिक दृष्टि से उचित ठहराया जा सकता है? आधुनिक संवेदनशीलता इस पर प्रश्नचिह्न लगाती है। किन्तु इस प्रसंग को प्रतीकात्मक दृष्टि से समझना अधिक समीचीन है। यह विनाश किसी जाति का नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति का था, जो शक्ति के मद में अधर्म को जन्म देती है। परशुराम का यह आचरण हमें यह सिखाता है कि जब व्यवस्था पूरी तरह भ्रष्ट हो जाए, तब परिवर्तन के लिए कठोरता भी आवश्यक हो जाती है। 

परशुराम का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम उनका गुरुत्व है। वे केवल योद्धा नहीं, अपितु आचार्य भी हैं। उन्होंने महान योद्धाओं को शिक्षित किया, जिनमें भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण प्रमुख हैं। यह तथ्य उनके व्यक्तित्व को एक नई ऊँचाई देता है; वे केवल विनाशक नहीं, निर्माणकर्ता भी थे। उन्होंने शस्त्र का ज्ञान दिया, पर साथ ही धर्म की मर्यादा भी सिखाई। 

वर्तमान समय में, जब समाज अनेक प्रकार के असंतुलनों से जूझ रहा है नैतिक पतन, सत्ता का दुरुपयोग, सामाजिक असमानता ऐसे में परशुराम का व्यक्तित्व एक दर्पण की तरह हमारे सामने खड़ा होता है। वे हमें यह स्मरण कराते हैं कि केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं, और केवल शक्ति भी पर्याप्त नहीं; दोनों का संतुलन ही समाज को स्वस्थ बना सकता है। 

आज की वैश्विक दुनिया में परशुराम की प्रासंगिकता को यदि समझना हो, तो हमें उनके अहिंसा और हिंसा के संतुलन को समझना होगा। वे अकारण हिंसा के पक्षधर नहीं थे, परन्तु जब धर्म की रक्षा का प्रश्न आया, तो उन्होंने संकोच नहीं किया। यह सिद्धांत आज भी उतना ही लागू होता है—अन्याय के विरुद्ध मौन रहना भी एक प्रकार का अपराध है। 

सामाजिक दृष्टि से परशुराम का संदेश अत्यंत स्पष्ट है सत्ता का उपयोग सेवा के लिए होना चाहिए, न कि शोषण के लिए। जब-जब सत्ता अपने कर्त्तव्य से विमुख होती है, तब-तब समाज में असंतोष जन्म लेता है। परशुराम इस असंतोष को दिशा देने वाले व्यक्तित्व हैं। वे अराजकता नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण व्यवस्था के समर्थक हैं। 

उनके जीवन का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है त्याग। उन्होंने अपने कर्मों के बाद स्वयं को सत्ता से दूर रखा। उन्होंने राज्य स्थापित नहीं किया, बल्कि समाज को संतुलित कर पुनः तप में लीन हो गए। यह त्याग आज के नेतृत्व के लिए एक बड़ा संदेश है, जहाँ सत्ता अक्सर लक्ष्य बन जाती है, साधन नहीं। 

परशुराम के आलोचक यह तर्क देते हैं कि उनका आचरण अत्यधिक उग्र था और उसमें करुणा का अभाव था। किन्तु यह आलोचना उनके समग्र व्यक्तित्व को समझे बिना की जाती है। उनका उग्र रूप केवल परिस्थितियों की प्रतिक्रिया था, उनका मूल स्वभाव तप, ज्ञान और संतुलन का था। वे उस अग्नि की तरह हैं, जो आवश्यकता पड़ने पर ही प्रज्वलित होती है, अन्यथा शांत रहती है। 

आज के परिप्रेक्ष्य में परशुराम का सबसे बड़ा संदेश है स्वयं के भीतर के अहंकार का विनाश। बाहरी शत्रु से पहले आंतरिक शत्रु को पहचानना आवश्यक है। जब तक मनुष्य अपने भीतर के लोभ, क्रोध और अहंकार को नहीं जीतता, तब तक बाहरी व्यवस्था भी संतुलित नहीं हो सकती। 

अंततः, परशुराम का व्यक्तित्व किसी एक आयाम में सीमित नहीं किया जा सकता। वे एक युग का प्रतिनिधित्व करते हैं, एक चेतना का प्रतीक हैं, जो हर काल में प्रासंगिक रहती है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि धर्म केवल पूजा-पाठ का विषय नहीं, बल्कि आचरण का प्रश्न है। न्याय, संतुलन और मर्यादा ये तीनों ही उनके जीवन के आधार स्तंभ हैं। 

आज जब हम एक ऐसे दौर में खड़े हैं, जहाँ मूल्य संकट में हैं और दिशा धुँधली है, तब परशुराम का स्मरण केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी है। उनके जीवन की ज्वाला हमें यह प्रेरणा देती है कि हम अन्याय के विरुद्ध खड़े हों, परन्तु साथ ही अपने भीतर के संतुलन को भी बनाए रखें। 

परशुराम कोई कथा मात्र नहीं हैं, वे एक प्रश्न हैं हमारे समय के लिए, हमारे समाज के लिए, और हमारे भीतर के मनुष्य के लिए। उनके उत्तर में ही शायद हमारे वर्तमान और भविष्य की दिशा छिपी हुई है। 

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