शुभ्र चाँदनी सी लगती हो

15-01-2021

शुभ्र चाँदनी सी लगती हो

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 173, जनवरी द्वितीय, 2021 में प्रकाशित)

शुभ्र चाँदनी सी लगती हो,
किस के लिए सँवरती हो।
 
मन ही मन तुम मुझको चाहो,
कहने से क्यों डरती हो।
 
जब भी रस्ता तेरा निकलूँ,
छुप छुप देखा करती हो।
 
खो जाता हूँ तेरे अंदर,
लब पर लब जब धरती हो।
 
मेरा मन तुमसे है उलझा,
तुम भी मुझ पर मरती हो।
 
रूठा करती हरदिन मुझसे,
उतना चाहा करती हो।
 
जब भी तन मन से थक जाता,
मुझ में जीवन भरती हो।
 
तुम मेरे मन की कविता हो,
मन मधुवन से सरती हो।

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