संपादकीय - अब मैं मौन नहीं हूँ
साहित्य कुञ्ज के इस अंक में
कहानियाँ
अंतिम ऑनलाइन
वह वृद्ध शिक्षक अपने छोटे से कमरे में अकेले बैठे थे। सामने दीवार पर टँगी घड़ी की टिक-टिक कमरे की निस्तब्धता को और गहरा कर रही थी। उन्होंने जीवन भर बच्चों को पढ़ाया था। शब्दों को अर्थ दिया था आगे पढ़ें
अंतिम फ़ैसला
पीहू मोहित की दीदी थी। पीहू का रंग काला था। और एक हाथ से हल्का सा विकलांग थी पीहू। लेकिन ये मामूली विकलांगता थी। पीहू दीदी के चेहरे पर हमेशा उदासी पुती रहती थी। हमेशा लगता कुछ ना कुछ आगे पढ़ें
काग़ज़ का जंगल
नगर के मध्य एक प्राचीन पीपल का वृक्ष खड़ा था। उसकी जड़ों में समय का इतिहास सोया था और उसकी शाखाओं पर अनगिनत ऋतुएँ विश्राम कर चुकी थीं। लोग उसे “बूढ़ा साक्षी” कहते थे, क्योंकि उसने नगर को गाँव आगे पढ़ें
किसका जीवन परिपूर्ण
बड़ी सी कोठी में रहने वाले एक दम्पती को देखकर सामने ही टूटी-फूटी झोंपड़ी में रहने वाले एक मज़दूर की पत्नी आये दिन भगवान से कहा करती है, “हे प्रभु! इन अमीरों को आपने दस-दस कमरों वाला इतना आलीशान आगे पढ़ें
कोहरे की सुबह, शनिवार, २७ दिसंबर २०२५
आज बहुत ठंड है। बाहर घना कोहरा पसरा हुआ है, फिर भी काम पर तो जाना ही होगा। मालकिन इंतज़ार कर रही होंगी— साहब को जल्दी ऑफिस जाना होता है। वैसे भी प्रयागराज में ठंड कुछ ज़्यादा ही पड़ती है। आगे पढ़ें
जल देवता का क्रोध
एक गाँव एक बड़ी और पवित्र नदी के किनारे बसा था। गाँव के लोग नदी को ‘जल देवता’ मानते थे और उसका सम्मान करते थे। लेकिन जैसे-जैसे गाँव बड़ा होता गया, लोगों ने नदी में कूड़ा फेंकना शुरू कर दिया, आगे पढ़ें
डियर जैनी . . .
2020, अक्टूबर 25 प्रिय जैनी, आशा है अब तुम सुकून में होगी, तुम जैसा चाहती थीं, हो गया। मैं यहाँ जेल में और तुम . . .! तुम्हारे कहे शब्द क़ानून ने मान लिए और सौतेले पिता को आगे पढ़ें
तारामंडल का खोया हुआ नक़्शा
दस साल का मयंक हर रात छत पर बैठकर तारों को देखा करता और कल्पनाएँ बुनता रहता। उसे लगता था कि आकाश के पीछे ज़रूर कुछ न कुछ छिपा है। एक दिन उसने अपनी मेज़ के नीचे एक हल्का आगे पढ़ें
दस सेकंड का फ़ैसला
ट्रेन अभी चली नहीं है। भीड़भाड़ वाली ट्रेन, प्लेटफ़ॉर्म पर भागते लोग, और चाय वाले की आवाज़, “चाय . . . गरम चाय . . . ” “कितने की है चाय?” अमित ने खिड़की से झुककर पूछा। “दस रुपये की आगे पढ़ें
प्रेम सम्मान
क़स्बे के उस पुराने सरकारी कन्या विद्यालय की पीली पड़ चुकी दीवारों के पीछे एक ऐसा मौन पसरा रहता था, जो अक्सर मध्यांतर की शोर-शराबे वाली आवाज़ों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता था। इसी विद्यालय की वरिष्ठ आगे पढ़ें
प्लास्टिक का जंगल
एक तटीय क़स्बा था, जहाँ के लोग मछली पकड़कर और पर्यटन से अपना जीवन यापन करते थे। समुद्र उनके लिए सब कुछ था। लेकिन समय के साथ, प्लास्टिक का उपयोग बेतहाशा बढ़ गया, और लोग प्लास्टिक कचरा सीधे समुद्र में आगे पढ़ें
बारिश और हवा
बारिश को सलाम किया। न भी करता तो चल जाता। पर एक शिष्टाचार भी होता है। इसी के चलते अभिवादन कर दिया। कल्लू की झोंपड़ी पानी से रिसने लगी थी। ठंड भी बड़ी तीखी थी। खोमचे वाला आज काम आगे पढ़ें
मर्यादा का प्रेम
वेलेंटाइन दिवस था। नगर के कैफ़े, उद्यान और मार्ग गुलाबों से भर गए थे। युवा हाथों में उपहार लिए घूम रहे थे। उसी भीड़ के बीच अरुण और निधि पुस्तकालय की सीढ़ियों पर शांत बैठे थे। दोनों वर्षों से आगे पढ़ें
मौन पहाड़ का बदला
ऊँचे-ऊँचे हिमखंडों से घिरा एक छोटा शहर था। पहाड़ों की गोद में बसे इस शहर में पर्यटन फल-फूल रहा था। लेकिन पर्यटकों और स्थानीय लोगों की बढ़ती संख्या के कारण, पहाड़ पर कचरा और प्रदूषण बढ़ने लगा। होटल और आगे पढ़ें
राख के बाद
वर्ष 2137 लेकिन धरती अब भी जल रही थी; आग से नहीं बल्कि परमाणु युद्ध के दौरान उत्सर्जित अवशिष्ट विकिरण से। तीसरे विश्वयुद्ध को बीते चौंतीस वर्ष हो चुके थे और आकाश अब कोई नीला नहीं था। उसने अपना आगे पढ़ें
रावण की लकड़ी
जैसे ही रावण के पुतले को आग लगी; लोग जान जोख़िम में डालकर, उसकी लकड़ी खींचने के लिए टूट पड़े। मोलू कहाँ पीछे रहने वाला था। वह है तो छोटा; पर बड़ा फ़ुर्तीला था। एक पूरी लाठी जितनी लकड़ी आगे पढ़ें
वो पाँच मिनट
गाँव की पक्की सड़क पर सर्राटे भरती मोटरसाइकिलें और हाथ में चमकते महँगे स्मार्टफोन अब कोई अचरज की बात नहीं थे। समर सिंह का घर भी इस प्रगति का जीवंत उदाहरण था। घर के बाहर चमचमाती एसयूवी खड़ी थी आगे पढ़ें
स्मृतियों के अवशेष
उस पुराने पुश्तैनी मकान के बरामदे में बिछी आरामकुर्सी अब केवल नाम की आराम कुर्सी रह गई थी। नब्बे वर्षीय दीनानाथ जी के लिए वह उनकी देह का विस्तार बन चुकी थी। ढलती साँझ की मद्धम रोशनी में वे आगे पढ़ें
स्वार्थ की लक्ष्मण रेखा
रात के भोजन की मेज़ पर सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल काँटों-चम्मचों की आवाज़ तोड़ रही थी। समर्थ ने अचानक कहा, “पिताजी, हमने शहर के पास जो नया अपार्टमेंट लिया है, वहाँ शिफ़्ट होने की सोच रहे हैं। वहाँ आगे पढ़ें
क़ुदरत का क्रोध
वर्ष 2098 में पृथ्वी अपने इतिहास के सबसे ऊँचे औसत तापमान 48.6°C पर पहुँच चुकी थी। पिछले सौ वर्षों में वैश्विक औसत तापमान में 3.7°C की वृद्धि ने पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर दिया था। ग्लेशियर लगातार पिघल आगे पढ़ें
हास्य/व्यंग्य
10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
नवरालाल ने ख़ुशी जताते हुए कहा, “दस मिनट में डिलीवरी बंद हो गई।” फालतूचंद ने तुरंत पलटकर सवाल किया, “तो अब कितने मिनट में डिलीवरी होगी? पंद्रह या बीस?” फालतूचंद की इस गुगली पर नवरालाल क्लीन बोल्ड हो गए। आगे पढ़ें
आलू प्याज़ दहाई पर है, फूल गोभी सैंकड़े पर
बजट में क्या है, इसकी राय आजकल नेताओं से पूछी जा रही है। पक्ष वालों के तर्क हैं कि बजट संतुलित है। और आम-आदमी को ध्यान में रखकर बनाया गया है। लेकिन विपक्ष को कभी भी सतारूढ़ दल का आगे पढ़ें
एस्पिरिन एपस्टीन और ताज़े टटके भैया जी
बँधुओ! वैसे तो मैं अभी नवाकुंरित जनसवेक हूँ। हिम्मत और दुस्साहस से जनसेवा के पथ पर पूरी तन्मयता से चलता रहा तो बहुत जल्दी बड़ा जनसवेक भी हो जाऊँगा। इतना बड़ा कि मुझे समाज कहीं नहीं दिखेगा। बस समाज आगे पढ़ें
काम क्यों करें?
गाँव की पान की दुकान पर खड़े एक 35 वर्षीय निठल्ले बेरोज़गार युवक से मैंने पूछा, “कुछ कमाते-धमाते क्यों नहीं? दिनभर शराब पीते हो, राजश्री खाकर थूकते रहते हो।” वह बोला, “मेरी मर्ज़ी।” इस ‘मेरी मर्ज़ी’ में आलस्य नहीं, आगे पढ़ें
टंकी का बयान: एक गिरावट की आत्मकथा
अभी एक टंकी ने अपनी गिरावट दर्ज करवाई है। वैसे भी यह दौर गिरावटों का ही चल रहा है। शेयर मार्केट गिर रहा है, पुल गिर रहे हैं, रुपया तो कब से गिरता चला आ रहा है। नेता और अफ़सर आगे पढ़ें
टीवी डिबेट: बहस कम, तमाशा ज़्यादा
आजकल टीवी डिबेट देखकर लगता है कि हम किसी अखाड़े में आ गए हैं, जहाँ एक-दूसरे पर ज़ुबानी लात-घूँसे चल रहे हैं। विषय क्या है, यह तो भगवान जाने, लेकिन एंकर ऐसे चीखती हैं जैसे स्टुडियो में ऑक्सीजन ख़त्म आगे पढ़ें
नेताओं पर ब्रांडेड जूते फेंके जाएँ, तभी प्रगति कहलाएगी
आदर्श लोकतंत्र में फेंकने का अधिकार सिर्फ़ नेताओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। जनता भी कभी-कभार कुछ फेंक ले, जैसे नेताओं पर जूते। नेताओं पर जूते फेंकना किसी भी तरह से हिंसक घटना नहीं माना जाना चाहिए। आम लोग आगे पढ़ें
पार्टी के सिर पर पानी की मार चल रही है, शर्म नाम की चीज़ नहा डालो
किसी भी घटना में जिसका पेट का पानी न हिले, वही सच्चा नेता पार्टी में नेताओं को आदेश मिला कि बिना नहाए सब लोग मीटिंग में इकट्ठा हो जाओ। नेताओं को हैरानी हुई। पार्टी को जो भी राजनीतिक आगे पढ़ें
पालिटिक्स में हँसी के लिए और प्रदूषण में खाँसी के लिए तैयार रहना पड़ता है
दुश्मन वार करता है और डॉक्टर इलाज करता है। इलाज में देर हो जाए तो मरीज़ की हालत बिगड़ जाती है। बीमार से कहा जाता है कि दवा-दारू कराओ, लेकिन बिना पर्ची के दवा नहीं मिलती और गुजरात तथा आगे पढ़ें
पेंशन लेने का, टेंशन देने का
पिरथी काका के बैठक वाले घर के बाहर नया बोर्ड टँगा देख कर मुझे हैरानी हुई। बोर्ड पर लिखा था—स्वामी पेंशनानंद। मैं घर के भीतर गया तो देखा, काका सफ़ेद कुरता-पायजामा पहने सोफ़े पर बैठे गुनगुना रहे थे, ‘ओ आगे पढ़ें
प्रयोग बकनली का और बकबक नली का
क्या प्यार का भी कोई गारंटी पीरियड होता है? किसने कहा कि ढलती ज़िन्दगी में पति-पत्नी के बीच प्यार नहीं होता? कल की ही बात है। बड़े घर की शादी में दावत पर जाना हुआ। उँगलियाँ चाटने वाला खाना आगे पढ़ें
प्लीज़ ऑफ़िस को घर न बनाइए
भाई नौकरी के कुछ अघोषित नियम-क़ानून और परंपराएँ होती हैं, उन्हें निभाना ही पड़ता है। उन्हें पारिवारिक रिश्तों से जोड़ना ठीक नहीं! घर और ऑफ़िस दो अलग-अलग जगहें हैं। दो अलग-अलग कार्यक्षेत्र हैं। उनको आपस में नहीं मिलाया जा आगे पढ़ें
माफ़ी की दुकान
देवियो और सज्जनो, ये बरस बीत गया। बरस जब बीतता है तो ना सिर्फ़ पुरानी संवेदनाओं को रौंद कर जाता है बल्कि नई संभावनाओं के द्वार खोलता भी है। अमूमन नये बरस की पूर्व संध्या पर लोग उत्सव मनाते आगे पढ़ें
विरोधियों से थको मत, विरोधियों को थका दो: विपक्ष के नेता खरगोशलाल का नया सूत्र
जंगल की राजनीति में राजा सिंह का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा था। जंगल के हर हिस्से के चुनाव में राजा सिंह किसी न किसी तकनीक से जीत जाते थे और जंगल के राजा बनने के चुनावों में भी राजा आगे पढ़ें
संसद में हंगामा करने लीडर बन गए रीडर
पार्टी की ओर से आदेश जारी हुआ कि अगली मीटिंग में हर नेता एक-एक किताब पढ़कर आए। हाल ही में संसद में किताबें पढ़ने, न पढ़ने को लेकर जो घमासान मचा, उसके बाद एक पार्टी को अचानक यह आगे पढ़ें
हमारी गारंटी, वर-कन्या समय पर स्टेज पर पधारेंगे . . .
विवाह समारोह में उपस्थित होने से जुड़े कुछ नए आकर्षणों की घोषणाएँ: जिस प्रकार अभागे व्यक्ति को शादी के सीज़न में भी एक भी निमंत्रण पत्र नहीं मिलता, वहीं कुछ लोगों पर ईश्वर ऐसी कृपा बरसाते हैं कि एक आगे पढ़ें
फ़ंड का रहस्यमयी कुंड: सरकार भेजती है, धरती निगल जाती है!
माननीय मुख्यमंत्री जी, यह तो सत्य है कि आप पूरे राज्य का कायाकल्प करना चाहते हैं। लेकिन समस्या यह है कि जैसे ही आपका भेजा हुआ फ़ंड ज़िले में प्रवेश करता है, वह रहस्यमयी कुंड में समा जाता है! आगे पढ़ें
फ़्रेंडुआ बैरी हो गए हमार
फ़्रेंडो! फ़्रेंड ने फ़्रेंडों की भर्ती करने के बाद निचले स्तर पर फ़्रेंडों की भर्ती करने की सोची और सोच को अमली जामा पहनाते फ़्रेंड बनाने आरंभ किए तो गोबर चहक उठा। ऊपर वाले फ़्रेंडों का तो वह फ़्रेंड आगे पढ़ें
आलेख
किताबें मेरा सुख और मेरी विपदा
मूल मराठी लेख का हिंदी अनुवाद: विजय नगरकर (भारतीय ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त मराठी साहित्यिक स्व. वि.स. खांडेकर द्वारा लिखित मराठी लेख का हिंदी अनुवाद जो मराठी पत्रिका ‘साहित्य’, जनवरी १९४७ में प्रकाशित हुआ था) आजकल मैं एक आगे पढ़ें
गणतंत्र की गरिमा और वैश्विक झंझावात
भारत के इतिहास में 26 जनवरी केवल एक संवैधानिक तिथि नहीं है, बल्कि वह क्षण है जब एक राष्ट्र ने स्वयं को स्वतंत्र होने के साथ-साथ उत्तरदायी भी घोषित किया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि आज़ादी केवल आगे पढ़ें
गाँधी का दर्शन और डॉ. विजय बहादुर सिंह की साहित्यालोचना
गाँधी दर्शन भारतीय आधुनिकता की उस नैतिक धारा का प्रतिनिधित्व करता है, जो राजनीति, समाज और संस्कृति को मनुष्य की गरिमा, सत्य और अहिंसा के आधार पर पुनर्परिभाषित करती है। यह दर्शन केवल ऐतिहासिक या राजनीतिक परिघटना नहीं है, आगे पढ़ें
घनन घनन घंटा बाजे . . .
स्वतंत्रता के बाद से हमारे देश के हाल बेहाल है। इसके बावजूद कई स्वार्थी नुमाइंदे देश को हलाल और अलाल कर उसकी अर्थी निकालने में तुले हुए है। देश की यह दशा देखकर हमारे शहीद भी व्यथित मन से आगे पढ़ें
नर्मदा की अनन्त धारा: एक विद्धत चेतना का आह्वान
(नर्मदा जयंती पर विशेष आलेख) नर्मदा केवल एक नदी का नाम नहीं है, वह भारतीय सार्वभौमिक चेतना की वह अविरल धारा है जो समय से परे, संस्कारों से युक्त, इतिहास से गहन और प्रकृति से अभिन्न है। नर्मदा के जल आगे पढ़ें
परीक्षा, तनाव और विद्यार्थी: दबाव के बीच संतुलन की राह
आज का विद्यार्थी केवल किताबों से नहीं जूझ रहा, वह अपेक्षाओं, प्रतिस्पर्धा और परिस्थितियों के बहुआयामी दबाव में जी रहा है। परीक्षा नज़दीक है। एक ओर माता-पिता की उम्मीदों का अदृश्य बोझ है, दूसरी ओर गला काट प्रतिस्पर्धा का आगे पढ़ें
प्रकाशमयी अंधकार
क्या हर वह इंसान जो मुस्कुरा रहा है, भीतर से भी प्रसन्न है? क्या हर चमकती आँख में उम्मीद की चमक होती है? और क्या हर भेदयुक्त चेहरा वास्तव में दर्द में होता है? समाज ने आज एक ऐसी आगे पढ़ें
प्रेम कुमार की कविताओं में अभिव्यक्त मानव मूल्य
शोधार्थी, पीएच. डी. अनुवाद अध्ययन अनुवाद अध्ययन विभाग, अनुवाद विद्यापीठ महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ईमेल: poonamkumar।shona@gmail.com सारांश: प्रेम कुमार की कविताएँ समकालीन हिंदी कविता में मानवीय सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। उनकी काव्य दृष्टि आधुनिक सभ्यता के आगे पढ़ें
प्रेम, आत्म-विलय से वैश्विक चेतना तक का महाप्रस्थान
(वेलेंटाइन डे पर विशेष) प्रेम संसार का वह सर्वाधिक प्रयुक्त और सम्भवतः सर्वाधिक अनभिज्ञ शब्द है, जिसकी व्याख्या करने का साहस आदि कवि वाल्मीकि से लेकर आधुनिक दार्शनिकों तक ने किया है। किन्तु प्रेम किसी परिभाषा की परिधि में बँधने आगे पढ़ें
प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी के परलोक गमन से देश ने खोया एक महान सारस्वत पुत्र
दो दिन पूर्व लंबे समय से बीमार चल रहे प्रसिद्ध हिन्दी-कन्नड़ अनुवादक,लेखक, आलोचक प्रोफ़ेसर तिप्पेस्वामी जी का निधन हो गया। इससे बीस दिन पूर्व हृदय गति रुकने से प्रसिद्ध हिन्दी आलोचक श्री विजय तिवारी जी का भुवनेश्वर में निधन हो आगे पढ़ें
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की कहानियाँ: इश्क़ के आगे जहां कुछ और भी है
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ने पहली कहानी ‘बट बाबा’ लिखी, जो सन् 1944 में ‘विश्वमित्र’ में प्रकाशित हुई। यहीं से उनके साहित्यिक जीवन की सही अर्थों में शुरूआत मानी जा सकती है। यद्यपि कविताएँ वे विद्यार्थी जीवन से ही लिख रहे थे, आगे पढ़ें
बसंत पंचमी: जब ऋतु नहीं, चेतना बदलती है
भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना है। यहाँ पर्व उत्सव नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाले संकेत होते हैं। बसंत पंचमी ऐसा ही एक पर्व है—जो ऋतु परिवर्तन की सूचना से आगे बढ़कर विचार, आगे पढ़ें
भारत में गणतंत्र की ढाई हज़ार वर्ष पुरानी परंपरा
आधुनिक भारत ने 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र व्यवस्था को स्वीकार कर अपने नीति नियम का लिखित क़ानून संविधान के रूप में लागू किया, लेकिन भारत को दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक माना जाता है, और आगे पढ़ें
वर्तमान में हिंदी साहित्य में गीत और नवगीत की स्थित
हिंदी साहित्य की परंपरा मूलतः काव्यात्मक रही है। वैदिक ऋचाओं से लेकर भक्ति काल के पदों, रीतिकालीन कवित्तों और आधुनिक युग के गीतों तक, हिंदी कविता ने सदैव गेयता, लय और भाव की सजीव परंपरा को जीवित रखा है। आगे पढ़ें
वसंत पंचमी: सरस्वती तत्त्व के जागरण का पर्व
वसंत पंचमी भारतीय संस्कृति का वह महापर्व है जो केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि मानव अंतःकरण में सरस्वती तत्त्व के जागरण का गहन आध्यात्मिक संदेश देता है। माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर मनाया आगे पढ़ें
वीर बाल दिवस
वीर बाल दिवस वीर बाल दिवस हर वर्ष दिसंबर महीने की 26 तारीख़ को मनाया जाता है। इस दिन मुग़लों के ख़िलाफ़ लड़ते हुए शहीद हुए गुरु गोविंद सिंह जी के बेटों की वीरता और साहस को याद किया आगे पढ़ें
शब्दों से परे एक दिन
भारतीय संस्कृति में पर्व केवल पंचांग की तिथियाँ नहीं होते, वे मनुष्य के भीतर उतरने के अवसर होते हैं। वे ऐसे पड़ाव हैं जहाँ समय कुछ क्षणों के लिए ठहरता है और जीवन अपनी गति को स्वयं देखता है। आगे पढ़ें
शिक्षा या विद्या पुनर्विचार की आवश्यकता: पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के विशेष संदर्भ में
डॉ. हर्षा त्रिवेदी अध्येता, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला भारतीय ज्ञान परंपरा के सुदीर्घ इतिहास में ‘शिक्षा’ और ‘विद्या’ दो ऐसे शब्द रहे हैं, जिन्हें अक्सर पर्यायवाची मान लिया जाता है, किन्तु इनके सूक्ष्म अर्थों में जीवन आगे पढ़ें
शिव और शक्ति का महामिलन: महाशिवरात्रि का विराट दर्शन
(महाशिवरात्रि पर विशेष आलेख) महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का वह महासंवाद है जहाँ जड़ और चेतन, पुरुष और प्रकृति, तथा शून्य और अनन्त का मिलन होता है। यह उस परम तत्त्व के जागरण की रात्रि आगे पढ़ें
सामाजिक समरसता और रंगों का पर्व होली
हमारी सनातन संस्कृति उत्सवधर्मी है। हमारी संस्कृति में पर्व और त्योहारों की एक लम्बी शृंखला है। हर महीने कोई ना कोई त्योहार, पर्व या उत्सव मनाया जाता है। होली फाल्गुन मास में मनाया जाने बाला हमारी संस्कृति का एक आगे पढ़ें
सामाजिक समरसता–हिंदू समाज की आत्मा
भेद मिटे मन से सभी, जुड़े हृदय के तार। समरसता से ही बने, भारत सदा महान॥ “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।” अर्थ—हम साथ चलें . . . साथ बोलें . . . और हमारे मन एक हों। आदरणीय आगे पढ़ें
सोशल मीडिया के साहित्यिक पटल: एक समालोचना
डिजिटल युग ने साहित्य को जिस तीव्रता से आम जन तक पहुँचाया है, वैसा अवसर इतिहास में पहले कभी नहीं मिला। कभी जो कविता पत्रिकाओं के संपादकीय द्वार पर वर्षों प्रतीक्षा करती थी, आज वह एक क्लिक में हज़ारों आगे पढ़ें
हिंदी साहित्यकार और ए.आई. का प्रयोग
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी क्षेत्र की अवधारणा नहीं रह गई है, बल्कि उसने मनुष्य की सृजनात्मक गतिविधियों—विशेषतः साहित्य, कला और संस्कृति—में भी प्रवेश कर लिया है। आज जब यह कहा जा रहा है आगे पढ़ें
समीक्षा
ग़ज़ल की परंपरा और ‘बग़ैर मक़्ता’ का स्थान
किताब का नाम: बग़ैर मक़्ता (ग़ज़ल संग्रह) ग़ज़लकार: अमित धर्मसिंह पृष्ठ: 184 मूल्य: ₹300/- प्रकाशक: अतुल्य पब्लिकेशंस दिल्ली–110093 ग़ज़ल: उत्पत्ति, स्वरूप और परंपरा: डॉ. अमित धर्मसिंह का यह पहला ‘ग़ज़ल संग्रह’ है। अब तक उनकी कई साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित आगे पढ़ें
मधुरता और मिठास के साथ मुद्दों पर लिखा गया गीत
समीक्षित पुस्तक: जहाँ नहीं उजियार गीतकार: योगेंद्र प्रताप मौर्य प्रकाशक: कलाकार पब्लिशर्स नई दिल्ली वर्ष: 2025 मूल्य: ₹350 पृष्ठ: 127 जहाँ नहीं उजियार योगेंद्र प्रताप मौर्य लिखित नवगीत का नया संग्रह है। इससे पहले नवगीत की एक तथा बाल कविताओं आगे पढ़ें
ज़िन्दगी जिन्दाबाद: पीड़ा के विरुद्ध ज़िन्दगी की घोषणा
पुस्तक: ज़िन्दगी जिन्दाबाद (आत्मकथा) लेखक: डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नोएडा मूल्य: ₹299.00 ‘ज़िन्दगी जिन्दाबाद’ डॉ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी की आत्मकथा है। आत्मकथा का यह दूसरा भाग उनके जीवन की एक ऐसी दुर्घटना पर केंद्रित है, जिसे आगे पढ़ें
संस्मरण
ऊँचाइयों, रेत और रोशनी का रोमांच है दुबई की यात्रा
गतिशीलता जीवन का पहला नियम है। जब जीवन गतिमान होता है, तभी संसार हमें जीवंत, आकर्षक और संभावनाओं से भरा प्रतीत होता है। प्रकृति, मौसम, नदियाँ, पर्वत, इमारतें और तकनीकी संसार, सब मानो हमें आमंत्रित करते हैं। ऐसे में आगे पढ़ें
पागल नहीं, बीमार हूँ
13 जनवरी 2026 कल ऑफ़िस से लौटते समय एक महिला से हुई बातचीत ने मुझे फिर से इस विषय पर सोचने को मजबूर कर दिया। उस महिला की आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक स्थिति समाज के हिसाब से बहुत अच्छी आगे पढ़ें
पार्वती के कर्णफूल की मणि: मणिकर्ण
वे बसंत, फागुन के बीतने, चैत्र के आगमन के दिन थे, जब हम देवभूमि हिमाचल प्रदेश के शिमला के लिए राँची से निकले थे। राँची एयरपोर्ट से दिल्ली की ओर रवानगी मन में ख़ुशी की फागुनी बयार की रवानी आगे पढ़ें
बेटी का जन्म
जनवरी के महीने में उस दिन (18 जनवरी) बहुत ठंडी हवा चल रही थी। सुबह क़रीब चार बजे मैं अपनी पत्नी को स्कूटर पर बिठाकर पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के पास क़स्बा बहादुरगढ़ में स्थित गुरु तेग बहादुर की स्मृति आगे पढ़ें
वे गुनगुने पल
समय की अठखेली जितना बूझो, कुछ अनबूझ रह ही जाता है, ख़ासकर तब जब अनायास वर्तमान अतीत की गठरी ढीली कर उनमें से कुछ पल ढुलका देता है। वर्तमान में अतीत को जीने की अनुभूति, उन पलों में उतर आगे पढ़ें
सुरमयी संध्या: स्मृतियों के झरोखे से शक्कर के दाने और गम्मत का उल्लास
जीवन की आपाधापी के मध्य जब आत्मीयता के स्वर गूँजते हैं तो समय जैसे ठहर-सा जाता है। मोहपानी की वादियों में स्थित कपिल साहू के छोटा जबलपुर की नैसर्गिक छटा के बीच बीती शाम कुछ ऐसी ही थी। अवसर आगे पढ़ें
अन्य
अंबेडकरवादी ग़ज़लों के स्वरूप निर्धारण की आख़िरी ग़ज़लशाला ‘बग़ैर मक़्ता’ पर संपन्न
नव दलित लेखक संघ, दिल्ली ने 28 दिसंबर 2025 को डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी आयोजित की। यह नदलेस की बारहवीं और अंतिम ग़ज़लशाला थी। इसकी अध्यक्षता आर.पी. सोनकर ने की एवं आगे पढ़ें
कविताएँ
शायरी
समाचार
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विश्व हिंदी दिवस कार्यक्रम
“मातृभाषा हमारे जीवन का आधार है, हिंदी के विकास में योगदान देनेवाले ग़ैर हिंदी भाषिक विद्वानों ने अपनी मातृभाषा का…
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ब्रिटेन की डॉ. वंदना मुकेश को मध्य प्रदेश शासन, संस्कृति विभाग..
मध्य प्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा प्रतिवर्ष राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी को समृद्ध करने वाले विद्वानों को…
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यॉर्क, यूके में भारतीय प्रवासी समुदाय का ऐतिहासिक काव्य समारोह
दिनांक: 26 अप्रैल 2025 स्थान: यॉर्क, यूनाइटेड किंगडम 26 अप्रैल 2025 को यॉर्क इंडियन कल्चरल एसोसिएशन के तत्वावधान में…
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डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ का हुआ..
दिल्ली। 20 दिसंबर, 2025 को आयोजित हुई नव दलित लेखक संघ की मासिक गोष्ठी में डॉ. अमित धर्मसिंह के…
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गाहलियाँ विद्यालय के छात्राओं ने आर्ट्स पेंटिंग से चमकाया..
कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश, राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां के एक भारत और श्रेष्ठ भारत और इको क्लब के छात्रों…
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रामकिशोर उपाध्याय कृत ‘लालटेन’ पर परिचर्चा संपन्न-युवा..
युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच (पंजीकृत न्यास) आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य शाखा की वर्चुअल 22वीं संगोष्ठी 14 दिसम्बर-2025 (रविवार) 3:30…
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मुकेश कुमार ऋषि वर्मा की कृति ‘उगता सूर्य’ का हुआ विमोचन
शाहगंज (आगरा)। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ ने श्री चित्रगुप्त भगवान संस्था सभागार में अपना 56वाॅं प्रांतीय अधिवेशन व शैक्षिक…
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डॉ. देवेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘अनुभव के आखर’ लोकार्पित
हैदराबाद, 15 दिसंबर, 2025— अपने दौर के अंतरराष्ट्रीय स्तर के वनस्पति शास्त्र वैज्ञानिक व कवि स्व. डॉ. देवेंद्र शर्मा…
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‘क से कविता’ का बाल-कविता समारोह संपन्न
बाल-दिवस-विशेष: हैदराबाद, 13 नवंबर, 2025। हिंदी-उर्दू कविता को नई पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने के लिए समर्पित संस्था “क से कविता”…
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