संपादकीय - साहित्य में इतिहास के साथ कितनी छेड़-छाड़ अपेक्षित है?
साहित्य कुञ्ज के इस अंक में
कहानियाँ
आँसू ताक़त हैं कमज़ोरी नहीं
पिता के निधन के बाद आरव महीनों तक हर मिलने वाले के सामने रोता रहा। घर वाले समझाते, मित्र ढाढ़स बँधाते, पर वह अपने दुःख पर क़ाबू नहीं पा रहा था वह दुख को छिपाने की जगह, प्रदर्शित कर आगे पढ़ें
आख़िरी नामांकन
गाँव नक़्शे में छोटा था, पर वहाँ रहने वालों की ज़िंदगियाँ किसी भी बड़े शहर से कम उलझी हुई नहीं थीं। धूल भरी पगडंडियाँ थीं, जिन पर चलते-चलते चप्पल घिस जाती थी और सपने भी। टेढ़े खंभों पर टिके आगे पढ़ें
आख़िरी सिक्का
भोर पूरी तरह उजली नहीं हुई थी। आसमान में धूप का रंग अभी तय ही हो रहा था। लेकिन गाँव जाग चुका था। आज हाट का दिन था। हाट—जहाँ चीज़ें बिकती कम हैं, लोगों की हैसियत ज़्यादा तौली आगे पढ़ें
इन गुड फ़ेथ
सन् उन्नीस सौ उनसठ के उस दिन किशोर अपने पैतृक गाँव से लौटा था। जहाँ वह दसवीं की अपनी परीक्षा के बाद हुई लंबी छुट्टियों में कुछ दिन के लिए गया रहा था। “वहाँ मुझे वह मिली थीं,” घर आगे पढ़ें
ख़ानुम–अमर
“इतिहास के पन्नों में षड्यंत्रपूर्वक छिपाई गई एक ऐसी प्रेमगाथा जो इतिहास की स्थापित धारणाओं को चुनौती देते हुए सचाई को पुनः परखने हेतु उद्वेलित कर रही है।” दूर क्षितिज पर सूर्योदय की केसरिया किरणें अपनी आभा बिखेरने लगी आगे पढ़ें
चुप्पी का विद्रोह
गाँव का नाम था बिसनपुर। अब वह पहले जैसा भोला गाँव नहीं रहा था। सड़कें आ गई थीं, बिजली आ गई थी, मोबाइल हर हाथ में था। मगर आदमी अब भी अधूरा था। ज़रूरतें बढ़ी थीं और इंसान छोटा आगे पढ़ें
टायर की ख़रीद
धूप कड़क थी। आसमान में दूर-दूर तक बादल नहीं थे। पैदल का रास्ता। दूसरे राज्य के बार्डर पर ही उतार देते ऑटो वाले। वहाँ से बाज़ार का रास्ता दूर था। पेड़ भी आसपास नहीं थे। दुकान की पहचान करते आगे पढ़ें
नालंदा की सुनो कहानी
पात्र: तीन बच्चे आयु-१३-१४ वर्ष (मंच का पर्दा धीरे-धीरे खुल रहा है तभी मंच के पीछे से मद्धम लेकिन ओजपूर्ण स्वर में आवाज़ आ रही है) नालंदा की सुनो कहानी, नालंदा की वाणी में। अद्भुत गूढ़ रहस्य आगे पढ़ें
पीड़ा बनी कर्तव्य
शहर में बाढ़ आई थी। सब अपना सामान बचा रहे थे, पर एक स्त्री नाव में बैठी दूसरों के बच्चों को पार पहुँचा रही थी। किसी ने पूछा, “तुम्हारा घर डूब रहा है, और तुम रो भी नहीं रही?” आगे पढ़ें
मैं हूँ ना
गाडरवारा शहर की उस संध्या में आकाश पर धूप का अंतिम स्पर्श ठहरा हुआ था। सूर्य मानो दिन के कंधों पर हाथ रखकर विदा ले रहा था। शहर अपनी सामान्य चहल-पहल में डूबा था, पर एक घर था जहाँ आगे पढ़ें
रक्त-बीज की सीढ़ियाँ
धूप अभी पूरी तरह फूटी नहीं थी। वह खेतों में पकी फ़सलों पर पड़कर सुनहरी आभा बिखेर रही थी, जैसे आसमान ने आग को रेशम जैसा कोमल बनाकर अभी-अभी धरती पर हौले से छिड़का हो। माधव ने अपने कंधे आगे पढ़ें
रेत का आदमी
विवेक हर असफलता पर टूट जाता था। नौकरी न मिली रोया। प्रेम विफल हुआ रोया। व्यापार डूबा रोया। धीरे-धीरे लोग उससे दूर होने लगे। एक मित्र ने कहा, “दुखों पर क़ाबू सिर्फ़ साहस से पाया जाता है जो तुम्हारे आगे पढ़ें
वहम का भँवर
“बड़ी बहन, एक काम करना पड़ेगा,” मीता की धीमी आवाज़ में आग्रह भरी विनती थी। बहुत सोच-विचार और मन-मंथन के बाद उसने अपनी जेठानी सुधा को फोन करने का फ़ैसला किया था। उसे भरोसा था कि सामने से सुधा आगे पढ़ें
वेलकम टू लाइफ़
सुबह के ठीक दस बजे थे। महल्ले की गली में सब्ज़ीवाले की चिर-परिचित आवाज़ गूँज रही थी। “टमाटर ले लो, बैंगन ले लो, आलू ले लो!” आवाज़ रोज़ आती थी, पर आज सुनीता को ऐसा लग रहा था, जैसे आगे पढ़ें
संस्कारी बहू
उद्धव के यहाँ दो-तीन दिनों से बिल्कुल वैसी ही चहल-पहल थी जो उसके विवाह के अवसर पर छह माह पूर्व उनके पुराने वाले घर में हुई थी। आज इस नये घर के गृह-प्रवेश के उपलक्ष्य में उसके माता-पिता मिस्टर आगे पढ़ें
सत्य जो किंवदंती बन गया (भाग 2)
शिला रूपी अहिल्या (परिचय: इस भाग 2 की कथा के माध्यम से मैं यह प्रश्न उठाने का दुस्साहस कर रही हूँ कि क्या वास्तव में अहिल्या एक शिला में परिवर्तित हो गई थी, और फिर भगवान राम की चरण-रज आगे पढ़ें
स्मृति के रंग
होली की सुबह थी। आँगन में धूप ऐसे उतर आई थी मानो आकाश ने स्वयं गुलाल ओढ़ लिया हो। गली के बच्चे रंग और पिचकारियों के साथ दौड़ रहे थे, पर शर्मा जी के घर का दरवाज़ा अब भी आगे पढ़ें
हम ज़िंदा हैं
“यह सामान बाहर रखने का है, तुमने फिर इसे यहीं रख दिया सुजेटा,” डेसरीन ने सुजाता पर झुँझलाते हुए कहा। “मुझे पता है डेसरीन, अभी बाहर रख दूँगी” “जब पता है तो रखा क्यों नहीं?” डेसरीन को लगता है आगे पढ़ें
हास्य/व्यंग्य
आरक्षित मादाओं के नाम पर, प्रतिनिधित्व नर का: राजा सिंह के निजी सलाहकार रीछभाई की रणनीति
जंगल में मादाओं को आरक्षण देने के मुद्दे पर राजा सिंह और विपक्ष के नेता ख़रगोश भाई के बीच बहस हुई। दोनों ने इतनी दलीलें दीं कि मादा आरक्षण की असली बात ही किनारे हो गई . . . आगे पढ़ें
आलोचक की आलोचना
रामस्नेही एक कवि थे। उदारता से भरी रचनायें लिखते थे। उनकी ख्याति देश के कोने-कोने तक हुई। उनकी एक कविता एक आलोचक के हाथ लग गयी। गुणी आलोचक थे। बड़े-बड़े लेखकों की आलोचना करके बड़ी उपलब्धि हासिल की थी। आगे पढ़ें
नेताजी वोट के लिए सब खा लेंगे
चुनाव आते ही नेताजी जहाँ जाते हैं, भोज्य पदार्थ भी वहाँ के रीति-रिवाज़ के अनुसार परोसे जाते हैं। नेताजी भी उसी माहौल में ढल जाते हैं। नेताजी को जनता के इरादों पर ही चलना पड़ता है तब जनता समझती आगे पढ़ें
सब लहसुन प्याज़ का खेला
बंधुओ! सच कहूँ तो मैं खाने के मामले में सनातनी होने के बाद भी बिल्कुल भी फस्सी नहीं हूँ। मतलब मैं सर्वाहारी हूँ। इसलिए घर से कैंटीन, ढाबे, होटल दफ़्तर में जो कुछ भी मिल जाता है, मज़े से आगे पढ़ें
सुविधाओं के युग में असुविधाओं का दैनिक पंचांग
[दिनचर्या: एक संगठित अव्यवस्था का जीवंत दस्तावेज] [हम जी नहीं रहे, बस सिस्टम हैंग होने से बचा रहे हैं] सुबह अब सूरज की कोमल आहट से नहीं, मोबाइल की तीखी ध्वनि से होती है, जो नींद से अधिक भीतर आगे पढ़ें
आलेख
अंबेडकर के विचारों का समकालीन संदर्भ
अंबेडकर जयंती का अवसर हर वर्ष हमें एक ऐसे चिंतक और विधिवेत्ता की स्मृति में ले आता है, जिसने भारतीय समाज की संरचना को गहराई से समझते हुए उसके पुनर्गठन का वैचारिक आधार प्रस्तुत किया। यह अवसर केवल स्मरण आगे पढ़ें
आईना दिखाकर बेचैन करने वाला शायर अदम गोंडवी
"काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में . . ." उत्तर प्रदेश के इटावा में एक मुशायरा अपने शबाब पर है। मंच के बाहर अगली कुर्सी पर तमाम डेमोक्रेट बैठे हुए हैं। सबके साथ उस समय के मुख्यमंत्री आगे पढ़ें
एक आत्म स्वीकरण
डोनाल्ड ट्रंप मेरे लिए केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं रहे; वे धीरे-धीरे मेरे समय की बेचैनी का प्रतीक बनते गए। जब-जब उनकी कोई टिप्पणी, कोई निर्णय या कोई उच्छृंखल वक्तव्य सामने आता, मुझे लगता मानो दुनिया की सतह के आगे पढ़ें
क्या मालूम!
कभी-कभार हमें जो दिखाई दे रहा है, असल में वह कुछ और ही होता है। कुछ उदाहरण: हर वक़्त हँसने-हँसाने वाला इन्सान हँसमुख न होकर, क्या मालूम अपने भीतर समेटे ढेरों दुखों को दुनिया से छिपाने की कोशिश कर आगे पढ़ें
जापान का यूरोपीय व्यापारियों से सम्बन्ध और ईसाई मिशनरियों का देश निकाला
संदर्भ जापान इतिहास में देवताओं के देश के नाम से प्रसिद्ध है। उसे ‘लैंड ऑफ़ राइज़िंग सन’ भी माना जाता है। (Land of rising Sun) इस जापान में यूरोपीय कब और कैसे पहुँचे? जब वह जापान पहुँचे तो जापान आगे पढ़ें
प्रेम, आत्म-विलय से वैश्विक चेतना तक का महाप्रस्थान
(वेलेंटाइन डे पर विशेष आलेख) प्रेम संसार का वह सर्वाधिक प्रयुक्त और सम्भवतः सर्वाधिक अनभिज्ञ शब्द है, जिसकी व्याख्या करने का साहस आदि कवि वाल्मीकि से लेकर आधुनिक दार्शनिकों तक ने किया है। किन्तु प्रेम किसी परिभाषा की परिधि आगे पढ़ें
भगवान परशुराम: धर्म संतुलन की ज्वाला और युग चेतना का शाश्वत स्वर
(अक्षय तृतीया पर विशेष आलेख-सुशील शर्मा) भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में भगवान परशुराम का व्यक्तित्व जितना तेजस्वी है, उतना ही जटिल भी। वे एक साथ ऋषि हैं और योद्धा भी, तपस्वी हैं और क्रांतिकारी भी, करुणा के स्रोत हैं तो आगे पढ़ें
रेत समाधि और गीतांजलि श्री
गीतांजलि श्री का जन्म 12 जून 1957 ई. को हुआ था। गीतांजलि जी अपनी शैली के कारण विशेष प्रसिद्ध रही हैं। गीतांजलि श्री का कहना है कि मेरे विचार में, सृजन में सबसे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक है कलाकार की आगे पढ़ें
विजेंद्र के काव्य में लोक और श्रम
हिंदी कविता के विकासक्रम में कुछ कवि ऐसे होते हैं जिनकी रचनात्मकता केवल साहित्यिक प्रयोगों या शैलीगत विशिष्टताओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह अपने समय और समाज की गहरी ऐतिहासिक-सामाजिक प्रक्रियाओं से संवाद करती है। ऐसे आगे पढ़ें
समकालीन यथार्थवाद को उजागर करता प्रो. मीनकेतन प्रधान का काव्य-संग्रह ‘दुनिया ऐसी’
‘दुनिया ऐसी’ प्रोफ़ेसर मीनकेतन प्रधान का अद्यतन काव्य-संग्रह है, जिसमें उनकी तेरह कविताएँ संकलित हैं। उनमें से अधिकांश कविताएँ महानदी, कोरोना-काल और देश में घटने वाली सांप्रतिक घटनाओं के कथानकों पर आधारित हैं। इस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व आगे पढ़ें
सम्मान, शब्दों की चकाचौंध या आचरण की सच्चाई
मानव सभ्यता के विकास के साथ जिन मूल्यों ने हमारे सामाजिक जीवन को दिशा दी है, उनमें ‘सम्मान’ का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। सम्मान केवल एक औपचारिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि यह मनुष्य के भीतर की विनम्रता, संवेदनशीलता और आगे पढ़ें
सामाजिक जीवन के मूल्यांकन का विरोधाभास
जीवन और मृत्यु के बीच मनुष्य का जो सामाजिक मूल्यांकन होता है, वह प्रायः एक गहरे विरोधाभास से भरा होता है। जीवित अवस्था में समाज का विमर्श और श्मशान में होने वाला विमर्श दोनों एक ही व्यक्ति के बारे आगे पढ़ें
समीक्षा
हाइकु, ताँका और सेदोका के आलोक में ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’
समीक्षित पुस्तक: पुस्तक: गंगा में तैरते मिट्टी के दीये काव्य संग्रह हाइकु, ताँका, सेदोका संकलन लेखक: डॉ. रमा द्विवेदी प्रकाशक: शब्दांकुर प्रकाशन पृष्ठ संख्या: १३८ मूल्य ₹300 उपलब्धता: गंगा में तैरते मिट्टी के दीये (amazon.in) ‘गंगा में तैरते मिट्टी आगे पढ़ें
कविताएँ
शायरी
समाचार
साहित्य जगत - विदेश
विश्व हिंदी दिवस कार्यक्रम
“मातृभाषा हमारे जीवन का आधार है, हिंदी के विकास में योगदान देनेवाले ग़ैर हिंदी भाषिक विद्वानों ने अपनी मातृभाषा का…
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ब्रिटेन की डॉ. वंदना मुकेश को मध्य प्रदेश शासन, संस्कृति विभाग..
मध्य प्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा प्रतिवर्ष राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी को समृद्ध करने वाले विद्वानों को…
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यॉर्क, यूके में भारतीय प्रवासी समुदाय का ऐतिहासिक काव्य समारोह
दिनांक: 26 अप्रैल 2025 स्थान: यॉर्क, यूनाइटेड किंगडम 26 अप्रैल 2025 को यॉर्क इंडियन कल्चरल एसोसिएशन के तत्वावधान में…
आगे पढ़ेंसाहित्य जगत - भारत
डॉ. रमा द्विवेदी कृत ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ काव्य..
युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच (पंजीकृत न्यास) आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य शाखा एवं केंद्रीय हिंदी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान…
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डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ का हुआ..
दिल्ली। 20 दिसंबर, 2025 को आयोजित हुई नव दलित लेखक संघ की मासिक गोष्ठी में डॉ. अमित धर्मसिंह के…
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गाहलियाँ विद्यालय के छात्राओं ने आर्ट्स पेंटिंग से चमकाया..
कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश, राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां के एक भारत और श्रेष्ठ भारत और इको क्लब के छात्रों…
आगे पढ़ेंसाहित्य जगत - भारत
मुकेश कुमार ऋषि वर्मा की कृति ‘उगता सूर्य’ का हुआ विमोचन
शाहगंज (आगरा)। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ ने श्री चित्रगुप्त भगवान संस्था सभागार में अपना 56वाॅं प्रांतीय अधिवेशन व शैक्षिक…
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डॉ. देवेंद्र शर्मा का काव्य संग्रह ‘अनुभव के आखर’ लोकार्पित
हैदराबाद, 15 दिसंबर, 2025— अपने दौर के अंतरराष्ट्रीय स्तर के वनस्पति शास्त्र वैज्ञानिक व कवि स्व. डॉ. देवेंद्र शर्मा…
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‘क से कविता’ का बाल-कविता समारोह संपन्न
बाल-दिवस-विशेष: हैदराबाद, 13 नवंबर, 2025। हिंदी-उर्दू कविता को नई पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने के लिए समर्पित संस्था “क से कविता”…
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