अटल के सपनों का भारत

01-01-2026

अटल के सपनों का भारत

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

भारत के आधुनिक इतिहास में यदि किसी राजनेता को कवि–हृदय, दार्शनिक दृष्टि और राष्ट्र–निर्माण की दूरदृष्टि का अद्भुत संगम कहा जाए, तो वह नाम अटल बिहारी वाजपेयी का है। वे केवल सत्ता के शिखर पर आसीन एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि भारत की आत्मा को शब्द देने वाले विचारक थे। उनका भारत केवल भौगोलिक इकाई नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्य और मानवीय संवेदनाओं से निर्मित एक जीवंत राष्ट्र था। 

“अटल के सपनों का भारत” वस्तुतः एक ऐसे विकसित भारत की परिकल्पना है, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ नैतिकता, तकनीक के साथ करुणा और शक्ति के साथ शालीनता का संतुलन हो। 

राष्ट्रवाद का मानवीय स्वर

अटल बिहारी वाजपेयी का राष्ट्रवाद आक्रामक नहीं, आत्मविश्वासी था। वे भारत को विश्व में एक सशक्त राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे, परन्तु उस शक्ति का आधार विनाश नहीं, शान्ति हो। पोखरण के परमाणु परीक्षणों के बाद भी उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति शान्ति के लिए है, प्रभुत्व के लिए नहीं। 

उनके सपनों का भारत ऐसा राष्ट्र था जो अपनी सीमाओं की रक्षा करना जानता हो, किन्तु संवाद और कूटनीति को कभी त्यागे नहीं। लाहौर बस यात्रा इसी सोच का प्रतीक थी, जहाँ उन्होंने शत्रुता की दीवारों के बीच मानवता की खिड़की खोली। 

लोकतंत्र की आत्मा और मर्यादा

अटल जी लोकतंत्र को केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र मानते थे। उनके लिए संसद वाद–विवाद का मंच थी, विरोध राष्ट्रद्रोह नहीं। वे विपक्ष का सम्मान करते थे और असहमति को लोकतंत्र की शक्ति मानते थे। 

उनके सपनों का भारत ऐसा लोकतंत्र था, जहाँ सत्ता विनम्र हो, प्रशासन उत्तरदायी हो और जनप्रतिनिधि लोकसेवक की भूमिका में हों। उन्होंने बार बार कहा कि सरकारें आती जाती रहती हैं, परन्तु राष्ट्र स्थायी होता है। यही दृष्टि उन्हें भीड़ से अलग करती है। 

आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय

अटल बिहारी वाजपेयी की विकास दृष्टि केवल आँकड़ों तक सीमित नहीं थी। वे आर्थिक सुधारों के पक्षधर थे, परन्तु मानवीय चेहरे के साथ। उनके कार्यकाल में उदारीकरण की प्रक्रिया को गति मिली, निजीकरण और वैश्वीकरण को स्वीकार किया गया, परन्तु साथ ही सामाजिक संतुलन बनाए रखने का प्रयास भी हुआ। 

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, सर्व शिक्षा अभियान, स्वर्णिम चतुर्भुज जैसी योजनाएँ उनके विकसित भारत की ठोस आधारशिला थीं। उनका सपना था कि भारत का गाँव, शहर से जुड़ा हो, किसान बाज़ार से और युवा अवसरों से। 

अधो संरचना के माध्यम से राष्ट्र निर्माण

अटल जी का मानना था कि सड़कें केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि विकास की धमनियाँ होती हैं। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना ने भारत के आर्थिक मानचित्र को नई दिशा दी। 

उनके सपनों का भारत वह था, जहाँ उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम केवल दिशाएँ न हों, बल्कि विकास की एक साझा यात्रा के पड़ाव हों। रेल, सड़क, दूरसंचार और ऊर्जा के क्षेत्र में उन्होंने दीर्घकालिक सोच के साथ कार्य किया, जिसका लाभ आज का भारत उठा रहा है। 

विज्ञान, तकनीक और आत्मनिर्भरता

अटल बिहारी वाजपेयी विज्ञान को भारत की शक्ति मानते थे। उन्होंने कहा था कि इक्कीसवीं सदी ज्ञान की सदी होगी और भारत इसमें अग्रणी भूमिका निभाएगा। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की पहचान बनाने की नींव उनके समय में ही रखी गई। 

उनके सपनों का भारत तकनीक का उपभोक्ता नहीं, सृजनकर्ता था। वे आत्मनिर्भर भारत की बात बहुत पहले कर चुके थे, जहाँ विज्ञान मानवीय कल्याण का साधन बने, न कि केवल लाभ का उपकरण। 

सांस्कृतिक चेतना और भारतीयता

अटल जी के भारत की आत्मा उसकी संस्कृति में बसती थी। वे आधुनिकता के विरोधी नहीं थे, परन्तु जड़ों से कटे विकास के भी पक्षधर नहीं। उनके लिए भारतीयता कोई संकीर्ण पहचान नहीं, बल्कि सहिष्णुता, बहुलता और संवाद की परंपरा थी। 

उन्होंने हिंदी को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाने का प्रयास किया, संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण देकर भाषा गौरव को नई ऊँचाई दी। उनके सपनों का भारत अपनी भाषाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक विविधताओं के साथ आगे बढ़ने वाला भारत था। 

सामाजिक समरसता और संवेदनशील शासन

अटल बिहारी वाजपेयी का हृदय अत्यंत कोमल था। वे राजनीति में रहते हुए भी मानवीय संवेदनाओं को कभी नहीं भूले। प्राकृतिक आपदाओं, युद्धों या सामाजिक संकटों के समय उनके शब्द मरहम बन जाते थे। 

उनके सपनों का भारत ऐसा समाज था, जहाँ जाति, धर्म और वर्ग की दीवारें कमज़ोर हों और मानवता की पहचान मज़बूत। वे जानते थे कि बिना सामाजिक समरसता के कोई भी राष्ट्र विकसित नहीं हो सकता। 

विदेश नीति में संतुलन और सम्मान

अटल जी की विदेश नीति आत्मसम्मान और संतुलन पर आधारित थी। उन्होंने भारत को गुटनिरपेक्षता की विरासत से आगे ले जाकर वैश्विक साझेदारी की ओर उन्मुख किया। अमेरिका, रूस, यूरोप और एशिया सभी के साथ भारत के संबंधों को उन्होंने नई मज़बूती दी। 

उनके सपनों का भारत विश्व गुरु बनने का दावा नहीं करता, बल्कि विश्व के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला राष्ट्र है, जो अपने अनुभवों से विश्व को दिशा देता है। 

युवा शक्ति और भविष्य का भारत

अटल बिहारी वाजपेयी युवाओं को भारत का वर्तमान और भविष्य दोनों मानते थे। वे जानते थे कि युवा केवल रोज़गार नहीं, उद्देश्य भी चाहता है। शिक्षा, विज्ञान और नवाचार पर उनका ज़ोर इसी सोच का परिणाम था। 
उनके सपनों का भारत ऐसा भारत था, जहाँ युवा पलायन न करें, बल्कि अपने देश में ही संभावनाओं का आकाश देखें। 

कविता, करुणा और राजनीति

अटल जी की सबसे बड़ी विशेषता थी राजनीति में कविता की उपस्थिति। उनके शब्दों में कठोरता नहीं, गरिमा थी। वे जानते थे कि सत्ता क्षणिक है, परन्तु शब्द स्थायी। 

उनके सपनों का भारत ऐसा राष्ट्र था, जहाँ राजनीति केवल सत्ता संग्राम न होकर सेवा और साधना बने। 

“अटल के सपनों का भारत” आज भी एक जीवंत संकल्प है। वह सपना पूरी तरह अतीत नहीं हुआ, न ही पूर्ण रूप से साकार। वह आज भी हमारे सामने एक पथप्रदर्शक विचार के रूप में खड़ा है। 

विकसित भारत की उनकी परिकल्पना केवल ऊँची इमारतों, तेज़ अर्थव्यवस्था या वैश्विक रैंकिंग तक सीमित नहीं थी। वह भारत मनुष्य के विकास का सपना था, जहाँ शक्ति के साथ संवेदना, प्रगति के साथ नैतिकता और राष्ट्र के साथ मानवता चलती हो। 

अटल बिहारी वाजपेयी का भारत एक ऐसा भारत था, जो स्वयं पर गर्व करे, परन्तु दूसरों के प्रति विनम्र रहे। वही भारत आज भी हमारे लिए प्रेरणा है और भविष्य की दिशा भी। 

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