ओएमआर का घेरा

15-09-2026

ओएमआर का घेरा

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 302, सितम्बर द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मास्टर दीनदयाल जी के सेवा-निवृत्ति में केवल पाँच वर्ष शेष थे। पिछले बत्तीस वर्षों से वे इसी गाँव के प्राथमिक शाला में बच्चों को गणित और भाषा का ककहरा सिखाते आ रहे थे। उनके पढ़ाए कई छात्र आज शहरों में बड़े पदों पर आसीन थे। पाँच सितंबर के अवसर पर ज़िला मुख्यालय से आए नए अफ़सर ने उन्हें मंच पर बुलाकर शॉल और श्रीफल से सम्मानित किया और उनके दीर्घ अनुभव की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

दोपहर बाद अचानक संकुल केंद्र से एक विशेष आदेश का परिपत्र चस्पा कर दिया गया। नए नियमों के अंतर्गत सभी पुराने शिक्षकों को अपनी योग्यता प्रमाणित करने के लिए उसी शाम एक ऑनलाइन दक्षता परीक्षा में बैठना अनिवार्य था।

परीक्षा कक्ष में दीनदयाल जी के काँपते हाथ कंप्यूटर के माउस को सँभालने का प्रयास कर रहे थे। बत्तीस वर्षों तक जिन उँगलियों ने खड़िया से हज़ारों बच्चों के भविष्य की लकीरें खींची थीं वे स्क्रीन पर तैरते तीर के निशान को ठीक स्थान पर ले जाने में बार-बार फिसल रही थीं। समय सीमा समाप्त होने की घंटी बजी और स्क्रीन पर लाल अक्षरों में ‘अनुत्तीर्ण’ का संदेश चमक उठा। अगले ही दिन संकुल समन्वयक ने मास्टर जी को बुलाकर नई सूची पर हस्ताक्षर करने को कहा जिसमें उनकी बत्तीस वर्ष पुरानी सेवा के आगे ‘अपात्र’ की मुहर लग चुकी थी।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता-मुक्तक
लघुकथा
कविता
कहानी
सम्पादकीय प्रतिक्रिया
गीत-नवगीत
आप-बीती
साहित्यिक आलेख
ग़ज़ल
दोहे
बाल साहित्य कविता
नाटक
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
स्मृति लेख
व्यक्ति चित्र
सांस्कृतिक आलेख
ललित निबन्ध
सामाजिक आलेख
चिन्तन
काम की बात
कविता - हाइकु
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
किशोर साहित्य कहानी
सांस्कृतिक कथा
स्वास्थ्य
खण्डकाव्य
रेखाचित्र
काव्य नाटक
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
पुस्तक समीक्षा
हास्य-व्यंग्य कविता
गीतिका
अनूदित कविता
किशोर साहित्य कविता
एकांकी
बाल साहित्य लघुकथा
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य नाटक
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में