अंतस की लड़ाई

01-01-2026

अंतस की लड़ाई

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

आज के समय में
जीवन की लड़ाई
किसी मैदान में नहीं लड़ी जाती
यह
भीतर उतर आई है
बहुत निजी
बहुत एकांत। 
 
हमें लड़ना है
स्वयं से
उन स्वघोषित आदतों से
जिन्हें हमने सुविधा समझ लिया
और वे
धीरे धीरे
हमारे व्यक्तित्व को
बौना करती चली गईं। 
 
हमें लड़ना है
उन रिश्तों से
जिनसे हम
कभी जीतना नहीं चाहते
पर हारते हारते
ख़ुद को
खोते जा रहे हैं। 
 
हमें लड़ना है
उस समाज से
जिसका हम
अहम अंग हैं
और जो हमें
हर रोज़
आईना दिखा कर कहता है
तुम
हमसे अलग
कुछ सोच ही नहीं सकते। 
 
स्थापित आदर्श
अब प्रश्न नहीं पूछते
वे आदेश देते हैं
वे सीमाएँ खींचते हैं
और साहस को
अपराध बना देते हैं। 
 
हमें सामना करना है
अपनी संतानों के
उन निर्भीक विचारों का
जो स्वतंत्रता की भाषा में
हमारी परंपराओं को
चुनौती देते हैं
और हमें डर लगता है
कहीं हम ग़लत तो नहीं। 
 
हमें लड़ना है
अपने बूढ़े होते शरीर से
जो हर सुबह
नई थकान के साथ
जगता है
और उस मन से
जो भीड़ में भी
अकेला रह जाता है। 
 
हमें लड़ना है
उन शक्तियों से
जो सत्ता के मद में
अन्याय के शिखर पर
ठहाके लगाती हैं
और पीड़ा को
मनोरंजन समझ लेती हैं। 
 
हमें लड़ना है
अपने भीतर पलती
चुप्पी से
जो हर अन्याय पर
समझदारी बनकर
मौन हो जाती है। 
 
और इस सब के बीच
हमें खोजना है
वह मासूमियत
जिसमें
हमारा व्यक्तित्व
कभी
बिना भय के
खिलता था। 
 
वह मासूमियत
जो सवाल पूछती थी
जो झुकती नहीं थी
जो सच कहने से
डरती नहीं थी। 
 
आज की सबसे बड़ी लड़ाई
जीत या हार की नहीं
ख़ुद को
बचाए रखने की है
मनुष्य बने रहने की है। 
 
क्योंकि यदि
हम यह लड़ाई हार गए
तो सब कुछ जीत कर भी
हम
ख़ुद से
हार चुके होंगे। 

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