कॉकरोच जनता पार्टी और सहमा कॉकरोच

01-06-2026

कॉकरोच जनता पार्टी और सहमा कॉकरोच

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

भारतीय लोकतंत्र सचमुच एक अद्भुत प्रयोगशाला है, जहाँ समस्याएँ कम और उनके प्रतीक अधिक पैदा होते हैं। यहाँ बेरोज़गारी वर्षों तक सरकारी फ़ाइलों में धूल खाती रहती है, प्रतियोगी परीक्षाएँ पीढ़ियों का यौवन निगलती रहती हैं, नियुक्तियाँ अदालतों और विभागों के बीच झूलती रहती हैं, लेकिन जैसे ही किसी प्रभावशाली व्यक्ति की टिप्पणी में बेरोज़गारों की तुलना “कॉकरोच” से कर दी जाती है, पूरा देश अचानक जाग उठता है। यह अलग बात है कि टिप्पणी सच थी, आधी सच थी या सोशल मीडिया की प्रयोगशाला में तैयार की गई थी, पर उससे भी बड़ा सत्य यह था कि करोड़ों युवाओं ने पहली बार महसूस किया कि व्यवस्था ने उन्हें मनुष्य मानना कब का बंद कर दिया है; बस औपचारिक घोषणा बाक़ी थी। यही कारण है कि तीन दिन के भीतर “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम से बना एक फ़ेसबुक पेज बारह मिलियन लोगों की सहानुभूति और व्यंग्य का मंच बन गया। यह संख्या केवल लाइक्स की नहीं थी, यह उन डिग्रियों की गिनती थी जो वर्षों से अलमारियों में रखी-रखी पीली पड़ रही हैं। 

इस नई राजनीतिक चेतना का चुनाव चिह्न भी अत्यंत प्रतीकात्मक रखा गया “जूते से बचकर भागता हुआ कॉकरोच।” वास्तव में यह प्रतीक भारतीय बेरोज़गार की जीवटता का सर्वश्रेष्ठ रूपक है। वह हर भर्ती परीक्षा, हर पेपर लीक, हर स्थगित परिणाम और हर झूठे आश्वासन के बाद भी जीवित रहता है। कई बार तो सरकारें बदल जाती हैं, नीतियाँ बदल जाती हैं, शिक्षा प्रणाली बदल जाती है, पर उसकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं होती। उसकी उम्र निकल जाती है, पर रिक्तियाँ नहीं निकलतीं। वह कोचिंग संस्थानों, साइबर कैफ़ों, लाइब्रेरी और किराए के कमरों में अपने सपनों को ऐसे बचाए रखता है जैसे कोई कॉकरोच परमाणु युद्ध के बाद भी जीवित रह जाए। 

पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा कि “हम कॉकरोच हैं, क्योंकि हमें हर जगह देखकर लोग घृणा तो करते हैं, पर हटाते नहीं।” यह वाक्य सुनकर कुछ पत्रकार भावुक हो गए, कुछ ने इसे लोकतंत्र का पतन बताया, और कुछ ने तुरंत अपने यूट्यूब चैनल के लिए सनसनीखेज़ शीर्षक बना डाला “क्या कॉकरोच बदल देंगे देश की राजनीति?” हमारे समय का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि यहाँ हर समस्या अंततः डिबेट बन जाती है। रोज़गार नहीं है तो डिबेट कर लो, पेपर लीक हो गया तो डिबेट कर लो, युवाओं का भविष्य अधर में है तो उन्हें मोटिवेशनल वीडियो दिखा दो। इस देश में अवसरों से अधिक प्रेरणादायक भाषण उपलब्ध हैं। 

कॉकरोच जनता पार्टी का घोषणापत्र भी वर्तमान व्यवस्था की तरह अत्यंत व्यावहारिक है। उसमें वादा किया गया है कि हर बेरोज़गार युवक को प्रतिदिन कम से कम पाँच नए आवेदन भरने का अवसर दिया जाएगा, ताकि उसे यह अनुभूति बनी रहे कि राष्ट्र उसके भविष्य को लेकर गंभीर है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी भर्ती प्रक्रिया को सात वर्ष से पहले पूरा न किया जाए, क्योंकि इतनी जल्दी नौकरी मिलने से भारतीय युवाओं का धैर्य और आध्यात्मिक विकास बाधित हो सकता है। पार्टी राष्ट्रीय प्रतीक्षा आयोग बनाने की भी घोषणा कर चुकी है, जहाँ युवाओं को यह प्रशिक्षण दिया जाएगा कि परिणाम आने तक चेहरे पर मुस्कान कैसे बनाए रखें और रिश्तेदारों के प्रश्न “और बेटा, नौकरी लगी?” का उत्तर बिना मानसिक संतुलन खोए कैसे दिया जाए। 

देश के बुद्धिजीवी इस पार्टी के उदय से चिंतित हैं। उनका कहना है कि युवा व्यंग्य की ओर जा रहे हैं। उन्हें शायद यह समझ नहीं आ रहा कि जब व्यवस्था लगातार त्रासदी देती है तो समाज अंततः व्यंग्य पैदा करता है। एक प्रसिद्ध टीवी विशेषज्ञ ने बहस के दौरान कहा कि “आज के युवाओं में धैर्य की कमी है”, जबकि उसी समय स्क्रीन के नीचे पट्टी चल रही थी “भर्ती परीक्षा परिणाम पाँचवीं बार स्थगित।” हमारे देश का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि यहाँ सलाह देने वालों की संख्या अवसर देने वालों से कहीं अधिक है। इंजीनियर चाय बेचने में प्रेरणा खोज रहा है, पीएचडी धारक संविदा नौकरी में अनुभव ढूँढ़ रहा है, और प्रतियोगी परीक्षाओं का अभ्यर्थी उम्र निकल जाने के बाद भी अगले प्रयास की तैयारी कर रहा है। 

सबसे मनोरंजक दृश्य तब दिखाई देता है जब कोई सफल व्यक्ति मंच पर खड़े होकर कहता है “मेहनत करो, सफलता अवश्य मिलेगी।” यह वही वाक्य है जो प्रायः वह व्यक्ति बोलता है जिसकी सफलता में मेहनत के साथ-साथ संपर्क, संसाधन, समय और भाग्य भी बराबर भागीदार रहे होते हैं। पर हमारे समय की विडंबना यह है कि असफलता हमेशा व्यक्ति की मानी जाती है और सफलता हमेशा व्यवस्था की उपलब्धि घोषित कर दी जाती है। 

दरअसल “कॉकरोच जनता पार्टी” कोई राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि इस समय के आहत युवा मन का व्यंग्यात्मक घोषणापत्र है। यह उन लाखों युवाओं की सामूहिक हँसी है जो धीरे-धीरे अपनी ही दुर्दशा पर हँसना सीख गए हैं। वे अब क्रांति नहीं करते, मीम बनाते हैं; वे सड़कों पर कम और फ़ेसबुक पेजों पर अधिक दिखाई देते हैं। उन्हें धीरे-धीरे यह विश्वास दिला दिया गया है कि उनकी डिग्री से अधिक मूल्यवान उनका डेटा है, उनकी प्रतिभा से अधिक उपयोगी उनकी चुप्पी है। यही कारण है कि आज बेरोज़गारी केवल आर्थिक संकट नहीं रह गई है, यह सम्मान के क्षरण का संकट भी बन चुकी है। जब किसी समाज में युवा अपनी योग्यता से अधिक अपने उपहास से पहचाने जाने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र की रसोई में कुछ गंभीर रूप से जल रहा है। 

और शायद इस पूरे प्रसंग का सबसे तीखा व्यंग्य यही है कि देश का युवा अब व्यवस्था से नौकरी नहीं माँगता; वह केवल इतना चाहता है कि उसे कीट-पतंगों की श्रेणी में रखने से पहले कम-से-कम उसकी मार्कशीट एक बार देख ली जाए। 

 (नोट: इस व्यंग्य आलेख की सभी बातें कल्पना पर आधारित हैं) 

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