किसे जगाएँ

01-03-2026

किसे जगाएँ

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 293, मार्च प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

सुलग रहा है मन के भीतर
घाव पुराना
किसे दिखाएँ। 
 
होंठों पर 
आकर बैठी है
गुमसुम तन्हाई। 
विस्मित सा मन
रिश्ते सूखे। 
लुक्का छिप्पी 
खेल रही है
ग़म की परछाईं
कौन सम्हाले
सब हैं भूखे। 
 
बिखरा जीवन टूटा सा मन
हाल ठिकाना
कहाँ बनाएँ। 
 
बीत गए 
दिन वो सुख वाले
हँसते गाते रहते थे हम 
स्वप्न लोक से
सुंदर थे वो। 
आश-दीप
अब लगा है बुझने
छाया घोर अँधेरा हरदम
टूटे सपने
अंदर थे जो। 
 
सदियों जैसा अब दिन लगता
मन वीराना
किसे जगाएँ। 

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