तुम्हारा सौंदर्य

15-01-2026

तुम्हारा सौंदर्य

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

तीखे नाक नक़्श
जैसे किसी शिल्पी ने
धैर्य से तराशे हों
समय की सबसे कोमल शिला पर। 
 
बातूनी ग़ज़ल सी आँखें
जो चुप रहकर भी
कई मिसरे कह जाती हैं
और देखने वाला
पूरा दीवान बनकर लौटता है। 
 
गालों पर
अंगूर के प्याले जैसे
भरपूर और रसीले
जिनमें
जन्म जन्म की प्यास
अपने आप उतर आती है। 
 
पावस सी पावन
लुभावनी आभा
जो देह से पहले
मन को भिगो देती है
और भीतर कहीं
हरियाली उगा देती है। 
 
होंठों पर
अथक मुस्कान
जैसे थकान नाम की
कोई चीज़
उसके जीवन में
कभी आई ही न हो। 
 
उरोजों के उभार को छूते
आतुर
घने काले केश
जैसे रात
ख़ुद अपने सौंदर्य पर
इठला रही हो। 
 
चटक बसंती रंगों में
चहकती चोली कंचुक
जिसमें
ऋतुएँ भी
अपना ठिकाना ढूँढ़ लें। 
 
और वही
चंचल चाल
जिसमें
धरती की लय
और आकाश की गति
एक साथ चलती हैं। 
 
सरसों के बाग़ान सी सुसज्जित
तुम्हारी कमसिन काया
जिसे देख कर
ऋतुएँ ठिठक जाती हैं
और रंग
और गहरे हो जाते हैं। 
 
यह सौंदर्य
केवल देखने की वस्तु नहीं
यह तो
जीवन को
और अधिक जीवित
कर देने वाली अनुभूति है। 
 
तुम्हारा सौंदर्य
किसी को बाँधता नहीं
वह बस
देखने वाले के भीतर
एक मौन प्रार्थना
जगा देता है। 

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