गुल्लू गिलहरी और लल्लू बंदर

15-06-2026

गुल्लू गिलहरी और लल्लू बंदर

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 299, जून द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

गुल्लू गिलहरी फुदक फुदक, 
दौड़े जैसे चमक दमक। 
लल्लू बंदर कूदम कूदम, 
पेड़ों पर करता था ऊधम। 
 
दोनों थे जंगल के यार, 
हँसते गाते बारंबार। 
सुबह सवेरे दोनों मिलते। 
धमा चौकड़ी करते चलते। 
 
गुल्लू तोड़े मूँगफली, 
लल्लू तोड़े आम कली। 
आधा आधा मिलकर खाते, 
पेड़ों से मधुमक्खी भगाते। 
 
नदी किनारे खेलें खेल, 
गुल्लू लल्लू बनते रेल। 
तितली पीछे दौड़ लगाते, 
हँसते हँसते गिर भी जाते। 
 
एक बार आया तूफ़ान 
डाली टूटी गिरे मकान। 
गुल्लू नीचे डाली ऊपर 
गुल्लू भागी सरपट डरकर। 
 
लल्लू बोला मत घबराना, 
मैं हूँ तेरा दोस्त पुराना। 
कंधे ऊपर उसे बिठाया, 
जल्दी उसके घर पहुँचाया। 
 
तब से दोनों मित्र हैं गहरे 
मिलकर रहते दोस्त सुनहरे। 
सगी मित्रता वही कहाती 
मुश्किल में जो साथ निभाती। 

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