मौन पहाड़ का बदला

15-02-2026

मौन पहाड़ का बदला

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 293, फरवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

ऊँचे-ऊँचे हिमखंडों से घिरा एक छोटा शहर था। पहाड़ों की गोद में बसे इस शहर में पर्यटन फल-फूल रहा था। लेकिन पर्यटकों और स्थानीय लोगों की बढ़ती संख्या के कारण, पहाड़ पर कचरा और प्रदूषण बढ़ने लगा। होटल और रिसॉर्ट्स के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई, जिससे मिट्टी का कटाव बढ़ गया। पर्यावरणीय नियमों को लगातार अनदेखा किया जा रहा था। 

शहर के लोग अक्सर मौन पहाड़ की प्रशंसा करते थे, लेकिन उसके दर्द को कभी नहीं समझते थे। एक दिन, लगातार बारिश हुई, और पहाड़, जो अब कमज़ोर हो चुका था, काँप उठा। एक विशाल भूस्खलन हुआ, जिसने पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया। मकान ढह गए, सड़कें टूट गईं, और कई जानें चली गईं। 

जो लोग बच गए, उन्होंने देखा कि यह आपदा मानव निर्मित थी। उन्होंने पहाड़ की चेतावनी को नज़रअंदाज़ किया था। मलबे के बीच से, एक बुज़ुर्ग साधु निकले, जिन्होंने हमेशा प्रकृति के संरक्षण की वकालत की थी। उन्होंने कहा, “पहाड़ मौन रहता है, पर उसका धैर्य असीमित नहीं। जब उसका धैर्य टूटता है, तो वह अपने क्रोध का प्रदर्शन करता है।”

यह आपदा उनके लिए एक कड़वा सबक़ थी। शहर के लोगों ने सामूहिक रूप से निर्णय लिया कि वे अब प्रकृति का सम्मान करेंगे। उन्होंने पुनर्निर्माण के साथ-साथ वृक्षारोपण अभियान शुरू किया, कचरा प्रबंधन पर ध्यान दिया और स्थायी पर्यटन को बढ़ावा दिया। उन्होंने जाना कि पहाड़ का बदला वास्तव में उनकी अपनी अनदेखी का परिणाम था।

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
बाल साहित्य कविता
लघुकथा
स्मृति लेख
दोहे
कहानी
कविता-मुक्तक
साहित्यिक आलेख
सांस्कृतिक आलेख
काम की बात
सामाजिक आलेख
कविता - हाइकु
ऐतिहासिक
कविता - क्षणिका
चिन्तन
व्यक्ति चित्र
किशोर साहित्य कहानी
सांस्कृतिक कथा
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
ललित निबन्ध
गीत-नवगीत
स्वास्थ्य
खण्डकाव्य
नाटक
रेखाचित्र
काव्य नाटक
यात्रा वृत्तांत
हाइबुन
पुस्तक समीक्षा
हास्य-व्यंग्य कविता
गीतिका
अनूदित कविता
किशोर साहित्य कविता
एकांकी
ग़ज़ल
बाल साहित्य लघुकथा
सिनेमा और साहित्य
किशोर साहित्य नाटक
विडियो
ऑडियो

विशेषांक में