दूसरा मौक़ा

01-07-2026

दूसरा मौक़ा

डॉ. सुशील कुमार शर्मा (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

परिवार न्यायालय के बाहर लगी लंबी बेंच पर शिखा चुपचाप बैठी थी। उसके हाथों में तलाक़ के काग़ज़ थे। उँगलियाँ उन काग़ज़ों को पकड़े हुए थीं, लेकिन मन कहीं वर्षों पीछे भटक रहा था। सामने कुछ दूरी पर सौरभ बैठा था। सिर झुका हुआ, चेहरे पर थकान की गहरी रेखाएँ और आँखों में अनकही उदासी। 

आज शायद उनके सम्बन्ध का अंतिम दिन था। 

पाँच वर्ष पहले इसी शहर में उनकी शादी हुई थी। संगीत, हँसी, सपने और शुभकामनाओं के बीच शुरू हुई यात्रा कब अदालत की चौखट तक पहुँच गई, यह दोनों में से कोई नहीं समझ पाया था। 

विवाह के शुरूआती दिन सुंदर थे। किराए का छोटा सा घर था, सीमित आय थी, लेकिन सपनों की कोई सीमा नहीं थी। 

सौरभ अक्सर कहता था, “देखना शिखा, अभी घर छोटा है, लेकिन एक दिन तुम्हारे लिए बड़ा सा आशियाना बनाऊँगा।” 

शिखा मुस्कराकर उत्तर देती, “मुझे बड़ा घर नहीं चाहिए, बस इतना चाहिए कि तुम्हारे पास मेरे लिए समय हो।” 

दोनों हँस पड़ते। लेकिन समय के साथ जीवन बदलने लगा। नौकरी का दबाव बढ़ा। अपेक्षाएँ बढ़ीं। संवाद कम होने लगे। छोटी-छोटी बातों ने विवाद का रूप ले लिया। 

एक दिन शिखा मायके चली गई दूसरे दिन सौरभ उसे मनाने पहुँचा। 

“चलो घर चलते हैं।” 

“कौन सा घर?” शिखा ने तीखे स्वर में कहा, “जहाँ मेरी बात सुनने वाला कोई नहीं है?” 

“तुम हर बात को ग़लत समझ रही हो।” 

“और तुम हर बार मुझे ही ग़लत साबित करते हो।” 

बात बढ़ती चली गई। बीच में रिश्तेदार आए। सलाहें आईं। आरोप आए। प्रत्यारोप आए। 

फिर एक दिन मामला पुलिस तक पहुँच गया। दहेज़ प्रताड़ना का मुक़द्दमा दर्ज हो गया। उस दिन केवल एक केस दर्ज नहीं हुआ था, दो परिवारों के बीच विश्वास का अंतिम धागा भी टूट गया था। अदालतों की दुनिया बड़ी विचित्र होती है। वहाँ सत्य से अधिक दस्तावेज़ बोलते हैं और भावनाओं से अधिक तर्क। 

चार वर्षों तक मुक़द्दमा चलता रहा हर तारीख़ एक नया घाव बनकर आती। वकीलों की फ़ीस बढ़ती गई। दोनों परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से टूटने लगे। सबसे अधिक असर शिखा के पिता पर पड़ा। वे सेवानिवृत्त शिक्षक थे। जीवन भर ईमानदारी से नौकरी की थी। बेटी के लिए जो कुछ जोड़ा था, वह धीरे-धीरे मुक़द्दमे की भेंट चढ़ता गया। 

एक शाम वे बरामदे में बैठे थे शिखा उनके पास आकर बोली, “पापा, लगता है यह लड़ाई कभी ख़त्म नहीं होगी।” 

पिता ने उसकी ओर देखा।” बेटी, न्याय देर से मिलता है, पर मिलता ज़रूर है।” 

“लेकिन इसकी क़ीमत बहुत बड़ी है पापा।” 

पिता मुस्कराए, मगर उस मुस्कान में थकान थी।” माँ-बाप अपनी बेटियों के लिए क़ीमत नहीं गिनते।” 

शिखा रो पड़ी। 

कुछ महीनों बाद पिता की तबीयत बिगड़ने लगी। उच्च रक्तचाप, मधुमेह और फिर हृदय रोग। मुक़द्दमे का तनाव उन्हें भीतर ही भीतर खा रहा था। एक रात अचानक उन्हें सीने में तेज दर्द उठा। घर में अफ़रा-तफ़री मच गई। उन्हें सरकारी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने स्थिति गंभीर बताई शिखा अस्पताल के बाहर बैठी रो रही थी। उसी समय उसके मोबाइल पर एक कॉल आया। स्क्रीन पर नाम चमका “सौरभ।” 

वह कुछ क्षण देखती रही, फिर कॉल काट दिया। लेकिन अगले दिन जब वह अस्पताल पहुँची तो सामने का दृश्य देखकर स्तब्ध रह गई। 

सौरभ डॉक्टर से बात कर रहा था। 

वह दवाइयाँ ख़रीद रहा था। रिपोर्टें दिखा रहा था। और उसके पिता के बिस्तर के पास खड़ा उनकी कुशलक्षेम पूछ रहा था। शिखा के भीतर वर्षों से जमा क्रोध जैसे अचानक ठिठक गया। 

“तुम यहाँ क्यों आए हो?” उसने कठोर स्वर में पूछा। 

सौरभ ने शांत भाव से उत्तर दिया, “क्योंकि वे बीमार हैं।” 

“इतना ही कारण है?” 

“क्या इतना कारण काफ़ी नहीं है?” 

शिखा निरुत्तर रह गई। स्थिति बिगड़ती जा रही थी सरकारी अस्पताल की सीमाएँ थीं। 

सौरभ ने अपने परिचितों से बात की। वृद्ध को एक बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया। इलाज का ख़र्च भी उसने उठाना शुरू कर दिया। 

एक रात शिखा ने देखा कि सौरभ अस्पताल के गलियारे में प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा सो गया है। 

उसके हाथ में अब भी दवाइयों की पर्ची थी। उस क्षण पहली बार उसके भीतर एक प्रश्न उठा क्या अदालत में खड़ा व्यक्ति वही है जिसे वह वर्षों से अपना शत्रु मानती रही? कुछ दिनों बाद पिता की स्थिति सुधरने लगी। एक शाम उन्होंने सौरभ को पास बुलाया। कमज़ोर हाथ उसके हाथ पर रख दिया। 

“बेटा।” 

“जी पापा।” 

“एक बात पूछूँ?” 

“जी।” 

“अगर मन में इतनी कटुता होती तो तुम यहाँ क्यों होते?” 

सौरभ की आँखें भर आईं। वह धीमे से बोला, “रिश्ता टूट गया था पापा . . . संस्कार नहीं।” 

वृद्ध की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा, “अदालतें मुक़द्दमे ख़त्म करती हैं बेटा . . . रिश्ते नहीं।” 

और आज वही अंतिम तारीख़ थी। 

न्यायाधीश ने दोनों को सामने बुलाया। 

फ़ाइल खोली गई। काग़ज़ मेज़ पर रखे गए। 

“क्या आप दोनों आपसी सहमति से तलाक़ चाहते हैं?” न्यायाधीश ने पूछा। 

कमरे में सन्नाटा छा गया। शिखा ने काग़ज़ों की ओर देखा। उसे अस्पताल का वह गलियारा याद आया। रात भर जागता हुआ सौरभ याद आया। पिता का काँपता हाथ याद आया। और वह वाक्य भी “रिश्ता टूट गया था . . . संस्कार नहीं।” 

उसकी आँखें भर आईं। 

उसने धीरे से तलाक़ के काग़ज़ उठाए। सबकी निगाहें उसी पर थीं। 

अगले ही क्षण काग़ज़ कई टुकड़ों में बिखर चुके थे। अदालत में सन्नाटा जम गया। शिखा सौरभ के सामने आकर खड़ी हो गई। 

“हम दोनों ने बहुत कुछ खो दिया सौरभ।” 

सौरभ की आँखें भी नम थीं। 

“हाँ, शायद।” 

“लेकिन एक बात समझ में आ गई।” 

“क्या?” 

शिखा का गला भर आया।” क़ानून यह तय कर सकता है कि पति-पत्नी साथ रहेंगे या नहीं . . . लेकिन यह तय नहीं कर सकता कि किसी के भीतर इंसान अभी भी जीवित है या नहीं।” 

सौरभ कुछ बोल नहीं पाया। दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे अदालत की कार्यवाही जारी थी अगला केस पुकारा जा चुका था। 

लेकिन उस दिन वहाँ उपस्थित लोगों ने पहली बार देखा कि कभी-कभी एक मुक़द्दमा जीतने से अधिक साहस उसे छोड़ देने में लगता है। 

और बाहर धूप में खड़े शिखा के पिता बहुत देर तक आकाश की ओर देखते रहे। शायद उन्हें लग रहा था कि न्याय आज अदालत ने नहीं, इंसानियत ने किया है। 

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